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राजधानी के मोरहाबादी मैदान में हस्तशिल्प और कला का महाकुंभ उमड़ पड़ा है। झारक्राफ्ट द्वारा आयोजित ‘राजकीय हथकरघा एवं सरस मेला 2026’ में इस बार झारखंड की माटी की महक और कारीगरों का हुनर सातवें आसमान पर है। मेले में लगे 650 स्टॉल न केवल व्यापार का केंद्र हैं, बल्कि ये बिचौलियों को हटाकर सीधे कारीगरों को ग्राहकों से जोड़ने का एक सशक्त जरिया बन गए हैं। मेले में हैंडमेड चीजों की खूब मांग है।
सांस्कृतिक शाम: छऊ और झूमर की थाप मेले के मंच पर हर शाम झारखंड की लोक संस्कृति जीवंत हो रही है। मंगलवार को मानभूम से आए छऊ दल ने अपनी ओजपूर्ण प्रस्तुति से दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। इसके बाद झूमर नृत्य, हिंदी गायन और एक मार्मिक नृत्य नाटिका का मंचन किया गया। अगर आप झारखंडी विरासत और ऑर्गेनिक प्रोडक्ट्स के शौकीन हैं, तो 20 मार्च से पहले एक बार मोरहाबादी जरूर जाएं। आने वाले सरहुल पर्व को देखते हुए मेले में पारंपरिक परिधानों की जबरदस्त धूम है। हाथ से बने ‘कुखेना गमछा’ की सबसे ज्यादा डिमांड है। मात्र 220 रुपए की कीमत वाले इस गमछे को लोग सरहुल पर ओढ़ने और उपहार देने के लिए थोक में खरीद रहे हैं। लाल व सफेद बंडी और कोट भी युवाओं को खूब लुभा रहे हैं। सरहुल का क्रेज: कुखेना गमछे की मांग जुगलबंदी: झारक्राफ्ट के एजीएम (मार्केटिंग) राहुल मिश्रा ने बताया कि इस साड़ी का बेस गोड्डा के भगैया में पुरुष बुनकरों द्वारा तैयार किया गया है। रांची का टच: बुनाई के बाद इसे रांची स्थित झारक्राफ्ट के डिजाइन स्टूडियो लाया गया, जहां महिला कलाकारों ने कूची से इसे जीवंत किया। 14 दिन की तपस्या: एक साड़ी पर सोहराई की बारीक पेंटिंग और कढ़ाई करने में महिलाओं को लगभग 14 दिनों का समय लगा है। मेले में इस बार सबसे ज्यादा चर्चा सोहराई पेंटिंग वाली हैंडमेड तसर साड़ी की हो रही है। इसकी कीमत 12,442 रुपए है, लेकिन इसके पीछे की कहानी इसे अनमोल बनाती है।
12 हजार की साड़ी के पीछे महिलाओं का ‘धैर्य’
भगैया की बुनाई और रांची की कलाकारी, 14 दिनों की मेहनत से निखरी ‘तसर साड़ी’
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