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दो युवाओं की मेहनत से बदली गांव की तकदीर:फल उत्पादन बना रोजगार और प्रेरणा का नया मॉडल, सेब और संतरा की भी शुरू की खेती


बोकारो जिले के महुआर गांव से सटे चिटाही गांव के दो युवाओं ने अपनी मेहनत, सोच और नवाचार से गांव की तस्वीर बदलने का काम किया है। कमलेश कुमार (डिप्लोमा इन फार्मेसी, जूलॉजी ऑनर्स) और आशिक कुमार (बी.एससी ऑनर्स केमिस्ट्री, डिप्लोमा इन इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग) ने यह साबित कर दिया है कि अगर इरादे मजबूत हो तो खेती में भी एक सफल करियर बन सकता है। दरअसल, चिटाही गांव में लोग आमतौर पर सब्जियों का उत्पादन करते हैं। इससे उन्हें ज्यादा मुनाफा नहीं हो पाता है। अब कमलेश और आशिक ने लोगों को फल की खेती की सीख दे रहे हैं। इससे माना जा रहा है कि आने वाले समय में यहां अन्य लोग भी फल उत्पादन पर ध्यान देंगे और ज्यादा कमाई कर सकेंगे। तीन एकड़ जमीन पर पर की खेती
पढ़ाई पूरी करने के बाद, जहां अधिकतर युवा नौकरी की तलाश में शहरों की ओर रुख करते हैं, वहीं इन दोनों दोस्तों ने गांव में रहकर खेती को अपनाने का साहसिक निर्णय लिया। उन्होंने पारंपरिक खेती से हटकर दो साल पहले फलोत्पादन की दिशा में कदम बढ़ाया और आज तीन एकड़ जमीन पर एक सफल मॉडल तैयार कर लिया है। इन युवाओं ने देश के विभिन्न राज्यों के फलों पर गहन अध्ययन कर लगभग 10 से 15 किस्मों के पौधे लगाए हैं। इनमें केला, लाल केला, आम्रपाली और स्वर्णरेखा आम, चीकू, सेब, संतरा, माल्टा, केरालियन नारियल, पपीता और लीची जैसे फल शामिल हैं। खास बात यह है कि उन्होंने इस पहल की शुरुआत मात्र 5000 रुपए से की थी, जो आज एक प्रेरणादायक उदाहरण बन चुकी है। यहां केले की खेती को असंभव मानते थे लोग
जिस जमीन पर पहले केले की खेती को असंभव माना जाता था, उसी जमीन पर इन युवाओं ने पिछले वर्ष लगभग 35 हजार केले का उत्पादन कर सभी को चौंका दिया। इस सफलता की खुशी में उन्होंने गांव के लोगों के बीच केले वितरित किए और सदर अस्पताल के मरीजों को भी करीब 3000 केले बांटे। अब ये दोनों युवा अपने इस प्रोजेक्ट को और विस्तार देने के लिए सरकारी और निजी संस्थाओं से सहयोग की उम्मीद कर रहे हैं, ताकि वे और अधिक लोगों को रोजगार दे सकें और गांव के विकास में अहम भूमिका निभा सकें।

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