शहीद के पिता बोले- ठेला चलाकर सेना में भेजा था:जम्मू-कश्मीर में समस्तीपुर का जवान शहीद; अप्रैल में घर आने वाले थे, आज होगा अंतिम संस्कार

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जम्मू-कश्मीर में आतंकियों से मुठभेड़ में सेना के जवान सीताराम राय (40) शहीद हो गए। शहीद जवान सीताराम राय समस्तीपुर जिले के मोरवा के लोदीपुर गावं के रहने वाले थे। गुरुवार की देर रात पार्थिव शरीर पैतृक गांव पहुंचा। शुक्रवार को अंतिम संस्कार होगा। बुधवार की सुबह पत्नी सुमन राय से ड्यूटी पर जाने के दौरान वीडियो कॉल पर बात हुई थी। शहीद जवान के दोस्त सर्वेंदु ने कहा कि पत्नी से उन्होंने बताया था कि वो ड्यूटी पर जा रहे हैं। उसके बाद सुबह 11 बजे के करीब पत्नी को आर्मी यूनिट से फोन आया कि उन्हें गोली लग गई है। कुछ देर बाद मोबाइल पर शहीद हो जाने की सूचना आई। सीताराम राय के पिता कोलकाता में ठेला चलाने का काम करते थे। उन्होंने कहा कि, बेटे को ठेला चलाकर सेना में भेजा था। उसी की कमाई से घर चलता था। साल 2002 में उनकी बहाली इंडियन आर्मी में सिपाही के पद पर हुई थी। तब से कई सर्च ऑपरेशन में शामिल हुए। पिता बोले- ठेला चलाकर बेटे को पढ़ाया था शहीद के पिता सूरज राय ने बताया, हमने बहुत गरीबी में बच्चों को पढ़ाया था। मैं कोलकाता में ठेला चलाने का काम करता था। नहीं चाहता था कि बच्चे कभी वो दुख देखें जो मैंने देखा। इसलिए उन्हें हमेशा पढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया। मैं क्या करता हूं। कैसे पैसे कमाता हूं ये नहीं बताया। सीताराम का गांव के ही सरकारी स्कूल में एडमिशन कराया था। गांव के ही प्राइमरी और हाई स्कूल की पढ़ाई करने के बाद पटौदी कॉलेज से उसने इंटर की पढ़ाई की। इसके बाद उसका सिलेक्शन सेना में हो गया। बाद के दिनों में डिस्टेंस से उसने ग्रेजुएशन की पढ़ाई की। जिसके बाद उसे प्रमोशन मिला था और इन दिनों वह हवलदार बन गया था। भाई बोला- अप्रैल में घर आने वाले थे शहीद जवान के छोटे भाई शिवानंद राय ने बताया कि मुझे फोन से बुधवार रात 11 बजे जानकारी मिली कि भाई शहीद हो गए हैं। वो साढ़ू के बेटे के शादी में आए थे। 15 दिन पहले ही यहां से गए थे। अप्रैल में घर आने वाले थे। उनके आने पर बहुत सारे काम करने थे। भतीजा दोनों पैर से दिव्यांग है। घर भी बनवाना था। पिता भी बीमार रहते हैं। वो बहुत मदद करते थे। अब आगे कैसे करेंगे पता नहीं। दोस्त बोले- हमें उसके ऊपर गर्व है जवान के बचपन के दोस्त सर्वेंदु शरण ने बताया कि वो काफी मिलनसार व्यक्ति थे। परिवार गरीबी से लड़ रहा था। इसके बावजूद उन्होंने पढ़ाई करके नौकरी ली। सुबह ही उनकी पत्नी से बात हुई थी। कहा था कि मैं ड्यूटी पर जा रहा हूं। बाद में खबर मिली कि उन्हें गोली लगी है। कल रात में हमें मौत की खबर मिली। आज पूरे समाज को उन पर गर्व है। देश के सम्मान की वो हमेशा बात करते थे। बेटा दोनों पैरों से दिव्यांग है ग्रामीण भोला प्रसाद दिवाकर ने कहा कि सीताराम राय मिलनसार थे। सामाजिक काम में बढ़ चढ़कर हिस्सा लेते थे। पढ़ने में अच्छे थे। पढ़ाई के बाद नौकरी जॉइन की थी। शहीद को दो बेटा और एक बेटी है। बड़ा बेटा अनुज फिलहाल गांव में है। पिता की शहादत की खबर से दुखी है। वो दोनों पैर से दिव्यांग है। गांव में होगा अंतिम संस्कार परिवार के लोगों का कहना है कि गांव में आज उनका अंतिम संस्कार किया जाएगा। शहादत की खबर मिलते ही पंचायत में शोक की लहर छा गई। पत्नी सुमन राय, पिता सूरज राय, माता महारानी देवी, भाई शिवानंद राय का रो-रोकर बुरा हाल है। सीताराम के बचपन के दोस्त सौरवेंदु शरण ने बताया कि शव पहुंचने के बाद शव को उनके घर पर अंतिम दर्शन के लिए रखा जाएगा। जिसके बाद गांव के हाई स्कूल मैदान में श्रद्धाजलि सभा का आयोजन होगा। जहां जिले के डीएम और एसपी भी शामिल होंगे। जिसके बाद अंतिम संस्कार के लिए शव को गंगा तट पर ले जाया जाएगा। सौरवेंदु शरण ने आगे बताया कि दोनों प्राइमरी स्कूल से साथ पढ़े हैं। हाईस्कूल की पढ़ाई पूरी की। पटोरी कॉलेज में इंटर में नामांकन कराया। इंटर पास की। सीमाराम की शुरू से ही उसकी इच्छा सेना में जाने की थी। वह सुबह रोज दौड़ लगाते थे। उन्होंने पुरानी यादे ताजा करते हुए कहा कि गांव में क्रिकेट खेलने के दौरान अक्सर दो टीमों के बीच झगड़ा हो जाता था, तो वह बीच बचाव कर खेल की भावना से खेल खेलने के लिए लोगों को फिर से मनाते थे। उसका चयन सेना में हो गया। फोन पर उससे बातचीत होती रहती थी। कहा था कि अप्रैल में गांव आएगा। लेकिन देखिए अब उसका शव आ रहा है। गांव के युवाओं के लिए थे रोल मॉडल ग्रामीण भोला प्रसाद दिवाकर बताते हैं कि सीताराम उम्र में उनसे छोटे थे। जिस कारण गांव आने पर प्रणाम से ज्यादा कुछ नहीं होता था। लेकिन वह युवाओं के लिए गांव का रोल मॉडल था। इस गांव में सीताराम ही अकेला युवक था, जिसने सरकारी हासिल की थी। जिस कारण जब वह गांव आता था, तो नए युवा उनसे सेना में जाने के लिए जानकारी लेने के लिए आते थे। दिन भर नए युवकों की भीड़ लगी रहती थी। वो सब को आगे बढ़ने के लिए और पढ़ने के लिए प्रेरित करता था।

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