अमेरिका-रूस की 15 साल पुरानी संधि खत्म ही परमाणु खतरा क्यों बढ़ गया?

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अमेरिका-रूस की 15 साल पुरानी संधि खत्म ही परमाणु खतरा क्यों बढ़ गया?

रूस के राष्ट्रपति पुतिन और डोनाल्ड ट्रंप.

दुनिया एक बार फिर परमाणु हथियारों की दौड़ के बेहद खतरनाक मोड़ पर पहुंच गई है. 5 फरवरी 2026 को अमेरिका और रूस के बीच लागू आखिरी परमाणु हथियार नियंत्रण समझौता न्यू स्टार्ट समाप्त हो गया. इसके साथ ही दोनों देशों पर अपने परमाणु हथियारों को सीमित रखने की सभी कानूनी पाबंदियां हट गईं.

संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंतोनियो गुटेरेस ने इस स्थिति को अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा के लिए सबसे गंभीर क्षण बताया है. आइए जानते हैं अमेरिका और रूस के बीच खत्म हुए इस संधि के बारे में विस्तार से.

न्यू स्टार्ट संधि क्या थी?

न्यू स्टार्ट संधि पर वर्ष 2010 में अमेरिका और रूस ने हस्ताक्षर किए थे और यह 5 फरवरी 2011 से लागू हुई थी. यह समझौता दोनों देशों के बीच परमाणु हथियारों की संख्या पर नियंत्रण रखने के लिए बनाया गया था. इसका मकसद शीत युद्ध के बाद पैदा हुई अविश्वास की स्थिति को कम करना और परमाणु युद्ध की आशंका को रोकना था. इस संधि ने पिछले डेढ़ दशक तक वैश्विक परमाणु संतुलन बनाए रखने में अहम भूमिका निभाई.

संधि के तहत क्या सीमाएं थीं

न्यू स्टार्ट के तहत अमेरिका और रूस दोनों को अपने परमाणु हथियार तय सीमा के भीतर रखने होते थे. इसमें अधिकतम 700 तैनात अंतरमहाद्वीपीय बैलिस्टिक मिसाइलें, पनडुब्बियों से लॉन्च होने वाली मिसाइलें और परमाणु सक्षम बॉम्बर शामिल थे. इसके अलावा कुल 800 मिसाइल लॉन्चर और अधिकतम 1,550 तैनात परमाणु वारहेड रखने की सीमा तय की गई थी. दोनों देशों को एक-दूसरे के हथियारों की जांच की अनुमति भी देनी होती थी ताकि नियमों का पालन सुनिश्चित किया जा सके.

संधि खत्म होने से क्या बदला

संधि के खत्म होते ही अमेरिका और रूस अब किसी भी कानूनी बंधन के बिना अपने परमाणु कार्यक्रमों का विस्तार कर सकते हैं. अब न तो हथियारों की संख्या पर कोई सीमा है और न ही निरीक्षण की कोई बाध्यता. यही वजह है कि विशेषज्ञ इसे परमाणु हथियारों की नई दौड़ की शुरुआत मान रहे हैं. संयुक्त राष्ट्र महासचिव ने चेतावनी दी है कि पचास साल में पहली बार दुनिया ऐसी स्थिति में पहुंच गई है जहां दो सबसे बड़े परमाणु ताकतों पर कोई नियंत्रण नहीं बचा है.

दुनिया क्यों डर रही है

अमेरिका और रूस मिलकर दुनिया के 80 प्रतिशत से ज्यादा परमाणु हथियारों पर नियंत्रण रखते हैं. यूक्रेन युद्ध के दौरान रूस की ओर से सामरिक परमाणु हथियारों के इस्तेमाल को लेकर दिए गए संकेतों ने पहले ही वैश्विक चिंता बढ़ा दी थी. ऐसे माहौल में किसी भी तरह का तनाव, गलती या गलतफहमी परमाणु टकराव का रूप ले सकती है. यही वजह है कि इस समझौते के खत्म होने को सबसे गलत समय माना जा रहा है.

चीन फैक्टर और नई संधि की उलझन

अमेरिका का कहना है कि अब किसी भी नई परमाणु हथियार नियंत्रण संधि में चीन को शामिल किया जाना जरूरी है. अमेरिका का मानना है कि चीन तेजी से अपने परमाणु कार्यक्रम का विस्तार कर रहा है और उसे नजरअंदाज करना भविष्य के लिए खतरनाक हो सकता है. हालांकि चीन की परमाणु क्षमता अभी भी अमेरिका और रूस से कम है, लेकिन उसका बढ़ता प्रभाव बातचीत को और जटिल बना रहा है.

आगे क्या रास्ता

रूस के विदेश मंत्रालय ने कहा है कि संधि खत्म होने के बावजूद वह जिम्मेदारी और समझदारी से काम करेगा, लेकिन जरूरत पड़ने पर कड़े कदम उठाने के लिए तैयार है. पोप लियो चौदहवें और संयुक्त राष्ट्र ने दोनों देशों से अपील की है कि वे जल्द से जल्द नई संधि पर बातचीत शुरू करें. विशेषज्ञों का मानना है कि अगर ऐसा नहीं हुआ तो परमाणु अप्रसार संधि जैसी वैश्विक व्यवस्थाएं कमजोर पड़ सकती हैं और दुनिया एक बार फिर परमाणु हथियारों की खतरनाक होड़ में फंस सकती है.

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