चैत्र नवरात्रि का आज दूसरा दिन, मां ब्रह्मचारिणी की पूजा:कटिहार के ललियाही मंदिर में 51 सालों से हो रही आराधना, मेले-सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन

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कटिहार में चैत्र नवरात्रि का महापर्व हिंदू नववर्ष की शुरुआत के साथ मनाया जा रहा है। यह नौ दिवसीय उत्सव मां दुर्गा के नौ रूपों की उपासना और बुराई पर अच्छाई की जीत के प्रतीक के रूप में मनाया जाता है। नवरात्रि के दूसरे दिन आज मां दुर्गा के ब्रह्मचारिणी स्वरूप की आराधना की जा रही है। यह रूप अत्यंत पवित्र, शांत और तपस्या का प्रतीक माना जाता है। धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, मां ब्रह्मचारिणी साधना और संयम की प्रेरणा देती हैं। उनके एक हाथ में जपमाला और दूसरे में कमंडल होता है, जो उनके तपस्वी स्वरूप को दर्शाता है। मान्यता है कि इस दिन श्रद्धा से पूजा करने पर भक्तों की मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। कटिहार के ललियाही स्थित सार्वजनिक चैती दुर्गा मंदिर आस्था का एक प्रमुख केंद्र है। यह मंदिर विशेष रूप से चैत्र नवरात्रि के दौरान अपनी भव्यता और पूजा-अर्चना के लिए प्रसिद्ध है। 51 वर्षों से मां दुर्गा की प्रतिमा हो रही स्थापित मंदिर कमेटी के अध्यक्ष शेखर सिंह के अनुसार, कटिहार-मनिहारी मुख्य मार्ग पर स्थित इस मंदिर में पिछले 51 वर्षों से स्थानीय निवासियों के सहयोग से सार्वजनिक रूप से मां दुर्गा की प्रतिमा स्थापित कर पूजा की जा रही है। वासंतिक नवरात्रि के समय यहां विशेष सजावट और पूजा का आयोजन होता है, जिसमें आसपास के क्षेत्रों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु भाग लेते हैं। असम के गुवाहाटी से पहुंचे प्रसिद्ध आचार्य पंडित हृदय कुमार झा द्वारा माता की विशेष पूजा-अर्चना की जा रही है। उन्होंने बताया कि वह पिछले 25 सालों से चैती नवरात्रि में अपनी सेवाएं दे रहे हैं। पश्चिम बंगाल के रायगंज जिले से आए एक दर्जन कारीगरों द्वारा पूजा पंडाल का निर्माण किया जा रहा है, जिसे अंतिम रूप दिया जा रहा है। मंदिर के मुख्य द्वार के समीप तैयार किया जा रहा कृत्रिम पूजा पंडाल निर्माण की लागत 6:30 लाख बताई जा रही है। बांस और लकड़ी के बीट पर लगाई जा रहे वेलवेट पेपर के ऊपर शीशे की महीन कारीगरी और आकर्षक लाइट दूर से ही श्रद्धालुओं को अपनी ओर आकर्षित कर रही है।

मेले और सांस्कृतिक कार्यक्रम का भव्य आयोजन

वहीं पूजा कमेटी से जुड़े अरुण कुमार सिंह ने बताया कि सप्तमी पूजा से यहां भव्य मेले का आयोजन किया जाएगा। माता के दरबार में भव्य सांस्कृतिक कार्यक्रम और भक्ति जागरण का भी आयोजन किया जाएगा। मंदिर में दुर्गा पूजा के साथ-साथ अन्य धार्मिक आयोजन भी होते रहते हैं। आचार्य पण्डित हृदय कुमार झा ने बताया की चैत्र नवरात्रि का पावन पर्व शक्ति साधना का सर्वोत्तम काल माना जाता है। इस दौरान मां दुर्गा की उपासना न केवल आध्यात्मिक ऊर्जा प्रदान करती है, बल्कि घर-परिवार में सकारात्मकता और सुख-समृद्धि का संचार भी करती है। धार्मिक मान्यताओं के साथ यदि वास्तु शास्त्र के नियमों का भी ध्यान रखा जाए, तो साधना का प्रभाव और अधिक फलदायी हो सकता है।

स्वच्छता और पवित्रता का रखें ध्यान

आचार्य हृदय कुमार झा ने बताया कि नवरात्रि में स्वच्छता का विशेष महत्व होता है। पूजा स्थान के आसपास किसी प्रकार की गंदगी या अव्यवस्था नहीं होनी चाहिए। वास्तु के अनुसार, जहां स्वच्छता होती है, वहीं सकारात्मक ऊर्जा का वास होता है। प्रतिदिन पूजा से पहले स्थान को साफ करें और गंगाजल का छिड़काव करना भी शुभ माना जाता है। चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से ही हिंदू नववर्ष (विक्रम संवत) शुरू होता है, इसलिए यह नई ऊर्जा और संकल्प का दिन है। मान्यताओं के अनुसार, ब्रह्मा जी ने इसी दिन से सृष्टि की रचना शुरू की थी। इन नौ दिनों में देवी दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा होती है। कहा जाता है कि माता ने महिषासुर के आतंक से देवताओं को मुक्त कराने के लिए इसी समय अवतार लिया था। लंका युद्ध से पहले, भगवान श्रीराम ने चैत्र नवरात्रि में ही देवी की आराधना की थी और उनसे विजय का आशीर्वाद प्राप्त किया था। यह समय सर्दियों के अंत और गर्मियों की शुरुआत का ‘संधि काल’ है, जिसमें शरीर को मौसमी बदलाव के अनुकूल बनाने के लिए उपवास और पूजा की जाती है।

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