पहले बकरी चराती थी, आज 1 लाख की दुकान:छपरा की सरिता बोलीं- सिलाई-कढ़ाई से रोजगार दे रही हूं; जीविका दीदियों की कहानी

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“मैं सरिता देवी हूं। मुझे बचपन से सिलाई-कढ़ाई और पेंटिंग का शौक था, लेकिन शादी के बाद सब छूट गया , लेकिन मन में कुछ करने का सपना था। जीविका समूह के बारे में पता चला। इस समूह से जुड़ने के बाद मुझे 10 हजार रुपए मिले, जिससे मैंने सिलाई मशीन खरीदी और काम फिर से शुरू किया।

आज मैं अपने हुनर से खुद कमा रही हूं और अपने साथ अन्य महिलाओं को भी रोजगार दे रही हूं।” सारण के भित्ती बाजार की रहने वाली सरिता ने दैनिक भास्कर से बातचीत में ये बातें कहीं। सरिता को बिहार मुख्यमंत्री महिला स्वरोजगार योजना के तहत 10 हजार रुपए की सहायता मिली, जिससे उन्होंने अपना रोजगार शुरू किया। सरिता की तरह ही भित्ती बाजार की रहीम बेगम और रीता देवी भी हैं, जिन्हें इस योजना से खुद के दम पर खड़ा होने का मौका मिला। इन महिलाओं ने 10 हजार रुपए से आत्मनिर्भर बनने का सफर कैसे तय किया? पैसों की प्लानिंग कैसे की? क्या सबकुछ अकेले किया या किसी से मदद लेनी पड़ी? आज वे कितनी कमाई कर रही हैं, पढ़िए पूरी रिपोर्ट… “हुनर को मौका मिला तो जिंदगी बदल गई”
सरिता देवी ने कहा कि “मुझे बचपन से ही सिलाई-कढ़ाई और पेंटिंग का बहुत शौक था, लेकिन शादी के बाद घर की जिम्मेदारियों में यह हुनर कहीं दब गया। मैं चाहकर भी कुछ नहीं कर पा रही थी। जब गांव में ‘जीविका दीदी’ समूह बना, तो लोगों ने मुझे भी जुड़ने की सलाह दी। मैंने सोचा कि शायद इससे मुझे अपने हुनर को फिर से जीने का मौका मिलेगा, इसलिए मैं समूह से जुड़ गई। समूह में काम करते-करते मुझे जिम्मेदारी भी मिली और मैं कोषाध्यक्ष बन गई। फिर मुझे मुख्यमंत्री महिला स्वरोजगार योजना के तहत 10 हजार रुपए मिले। मैंने इस राशि के साथ परिवार के लोगों से थोड़ा सहयोग लिया और करीब 12 हजार रुपए में दो सिलाई मशीन खरीदी। इसके बाद मैंने फिर से अपना काम शुरू किया। धीरे-धीरे लोगों को मेरा काम पसंद आने लगा। अब मैं सिलाई, कढ़ाई और पेंटिंग का काम करती हूं। मेरे बनाए कपड़े और डिजाइन समूह के जरिए बाजार तक पहुंचते हैं। आज मेरी इनकम बढ़ी है और सबसे खुशी की बात यह है कि मैंने अपने साथ दो-तीन और महिलाओं को भी काम दिया है। अब मैं न सिर्फ खुद आत्मनिर्भर हूं, बल्कि दूसरों को भी रोजगार दे रही हूं। मुझे लगता है कि अगर मौका मिले, तो महिलाएं कुछ भी कर सकती हैं।” सरिता देवी की तरह रहीम बेगम और रीता देवी की कहानी… “छोटी दुकान से आज घर संभाल रही हूं” रहीम बेगम ने कहा कि “पहले हमारा पूरा घर मेरे पति की कमाई पर चलता था। आमदनी कम थी और खर्च ज्यादा, ऐसे में हर महीने किसी तरह गुजारा होता था। मैं बकरी पालन करके थोड़ा-बहुत सहयोग करती थी, लेकिन उससे ज्यादा फर्क नहीं पड़ता था। जब गांव में ‘जीविका दीदी’ समूह के बारे में पता चला, तो मैंने भी जुड़ने का फैसला किया। वहां जाकर मुझे नई बातें सीखने को मिलीं और आत्मविश्वास भी बढ़ा। फिर मुझे बिहार मुख्यमंत्री महिला स्वरोजगार योजना के तहत 10 हजार रुपए मिले। मैंने सोचा कि कुछ ऐसा काम शुरू किया जाए, जिससे रोज आमदनी हो। पहले मैं बकरी पालन करती थी, लेकिन मिले 10 हजार रुपए से मैंने घर के पास गुमटी में एक छोटी किराना दुकान खोल ली। शुरुआत में दुकान बहुत छोटी थी, लेकिन धीरे-धीरे मैंने सामान बढ़ाया। आज मेरी दुकान में करीब एक लाख रुपए का सामान है। गांव के लोग मेरी दुकान से ही सामान लेते हैं। अब मैं हर महीने करीब 2 से 3 हजार रुपए का शुद्ध मुनाफा कमा लेती हूं और अपने पति के साथ कंधे से कंधा मिलाकर घर चला रही हूं। मुझे अब किसी पर निर्भर रहने की जरूरत नहीं है।” “बांस के काम ने मुझे नई पहचान दी”
रीता देवी का कहना है कि “हमारा घर पहले बहुत मुश्किल से चलता था। मेरे पति जो भी कमाते थे, उसका बड़ा हिस्सा शराब में चला जाता था। ऐसे में घर चलाना मेरे लिए बहुत मुश्किल हो गया था। कई बार तो रोजमर्रा की जरूरतें पूरी करना भी कठिन हो जाता था। इसी बीच मुझे ‘जीविका दीदी’ समूह के बारे में पता चला। मैंने सोचा कि शायद इससे कुछ रास्ता निकले, इसलिए मैं भी इससे जुड़ गई। समूह से जुड़ने के बाद मुझे काम करने के नए तरीके और हौसला मिला। फिर मुझे भी मुख्यमंत्री महिला स्वरोजगार योजना के तहत 10 हजार रुपए की सहायता मिली। मैंने उस पैसे से बांस खरीदकर टोकरी और अन्य बांस उत्पाद बनाना शुरू किया। शुरुआत में मुझे थोड़ा समय लगा, लेकिन धीरे-धीरे मैंने सूप, पंखा और टोकरी जैसे सामान बनाना सीख लिया। अब मैं ये सामान बनाकर आसपास के गांवों में बेचती हूं। इस काम से मुझे हर महीने 3 से 5 हजार रुपए तक की आमदनी होने लगी है। अब घर की हालत पहले से काफी बेहतर है। सबसे बड़ी बात यह है कि अब मुझे खुद पर भरोसा हो गया है। मैं अपने फैसले खुद लेती हूं और अब किसी पर निर्भर नहीं हूं।” ग्रामीण बोले- इनके घर की हालत अब बेहतर
भित्ती गांव निवासी सीताराम प्रसाद ने बताया कि ‘जीविका दीदी’ समूह से जुड़ने के बाद इन महिलाओं के जीवन में बड़ा बदलाव आया है। लोगों ने बताया कि पहले ये महिलाएं आर्थिक रूप से दूसरों पर निर्भर थीं, लेकिन अब अपनी मेहनत और आमदनी से न सिर्फ आत्मनिर्भर बनी हैं, बल्कि अपने परिवार को भी आर्थिक रूप से सहयोग दे रही हैं। इससे उनके घर की स्थिति पहले के मुकाबले काफी बेहतर हुई है।

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