बार-बार छोटी-छोटी चीजें भूलना, दिमागी थकान या डिमेंशिया?

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बार-बार छोटी-छोटी चीजें भूलना, दिमागी थकान या डिमेंशिया?

दिमागी थकान और डिमेंशियाImage Credit source: Getty Images

आजकल बार-बार छोटी-छोटी बातें भूल जाना आम समस्या बनती जा रही है. कभी चाबियां कहां रखी थीं, यह याद नहीं रहता, तो कभी जरूरी काम या किसी से हुई बातचीत दिमाग से निकल जाती है. ज़्यादातर लोग इसे सामान्य मानकर नजरअंदाज कर देते हैं, लेकिन जब यह समस्या बार-बार होने लगे, तो चिंता होना स्वाभाविक है. खासकर तब, जब व्यक्ति खुद को पहले जैसा न महसूस करे और उसे लगे कि उसकी याददाश्त या समझ में बदलाव आ रहा है. ऐसे में मन में यह सवाल उठता है कि कहीं यह सिर्फ दिमागी थकान और तनाव का असर तो नहीं, या फिर डिमेंशिया जैसी गंभीर मानसिक समस्या की शुरुआत तो नहीं है.

डिमेंशिया एक ऐसी स्थिति है, जिसमें याददाश्त के साथ-साथ सोचने और समझने की क्षमता भी प्रभावित होने लगती है. सही जानकारी न होने के कारण लोग अक्सर भ्रम में पड़ जाते हैं और डरने लगते हैं. इसलिए इन लक्षणों को आइए जानते हैं कि मानसिक थकान और डिमेंशिया के बीच फर्क क्या है, ताकि सही समय पर ध्यान दिया जा सके.

बार-बार छोटी-छोटी चीजें भूलना क्या दिमागी थकान है या डिमेंशिया?

दिल्ली में न्यूरोलॉजिस्ट डॉ. राजेश कुमार बताते हैं कि दिमागी थकान और डिमेंशिया, दोनों में भूलने की समस्या दिख सकती है, लेकिन इनका असर अलग-अलग होता है. दिमागी थकान में व्यक्ति कभी-कभी ही चीजें भूलता है और थोड़ी देर सोचने पर उसे याद भी आ जाती हैं. ऐसे लोग अपने रोज़मर्रा के काम सामान्य रूप से कर पाते हैं और बातचीत में भी कोई बड़ी परेशानी नहीं होती.

वहीं डिमेंशिया में भूलने की समस्या धीरे-धीरे बढ़ती जाती है. व्यक्ति सिर्फ बातें ही नहीं, बल्कि नाम, रास्ते और समय को लेकर भी उलझन महसूस करने लगता है. कई बार उसे परिचित लोगों को पहचानने में भी दिक्कत होती है. साथ ही सोचने और फैसले लेने की क्षमता भी प्रभावित होने लगती है. यही वजह है कि दोनों के बीच फर्क समझना बहुत ज़रूरी होता है, ताकि स्थिति को सही तरीके से पहचाना जा सके.

कैसे करें बचाव?

याददाश्त को बेहतर बनाए रखने के लिए रोज़मर्रा की आदतों पर ध्यान देना जरूरी है. समय पर पूरी नींद लेना, संतुलित भोजन करना और पर्याप्त पानी पीना मददगार हो सकता है. दिमाग को एक्टिव रखने के लिए पढ़ना, लिखना, पहेलियां हल करना या नई चीज़ें सीखना फायदेमंद रहता है.

इसके अलावा, रोज़ थोड़ा समय शारीरिक एक्टिविटी और खुद के लिए निकालना भी ज़रूरी है. काम के बीच-बीच में आराम लेना और मोबाइल या स्क्रीन से दूरी बनाना भी दिमाग को राहत देता है. छोटी-छोटी बातों को नोट करने की आदत भी याददाश्त को संभालने में मदद कर सकती है.

डॉक्टर को कब दिखाएं?

अगर भूलने की समस्या लगातार बढ़ रही हो और रोज़मर्रा की ज़िंदगी को प्रभावित करने लगे, तो डॉक्टर से सलाह लेना ज़रूरी हो जाता है. जब व्यक्ति बार-बार एक ही बात पूछने लगे, परिचित जगहों पर रास्ता भटक जाए या बातचीत में बार-बार उलझन महसूस करे, तो इसे नज़रअंदाज़ नहीं करना चाहिए.

इसके अलावा, व्यवहार में अचानक बदलाव या फैसले लेने में कठिनाई भी संकेत हो सकते हैं. समय पर डॉक्टर को दिखाने से सही सलाह और ज़रूरी जांच मिल सकती है, जिससे स्थिति को बेहतर तरीके से संभाला जा सकता है.

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