Raudra Samvatsara Predictions 2026: साल 2025 अनेक अप्रत्याशित घटनाक्रम के साथ इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गया और साल 2026 का प्रारंभ हुआ। ऐसे में आम जनमानस इस उम्मीद में है कि जो 2025 में हुआ उसकी पुनरावृत्ति फिर कभी न हो। हालांकि 2026 की ग्रह स्थिति, चंद्र ग्रहण और नव संवत्सर का अध्ययन करने पर स्थितियां कुछ अच्छी नजर नहीं आ रही हैं। आइए विस्तार से जानते हैं…
एक पखवाड़े (15 दिनों) में दो ग्रहण (सूर्य और चंद्र) का होना ज्योतिषीय रूप से अशुभ माना जाता है, जो महाभारत काल की तरह वैश्विक अशांति, युद्ध के आसार, और प्राकृतिक आपदाओं (भूकंप, तूफान) के संकेत देता है। यह स्थिति देश-दुनिया में राजनीतिक तनाव, आर्थिक उथल-पुथल, और स्वास्थ्य संकट में वृद्धि का कारण बन सकती है।

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दो सप्ताह के अंतराल में दो प्रमुख ग्रहण
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दो सप्ताह के अंतराल में दो प्रमुख ग्रहण
इस वर्ष दो प्रमुख ग्रहण असामान्य रूप से एक दूसरे के बेहद करीब, मात्र दो सप्ताह के अंतराल पर होना। पहला ग्रहण 17 फरवरी, 2026 को फाल्गुन अमावस्या को सूर्य ग्रहण हुआ। यद्यपि यह ग्रहण भारत में दृश्य नहीं रहा किन्तु दुनिया के कई देशों में इसको देखा गया। कोई धार्मिक प्रभाव, सूतक आदि नहीं रहा किन्तु ज्योतिष शास्त्र के अनुसार ग्रहण को ऊर्जा परिवर्तन का समय माना जाता है। इस दौरान ग्रहों की स्थिति मानव मन प्रकृति और सामाजिक घटनाओं को प्रभावित करती है।

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चंद्र ग्रहण 2026
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चंद्र ग्रहण 2026
दूसरा चंद्र ग्रहण 3 मार्च, 2026 को होगा, जिस दिन देश में होलिका दहन मनाया जा रहा है। यह पूर्ण चंद्रग्रहण होगा, जिसके दौरान पृथ्वी की छाया चंद्रमा पर पड़ेगी और यह भारत से दिखाई देगा। चन्द्र ग्रहण के कारण इस वर्ष होलिका दहन 2 मार्च को भद्रा के पुंछ काल में होगा यह वह स्थिति है। जब कोई विकल्प नहीं मिलता तब भद्रा होते हुए भी पूंछ काल का चयन करना पड़ता है, कुछ मतानुसार ग्रहण के बाद का समय यानी 3 मार्च को होलिका दहन बताया जा रहा है किन्तु होलिका दहन पूर्णिमा में होता है और ग्रहण समाप्ति के बाद प्रतिपदा तिथि लग जायेगी, यहां हमारा आशय यह है कि होलिका दहन का मुहूर्त की यह स्थिति भी बहुत शुभ संकेत नहीं दे रही है।

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विनाशकारी संकेत दे रही हैं ये घटनाएं
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विनाशकारी संकेत दे रही हैं ये घटनाएं
दूसरी स्थिति होली के पहले कुंभ राशि में 23 फरवरी 2026 से सूर्य, मंगल, बुध, शुक्र और राहु की युति से एक शक्तिशाली पंचग्रही योग बना है। सूर्य, मंगल और राहु की युति कभी शुभ फल नहीं देती। दिसंबर 2019 में दिसंबर में धनु राशि में छ: ग्रह एक साथ आये थे,और सूर्य ग्रहण भी था। इसके बाद भारत सहित दुनिया ने कोविड का कठिन दौर झेला था।
इस वर्ष भी एक पखवाड़े में दो ग्रहण और कुंभ राशि में बन रही ग्रहों की यह स्थितियां पूरे विश्व में हलचल पैदा कर देंगी। विश्व में युद्ध की स्थिति बनेगी जिसमें कई देश प्रभावित होंगे। कुंभ राशि में राहु, मंगल और सूर्य की युति विध्वंसकारी योग बनाएगा, कई देशों की सत्ता और शासन हिल जायेगा, वैश्विक स्तर पर यह योग विनाशकारी साबित होगा।

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बृहस्पति
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रौद्र संवत्सर का आरंभ
19 मार्च को रौद्र नामक संवत्सर शुरू हो रहा है, 19 मार्च को अमावस्या में प्रतिपदा के क्षय होने से संवत् का प्रथम दिन क्षय को प्राप्त है ,संवत् रौद्र नाम का है l यह दोनों स्थितियां शासन सत्ता और आम जनमानस में टकराव की स्थिति बनायेगा। सूर्य,मंगल, राहु की युति जब कभी होती है तब तब सत्ता की श्रेष्ठता का शिखर झुकता है l सत्ता और शासन का विकृत रूप दिखता है।
यदि इसी योग के साथ साथ बृहस्पति एक संवत के भीतर त्रिराशि (तीन राशियों में गोचर) स्पर्श करते हैं तब धर्म जगत में विप्लव उठता है l संत ही एक दूसरे के विरुद्ध जहर उगलने लगते हैं l एक संत दूसरे संत को प्रताड़ित करने लगता है, मर्यादा कलंकित होने लगती है। जब तक बृहस्पति कन्या राशि में नहीं चले जाते तब तक यह दुर्योग अपना असर दिखाएगा l




