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कुल 161 आईएएस में से 34 अधिकारी गए बाहर, 7 मई के बाद लौटने की संभावना झारखंड में इन दिनों शीर्ष प्रशासनिक स्तर पर अधिकारियों की कमी महसूस की जा रही है। यह स्थिति पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु समेत पांच राज्यों में हो रहे विधानसभा एवं उपचुनावों के लिए केंद्रीय निर्वाचन आयोग द्वारा झारखंड कैडर के 34 वरिष्ठ अधिकारियों को ऑब्जर्वर (प्रेक्षक) नियुक्त किए जाने के कारण बनी है। राज्य में कार्यरत कुल 161 आईएएस अधिकारियों में से सचिव और विशेष सचिव रैंक के 34 अधिकारी लगभग 52 दिनों तक राज्य से बाहर रहेंगे। इनमें से अधिकांश अधिकारी 17 मार्च से ही बाहर हैं और उनके 7 मई के बाद लौटने की संभावना है। ऐसे में करीब डेढ़ महीने से अधिक समय तक राज्य का प्रशासनिक ढांचा सीमित संसाधनों के साथ काम कर रहा है। स्थिति यह है कि कई विभागीय प्रधानों का तो दूसरे अधिकारियों का प्रभार भी नहीं दिया जा सका है। इसका सबसे अधिक असर वित्तीय वर्ष के अंतिम चरण और नए वित्तीय वर्ष की शुरुआत पर पड़ा है। सामान्यतः मार्च में योजनाओं के खर्च का निपटारा, बजट उपयोग की समीक्षा और नई योजनाओं की रूपरेखा तय की जाती है, लेकिन इस बार कई विभागों में निर्णय प्रक्रिया धीमी पड़ गई है। किन राज्यों में गए अधिकारी राज्य आईएएस प. बंगाल 24 तमिलनाडु 05 पुडुचेरी 02 केरल 02 असम 01 श्रम, वाणिज्य कर और भू-राजस्व जैसे विभागों पर असर ज्यादा अधिकारियों की अनुपस्थिति के कारण कई महत्वपूर्ण फाइलें लंबित हैं और नीतिगत फैसले टल रहे हैं। इधर, मुख्यमंत्री पिछले एक सप्ताह से असम चुनाव में व्यस्त हैं और उनके 8 अप्रैल को लौटने की संभावना है। हालांकि, सरकार के शीर्ष स्तर पर यह बात संज्ञान में है कि मार्च-अप्रैल जैसे महत्वपूर्ण समय में बड़ी संख्या में अधिकारियों की अनुपस्थिति से कामकाज प्रभावित हो रहा है। विशेष रूप से कल्याण, कृषि, वन, ग्रामीण विकास, श्रम, वाणिज्य कर और भूराजस्व जैसे विभागों पर इसका अधिक असर देखा जा रहा है। हालांकि यह पुरानी परंपरा है कि विधानसभा चुनाव में प्रेक्षक के तौर पर दूसरे राज्यों के आईएएस अधिकारियों की तैनाती भारत निर्वाचन आयोग द्वारा की जाती है। लेकिन, इस बार संख्या ज्यादा होने से झारखंड में प्रशासनिक दबाव बढ़ा है। चुनाव प्रेक्षक बनने वाले ये वरीय अधिकारी दूसरे राज्यों में भेजे गए एचटीआई के निदेशक मनीष रंजन, वन सचिव अबूबकर सिद्दीख पी., खाद्य आपूर्ति के सचिव राजेश कुमार शर्मा, कल्याण सचिव कृपानंद झा, ग्रामीण विकास सचिव मनोज कुमार, रांची के प्रमंडलीय आयुक्त मनोज कुमार, श्रम सचिव जितेंद्र कुमार सिंह, भू राजस्व सचिव चंद्रशेखर, वाणिज्य कर सचिव अमित कुमार, पेयजल सचिव अबु इमरान, भू-राजस्व विभाग के विशेष सचिव ए. दोड्डे, रिम्स के अपर निदेशक वाघमारे प्रसाद कृष्णा, श्रमायुक्त संदीप सिंह, सिविल डिफेंस कमिश्नर घोलप रमेश गोरख, मनरेगा आयुक्त मृत्युंजय कुमार बरनवाल, पशुपालन निदेशक आदित्य कुमार आनंद, सुडा निदेशक, सूरज कुमार, समाज कल्याण निदेशक किरण कुमारी पासी, झारखंड शिक्षा परियोजना निदेशक शशि रंजन,कृषि निदेशक भोर सिंह यादव, जिडको एमडी वरुण रंजन, पेयजल स्वच्छता विभाग के अपर सचिव शशि रंजन, नगरीय प्रशासन निदेशक नैंसी सहाय, जेपीएससी के सचिव संदीप कुमार, आदिवासी कल्याण आयुक्त कुलदीप चौधरी, उद्यान निदेशक माधवी मिश्रा, कौशल विकास के सीईओ एसके लाल, भवन निर्माण के विशेष सचिव विधान चंद्र चौधरी, समाज कल्याण के विशेष सचिव अभयनंदन अंबष्ट, उत्पाद आयुक्त लोकेश मिश्र, पर्यटन निदेशक विजया नारायण राव और उद्योग निदेशक विशाल सागर व अन्य। विभागों में अतिरिक्त प्रभार से बढ़ा दबाव वरीय अधिकारियों की गैरमौजूदगी में कई विभागों का अतिरिक्त प्रभार दूसरे अधिकारियों को दिया गया है। जिससे एक-एक अधिकारी के पास दो से तीन विभागों की जिम्मेदारी आ गई है। नतीजतन, फाइलों के निष्पादन में देरी हो रही है। योजनाओं के क्रियान्वयन पर असर : राज्य सरकार की कई प्रमुख योजनाएं इस समय क्रियान्वयन के दौर में हैं। लेकिन मॉनिटरिंग और निर्णय लेने वाले अधिकारियों के बाहर रहने से जमीनी स्तर पर भी इसका असर दिख रहा है। जिलों से आने वाले प्रस्तावों और रिपोर्ट पर समय पर निर्णय नहीं हो पा रहा है।

