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विधवा को नहीं मिला पति का बकाया वेतन, हाईकोर्ट ने दी तीन अधिकारियों की सैलरी रोकने की चेतावनी

विधवा को नहीं मिला पति का बकाया वेतन, हाईकोर्ट ने दी तीन अधिकारियों की सैलरी रोकने की चेतावनी

रांची से राणा प्रताप की रिपोर्ट

Jharkhand High Court: झारखंड हाईकोर्ट ने एक विधवा महिला को उसके दिवंगत पति का बकाया वेतन भुगतान नहीं किए जाने के मामले में राज्य सरकार और शिक्षा विभाग के अधिकारियों के रवैये पर कड़ी नाराजगी जतायी है. मुख्य न्यायाधीश एम.एस. सोनक और न्यायमूर्ति राजेश शंकर की खंडपीठ ने स्पष्ट कहा कि यदि निर्धारित समय सीमा के भीतर भुगतान नहीं किया गया, तो संबंधित अधिकारियों के जून 2026 के वेतन पर रोक लगाने का आदेश दिया जा सकता है.

एलपीए के आदेश के बाद भी नहीं हुआ भुगतान

मामला कंटेम्प्ट केस (सिविल) संख्या 1115/2025 से जुड़ा है, जिसमें समीना खातून ने अदालत की अवमानना याचिका दायर की है. इससे पहले 11 फरवरी 2025 को हाईकोर्ट की खंडपीठ ने एलपीए संख्या 596/2019 का निपटारा करते हुए राज्य सरकार को याचिकाकर्ता के पति के 9 सितंबर 1997 से 29 जुलाई 2011 तक के बकाया वेतन का भुगतान सात प्रतिशत वार्षिक ब्याज के साथ करने का निर्देश दिया था.

सुप्रीम कोर्ट ने भी खारिज कर दी थी एसएलपी

राज्य सरकार की ओर से इस आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका (एसएलपी) दायर की गयी थी. हालांकि, 23 सितंबर 2025 को सर्वोच्च न्यायालय ने एसएलपी को खारिज कर दिया. इसके बाद हाईकोर्ट ने 24 सितंबर 2025 को राज्य सरकार को आदेश का पालन करने का निर्देश देते हुए चेतावनी दी थी कि अनुपालन नहीं होने पर जिम्मेदार अधिकारियों को व्यक्तिगत रूप से अदालत में उपस्थित होना होगा.

अदालत ने अधिकारियों के रवैये को बताया अवमाननापूर्ण

सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि आदेश के बावजूद पूरा भुगतान नहीं किया गया और संबंधित अधिकारी भी अदालत में उपस्थित नहीं हुए. राज्य सरकार की ओर से यह दलील दी गयी कि 9 सितंबर 1997 से 31 मार्च 2000 तक के मस्टर रोल पर हस्ताक्षर उपलब्ध नहीं हैं, इसलिए उस अवधि का वेतन देय नहीं है. खंडपीठ ने इस तर्क को दुर्भाग्यपूर्ण बताते हुए कहा कि ऐसा कोई मुद्दा न तो पहले एकल पीठ, न ही खंडपीठ और न ही सुप्रीम कोर्ट में उठाया गया था. अदालत ने कहा कि अब इस तरह की दलील देना अधिकारियों के अवमाननापूर्ण आचरण को और गंभीर बनाता है.

आठ से दस सप्ताह का समय देने से किया इनकार

राज्य की ओर से अदालत से भुगतान के लिए आठ से दस सप्ताह का समय मांगा गया. अदालत ने इसे पूरी तरह अस्वीकार्य करार देते हुए कहा कि सरकार के रवैये के कारण याचिकाकर्ता के पति अपने जीवनकाल में मुकदमे का लाभ नहीं उठा सके और अब उसी प्रकार की पीड़ा विधवा को झेलनी पड़ रही है.

24 जून तक भुगतान करने का निर्देश

हाईकोर्ट ने माध्यमिक शिक्षा निदेशालय, रांची के निदेशक और स्कूली शिक्षा एवं साक्षरता विभाग के सचिव को निर्देश दिया कि 9 सितंबर 1997 से 31 मार्च 2000 तक की अवधि का बकाया वेतन सात प्रतिशत ब्याज सहित 24 जून 2026 तक याचिकाकर्ता को हर हाल में भुगतान किया जाये.

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वेतन रोकने की चेतावनी, 25 जून को अगली सुनवाई

अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि तय समय सीमा तक भुगतान नहीं किया गया, तो लोहरदगा के जिला शिक्षा पदाधिकारी, माध्यमिक शिक्षा निदेशक और स्कूली शिक्षा एवं साक्षरता विभाग के सचिव को व्यक्तिगत रूप से अदालत में उपस्थित होकर जवाब देना होगा कि उनके जून 2026 के वेतन पर रोक क्यों नहीं लगायी जाये. मामले की अगली सुनवाई 25 जून 2026 को दोपहर 2:15 बजे निर्धारित की गयी है, जहां अदालत आदेश के अनुपालन की स्थिति की समीक्षा करेगी.

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