सरायकेला की गलियों में निकलेगी भगवान कृष्ण की शाही पालकी, भक्तों के संग खेलेंगे होली, 200 साल पुरानी परंपरा

Date:

सरायकेला, (शचिंद्र कुमार दाश/धीरज कुमार): सरायकेला-खरसावां जिले की होली पूरे झारखंड में अपने विशिष्ट सांस्कृतिक स्वरूप के लिए जानी जाती है. सांस्कृतिक नगरी सरायकेला में होली की तैयारियां पूरी हो चुकी हैं. यहां की होली अन्य जिलों से बिल्कुल अलग मिजाज की होती है. ओड़िशा के पुरी की तर्ज पर सरायकेला में होली के अवसर पर भगवान राधा-कृष्ण की पारंपरिक दोल यात्रा निकाली जाती है. दो मार्च 2026 को भगवान श्रीकृष्ण और राधा रानी विशेष पालकी पर सवार होकर नगर भ्रमण पर निकलेंगे और हर घर की चौखट पर पहुंचकर भक्तों के साथ गुलाल की होली खेलेंगे.

उत्कल संस्कृति की दिखेगी अनुपम झलक

होली के दिन सरायकेला में उत्कल की प्राचीन और समृद्ध सांस्कृतिक परंपरा जीवंत हो उठती है. दोल यात्रा के दौरान कृष्ण-हनुमान मिलन और हरि-हर मिलन जैसे धार्मिक अनुष्ठान होते हैं, जो इस आयोजन की खास पहचान हैं. श्रद्धालुओं के लिए यह केवल उत्सव नहीं, बल्कि आस्था और परंपरा का अद्भुत संगम होता है.

मृत्युंजय खास मंदिर से होगी दोल यात्रा की शुरुआत

जगन्नाथ पुरी की परंपरा के अनुरूप दोल पूर्णिमा के दिन राधा-कृष्ण की दोल यात्रा की शुरुआत कंसारी टोला स्थित मृत्युंजय खास श्रीराधा कृष्ण मंदिर से होगी. करीब ढाई वर्ष पुराने इस मंदिर में विधिवत पूजा-अर्चना के बाद कांस्य प्रतिमाओं का भव्य शृंगार किया जायेगा. इसके बाद पालकी में विराजमान होकर राधा-कृष्ण नगर भ्रमण पर निकलेंगे और नगरवासियों के साथ रंग-गुलाल खेलेंगे.

Also Read: बोकारो में केंद्रीय मंत्री सतीश चंद्र दुबे का बड़ा दावा- ’55 दिनों का स्टॉक तैयार, नहीं बुझेगी देश की बिजली’

शंखध्वनि-उलुकध्वनि से होगा स्वागत

दोल पूर्णिमा के दिन नगर भ्रमण के दौरान भक्त पारंपरिक वाद्य यंत्र मृदंग, झाल, गिनी के साथ दोल यात्रा में शामिल होंगे. हर घर में शंखध्वनि और उलुकध्वनि के साथ भगवान श्रीकृष्ण का स्वागत होगा. श्रद्धालु अपने घरों के सामने गोबर से लेपन कर अल्पना बनाएंगे और आरती उतारेंगे. इस वर्ष दोल यात्रा में घोड़ा नाच, काठी नाच और विशेष झांकियां भी आकर्षण का केंद्र रहेंगी.

1818 से चली आ रही है परंपरा

दोल यात्रा के मुख्य आयोजक और सरायकेला के कवि ज्योतिलाल साहू बताते हैं कि सरायकेला में दोल यात्रा की शुरुआत वर्ष 1818 में महाराजा उदित नारायण सिंहदेव के शासन काल में हुई थी. उस समय यह आयोजन फागू दशमी से दोल पूर्णिमा तक चलता था. वर्ष 1990 से आध्यात्मिक उत्थान श्री जगन्नाथ मंडली द्वारा पारंपरिक रूप से दोल यात्रा का आयोजन किया जा रहा है. वर्तमान में यह आयोजन एक ही दिन, दोल पूर्णिमा को होता है.

‘दोल यात्रा में दर्शन से मिलती है मुक्ति’

ज्योतिलाल साहू के प्रचलित श्लोक के अनुसार- “दोले तू दोल गोविंदम, चापे तू मधुसूदनम, रथे तू मामन दृष्टा, पुनर्जन्म न विद्यते…” का अर्थ है कि दोल (पालकी), रथ और नौका में प्रभु के दर्शन से जन्म-मरण के बंधन से मुक्ति मिलती है. यही कारण है कि दोल यात्रा के दौरान प्रभु का दर्शन दुर्लभ और अत्यंत पुण्यकारी माना जाता है. यह एकमात्र ऐसा अवसर होता है, जब प्रभु स्वयं भक्तों के साथ होली खेलने उनके घर तक पहुंचते हैं.

दोल यात्रा को मिलेगी राष्ट्रीय पहचान

सरायकेला नगर पंचायत के अध्यक्ष मनोज चौधरी ने कहा कि सरायकेला की सांस्कृतिक धरोहरों को संरक्षित करने की दिशा में ठोस पहल की जायेगी. दोल यात्रा यहां की अनमोल सांस्कृतिक विरासत है और इसे राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने के लिए प्रयास किेये जायेंगे. जिले की यह दोल यात्रा न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि सदियों पुरानी संस्कृति और लोक परंपराओं को जीवित रखने का उत्सव भी है, जिसका इंतजार पूरे क्षेत्र को हर साल रहता है.

Also Read: झारखंड के जुगसलाई में मरीन ड्राइव की तर्ज पर बनेगा नया कॉरिडोर, चेयरमैन नौशीन खान ने बताया विजन

The post सरायकेला की गलियों में निकलेगी भगवान कृष्ण की शाही पालकी, भक्तों के संग खेलेंगे होली, 200 साल पुरानी परंपरा appeared first on Prabhat Khabar.

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Share post:

Subscribe

spot_imgspot_img

Popular

More like this
Related

Join Us WhatsApp