रांची का आड्रे हाउस ‘वर्ल्ड थिएटर डे’ पर रहेगा सुनसान:कलाकारों ने नाटक के लिए मांगा मुक्ताकाश मंच, मंत्री बोले- मुफ्त में नहीं मिलेगा

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राजधानी की शामें अक्सर ऑड्रे हाउस के मुक्ताकाश मंच से गूंजने वाले संवादों और तालियों की गड़गड़ाहट से रोशन होती रही हैं। लेकिन इस बार 27 मार्च को जब पूरी दुनिया ‘वर्ल्ड थिएटर डे’ मना रही होगी, तब रांची के कलाकारों के हिस्से में सिर्फ खामोशी और मायूसी होगी। जिस मंच ने 13 सालों से नि:शुल्क कला की सेवा की, वहां आज ‘किराये की रसीद’ और ‘नफा-नुकसान’ का पहरा बैठ गया है। साल 2013 से एक परंपरा चली आ रही थी। ‘युवा नाट्य संगीत अकादमी’ हर साल 27 मार्च को ‘छोटानागपुर नाट्य महोत्सव’ का आयोजन करती थी। यह सिर्फ एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि रांची के कला प्रेमियों के लिए एक उत्सव था। पिछले साल 2025 में भी 4 दिवसीय भव्य महोत्सव ने राजधानी को अपनी संस्कृति से जोड़े रखा था। लेकिन 2026 की यह बसंत कलाकारों के लिए पतझड़ लेकर आई है। मंत्री बोले – 4 दिन में हो जाएगा एक लाख का नुकसान जब संस्था के निदेशक ऋषिकेश लाल इस बार आवेदन लेकर कला-संस्कृति मंत्री सुदिव्य कुमार सोनू के पास पहुंचे, तो उम्मीद थी कि प्रोत्साहन मिलेगा। मगर जवाब मिला- ‘4 दिन में एक लाख का नुकसान हो जाएगा, क्योंकि एक दिन का किराया 25 हजार है।’ एक संवेदनशील कलाकार के लिए यह शब्द किसी चोट से कम नहीं थे। जहां सरकारें कला को संरक्षण देने का दावा करती हैं, वहां ‘25 हजार के मुनाफे’ के लिए 13 साल की परंपरा की बलि चढ़ा दी गई। मंत्री ने दो टूक कह दिया- ‘फ्री में अब नहीं मिलेगा।’ कला को एक अदद ‘मंच’ तो दीजिए एक शहर सिर्फ सड़कों व इमारतों से नहीं बनता, वह अपनी कला व संस्कृति से सांस लेता है। जब एक विभाग यह हिसाब लगाने लगे कि एक नाटक से उसे कितने हजार का ‘नुकसान’ हो रहा है, तो समझ लीजिए कि वह विभाग ‘संस्कृति’ का नहीं है। 27 मार्च को ऑड्रे हाउस में लाइटें तो जलेंगी, पर रूह गायब होगी। क्या 25 हजार रुपए की रकम इतनी बड़ी हो गई कि रांची के हजारों कला प्रेमियों की मुस्कुराहट व कलाकारों की मेहनत उससे छोटी पड़ गई? कला कोई व्यापारिक वस्तु नहीं, समाज की साझी विरासत है। सरकार व विभाग को चाहिए कि वे व्यावसायिक हितों को दरकिनार कर कलाकारों को निशुल्क मंच दें, ताकि शहर की सांस्कृतिक पहचान बनी रहे। मंत्री बोले… मुफ्त वाला कल्चर अब खत्म कला-संस्कृति मंत्री सुदिव्य कुमार सोनू बोले कि मुफ्त वाला कल्चर अब खत्म हो गया है। संस्थान को चलाने के लिए पैसों की जरूरत होती है। रेट रिवाइज हुआ, उस रेट में यदि ऑड्रे हाउस लेना चाहते हैं तो ले सकते हैं। बगैर पैसे के मेंटेनेस का खर्च कैसे निकलेगा। हर साल 4 दिन में हजारों दर्शक नाटक देखने आते थे ऋषिकेश लाल की आंखों में वह दर्द साफ दिखता है जो एक माली को अपना बगीचा उजड़ते देख होता है। वे कहते हैं, “हम 13 साल से मुफ्त में लोगों को नाटक दिखाते थे। देश के अलग-अलग शहरों से बेहतरीन ग्रुप आते थे, 4 दिन में हजारों दर्शक जुड़ते थे। आज जब सरकार ने हाथ खींच लिए, तो कलाकार ठगा सा महसूस कर रहा है।” प्रसिद्ध रंगकर्मी व शिक्षाविद् डॉ. प्रो. कमल बोस ने शोक व्यक्त किया है। उन्होंने कहा: ‘राजधानी में रंगकर्म के लिए एक जगह न होना समाज के लिए शर्म की बात है। जो जगह उपलब्ध है, उसका शुल्क इतना अधिक है कि कलाकारों की पहुंच से बाहर है। पैसों की वजह से कला व आम आदमी के बीच दीवार खड़ी हो जाए, तो डूब मरने जैसी बात है। विभाग को जागना होगा, वरना रांची की पहचान से ‘संस्कृति’ शब्द मिट जाएगा।’ मंत्री से निराशा हाथ लगी तो उम्मीद की किरण कला-संस्कृति निदेशक आसिफ एकराम की ओर मुड़ी। लेकिन वहां भी पेचीदगियों ने रास्ता रोक लिया। निदेशक ने आवेदन पीए को थमाया, और वहां से जवाब मिला— “इसमें नि:शुल्क नहीं लिखा है, मंत्री जी से लिखवाकर लाइए।” सत्ता के गलियारों और दफ्तरों के चक्कर काटते-काटते एक महोत्सव दम तोड़ गया। अंततः तय हुआ कि इस बार ऑड्रे हाउस में नाटकों का मंचन नहीं होगा। इस बारे में जब संस्कृति विभाग के डायरेक्टर आसिफ एकराम से बात करने की कोशिश की गई तो उन्होंने फोन नहीं उठाया।

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