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जामताड़ा में ऐतिहासिक चड़क पूजा की शुरुआत नहाय-खाय के साथ हो गई है। इसके साथ ही पांच दिवसीय प्रसिद्ध विश्वा मेला की तैयारियां भी अंतिम चरण में हैं। यह अनुष्ठान जिले के मटटॉड झिलवा स्थित प्राचीन शिव मंदिर में आयोजित होता है, जो धार्मिक महत्व के साथ सदियों पुरानी लोक परंपरा और संस्कृति का प्रतीक है। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, यह मंदिर हजारों वर्ष पुराना है और यहां स्थित शिवलिंग स्वयंभू हैं। मंदिर की विशेषता है कि यहां एक साथ 10 शिवलिंग एक कतार में और एक शिवलिंग मध्य भाग में विराजमान हैं। यह श्रद्धालुओं के लिए गहरी आस्था का केंद्र है। बुजुर्गों का कहना है कि यह परंपरा राजा-महाराजाओं के समय से लगातार चली आ रही है। श्रद्धालु पूरी निष्ठा और अनुशासन से इसमें भाग लेते हैं हर वर्ष चैत्र मास में विधि-विधान से इस पूजा की शुरुआत होती है। पूजा से लगभग 15 दिन पहले से ही श्रद्धालु वैष्णव नियमों का पालन करते हैं। मान्यता है कि अनुष्ठान में किसी भी चूक पर तत्काल दंड मिलता है, इसलिए श्रद्धालु पूरी निष्ठा और अनुशासन से इसमें भाग लेते हैं। कमेटी सदस्य दिलीप मंडल ने बताया कि यह मंदिर और इसकी परंपरा अत्यंत प्राचीन है। दुमका, देवघर और धनबाद जैसे आसपास के जिलों से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां मनोकामनाएं पूरी करने के लिए पहुंचते हैं। भोक्ता तीन दिनों तक कठोर उपवास रखते हैं रामप्रसाद मंडल के अनुसार, आठ मौजा के लोग इस अनुष्ठान में पूरी श्रद्धा से भाग लेते हैं। पूजा करने वाले भोक्ता तीन दिनों तक कठोर उपवास रखते हैं और पूजा के बाद केवल एक बार नीम शरबत ग्रहण करते हैं। यह तपस्या इस पूजा की सबसे कठिन और विशेष परंपराओं में से एक है।
मंदिर के पुजारी पंचू ठाकुर बताते हैं कि इस पूजा में मूल भोक्ता और पाठ भोक्ता की विशेष भूमिका होती है। उनके द्वारा पूरे विधि-विधान से पूजा संपन्न कराई जाती है। पूजा के दौरान पारंपरिक वाद्य यंत्रों की धुन पर भोक्ता चैताली गीतों पर नृत्य करते हैं, जिससे पूरा वातावरण भक्तिमय हो उठता है। वहीं शाम के समय महिलाओं द्वारा भव्य संध्या आरती की जाती है, जिसमें हजारों की संख्या में श्रद्धालु शामिल होते हैं। मुख्य पुजारी भागीरथ सिंह के अनुसार, इस वर्ष 400 से अधिक भोक्ता इस अनुष्ठान में शामिल हो रहे हैं। विधिवत पाठ पूजा के बाद माँ सिंहवाहिनी की पूजा की जाती है और अंत में किसी भी त्रुटि के लिए क्षमा याचना के साथ अनुष्ठान का समापन किया जाता है।
पांच दिनों तक चलेगा भक्ति और उत्सव का संगम 10 अप्रैल: नहाय-खाय के साथ शुरुआत 11 अप्रैल: गजन बेड़ा, पट पूजा, नदी स्नान, हाविष 12 अप्रैल: राजा बांध और मधुपुरिया बाबा आंगन में भोक्ता नृत्य, फलाली 13 अप्रैल: मेला चरम पर—संध्या आरती, शिव श्रृंगार, भक्त नाच, पहाड़ ढासा, फूल खेला, भेरो झूला 14 अप्रैल: भोक्ता अग्नि खेला, निर्जल वितरण 15 अप्रैल: चड़क पूजा, मुंडन और माँ सिंहवाहिनी पूजा के साथ समापन

