गुमला की अष्टम उरांव खेलेंगी एशियन कप:राज्य की पहली और एकमात्र खिलाड़ी, इंडियन वूमेन्स फुटबॉल टीम का बनी हिस्सा

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झारखंड के गुमला जिले के बिशनपुर प्रखंड स्थित बनारी गोरा टोली गांव की बेटी अष्टम उरांव का चयन भारतीय महिला फुटबॉल टीम में हुआ है। वह इन दिनों ऑस्ट्रेलिया में टीम के साथ ट्रेनिंग सेंटर में हिस्सा ले रही हैं। 1 मार्च से 21 मार्च तक ऑस्ट्रेलिया में आयोजित होने वाले एएफसी महिला एशियन कप फुटबॉल टूर्नामेंट के लिए उनका चयन किया गया है। यह टूर्नामेंट 2027 में ब्राजील में होने वाले फीफा महिला विश्व कप के क्वालिफिकेशन से भी जुड़ा हुआ है, ऐसे में अष्टम की जिम्मेदारी और बढ़ गई है। मिट्टी के घर से निकलकर अंतरराष्ट्रीय मैदान तक पहुंचने की उनकी कहानी हजारों ग्रामीण बेटियों के लिए प्रेरणा बन गई है। गांव के लोग टीवी पर उनका खेल देखने को बेताब हैं और हर किसी की जुबां पर आज अष्टम का नाम है। माता-पिता आज भी कर रहे हैं दिहाड़ी अष्टम की इस उपलब्धि के पीछे संघर्ष की लंबी दास्तान है। उनके पिता हीरा उरांव और मां तारा उरांव आज भी मजदूरी कर परिवार का भरण-पोषण कर रहे हैं। दोनों मिलकर प्रतिदिन करीब ढाई सौ रुपए कमाते हैं। पिता ने बताया कि मजदूरी किए बिना घर चलाना मुश्किल है। परिवार के पास मात्र एक एकड़ जमीन है, जिसमें साल में सिर्फ धान की एक फसल होती है। खपरैल और मिट्टी का जर्जर घर आज भी उनकी आर्थिक स्थिति की कहानी कहता है। मां तारा देवी गर्व से कहती हैं कि अष्टम बचपन से ही जुझारू रही है और जो ठान लेती है, उसे पूरा कर दिखाती है। उन्होंने उम्मीद जताई कि जब बेटी को स्थायी नौकरी मिलेगी, तब वे मजदूरी छोड़ देंगे। संघर्ष के बीच यह उपलब्धि परिवार के लिए उम्मीद की नई किरण बनकर आई है। गांव में जश्न की तैयारी, प्रशासन से आवास की मांग बनारी पंचायत के मुखिया बसनु उरांव के अनुसार, अष्टम के पिता स्वयं बिशनपुर क्षेत्र के प्रसिद्ध फुटबॉल खिलाड़ी रह चुके हैं, लेकिन आर्थिक तंगी के कारण आगे नहीं बढ़ सके। उन्होंने प्रशासन से प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत घर देने की मांग की है। इससे पहले जब अष्टम को टीम का कप्तान बनाया गया था। राज्य सरकार ने उनके सम्मान में गांव तक सड़क निर्माण की घोषणा की थी, जिस पर काम शुरू हो चुका है। गुमला शहर से 56 किलोमीटर दूर बसे इस गांव में अब जश्न की तैयारी है। मुखिया ने कहा कि अष्टम के लौटने पर भव्य स्वागत किया जाएगा। एक छोटे से गांव की बेटी ने यह साबित कर दिया है कि सपनों की उड़ान के लिए मजबूत इरादे ही सबसे बड़ी पूंजी होते हैं।

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