समस्तीपुर में सरकारी नौकरी का झांसा देकर बिहार समेत दूसरे राज्यों के युवक-युवतियों को बंधक बनाने के मामले में पुलिस ने कार्रवाई तेज कर दी है। कंपनी से जुड़े पांच लोगों को शुक्रवार शाम जेल भेज दिया। जबकि अभी थी थाने पर चार लोगों से पूछताछ की जा रही है। मुफस्सिल थाने में एक प्राथमिकी भी दर्ज कराई गई है। इस मामले में लीड वीजन ट्रेडिंग इंडियन प्राइवेट लिमिटेड (गेलवे) के संचालक समेत अन्य को आरोपी बनाया गया है। जेल भेजे गए आरोपियों में दरभंगा जिले के बाजीपुर निवासी किशोर दास की पुत्री शाखा कुमारी, असम के तमोलपुर जिले के बीलपर निवासी अजीत ओरंग की पुत्री अंजुलियस ओरंग, गया के बैकठपुर के रहने वाले प्रमोद ठाकुर, असम के नवगाथ जिले के लाल गांव के निवासी याकूब की पुत्री पोलो उराव और कोयमडोर के लखीमपुर जिले के नौथ लखीम के रहने वाले पोलो उड़ांव के अलावा असम के ही नवगाथ की सुस्मिता कुमारी शामिल है। ‘बच्चों को जबरन रोका गया था’ एसपी अरविंद्र प्रताप सिंह ने बताया कि मुक्त कराए गए लोगों में 67 लड़का और 39 लड़कियां हैं। जिसमें से 29 लड़के और 10 लड़कियां नबालिग हैं। मुक्त कराए गए सभी बच्चों के अभिभावकों को बुलाया गया है। जिन्हें चाइल्ड लाइन के माध्यम से बच्चों को सौंपा जाएगा। सभी बच्चों से एक-एक कर पूछताछ की गई है। पूछताछ के दौरान यह बात सामने आयी है कि कंपनी में बच्चों को जबरन रोका गया था। कुछ लोग जिन्हें काम पसंद नहीं आया वह वापस जाना चाह रहे थे तो उन्हें जाने नहीं दिया जा रहा था। यहां तक की परिवार के लोगों से भी बात नहीं करने दिया जा रहा था। शारीरिक शोषण की शिकायत नहीं एसपी ने बताया कि लोकल स्तर पर भी शिकायत के बाद चेकिंग की जा रही थी। इसी दौरान कंपनी के चंगुल में फंसी एक लड़की के परिवार से संपर्क हुआ। जिसके बाद परिवार के लोगों ने मानवाधिकार आयोग से संपर्क किया। दिल्ली से मानवाधिकार आयोग के अधिकारी दो दिन पहले समस्तीपुर पहुंचे और बच्चों के छिपाने के ठिकानों की जानकारी ली। मानवाधिकार आयोग के अधिकारी इस मामले में एसपी और डीएम से सीधा संपर्क बनाया और बच्चों को रखे गए ठिकानों पर धावा बोला। जिसके बाद बच्चों की बरामदगी संभव हुई। सभी बच्चों से एक-एक कर बयान लिया गया है। अब तक किसी ने भी शारीरिक शोषण की शिकायत नहीं की है। रजिस्ट्रेशन के नाम पर लिए जाते थे 25 हजार रुपए जानकारी के मुताबिक कृषि विभाग के साथ ही अन्य विभागों में सरकारी नौकरी दिलाने के नाम पर बच्चों को बुलाया जाता था। रजिस्ट्रेशन के नाम पर 25 हजार रुपए लिए जाते थे। दो महीने की ट्रेनिंग के नाम पर बच्चों को रोका जाता था। आपस में एक दूसरे से बात करने की मनाही थी। नए बच्चों के साथ हमेशा कंपनी के कर्मी नजर रखने के लिए होते थे। फोन पर घर परिवार से बात नहीं करने देते थे। उनसे मार्केटिंग का काम कराया जाता था। जो लोग यह काम करने से मनाही करते थे उनके साथ मारपीट की जाती थी।
सरकारी नौकरी दिलाने के नाम पर बंधक बनाने का मामला:कंपनी के पांच कर्मियों को भेजा गया जेल; असम-बंगाल से युवक-युवतियों को बुलाया था
समस्तीपुर में सरकारी नौकरी का झांसा देकर बिहार समेत दूसरे राज्यों के युवक-युवतियों को बंधक बनाने के मामले में पुलिस ने कार्रवाई तेज कर दी है। कंपनी से जुड़े पांच लोगों को शुक्रवार शाम जेल भेज दिया। जबकि अभी थी थाने पर चार लोगों से पूछताछ की जा रही है। मुफस्सिल थाने में एक प्राथमिकी भी दर्ज कराई गई है। इस मामले में लीड वीजन ट्रेडिंग इंडियन प्राइवेट लिमिटेड (गेलवे) के संचालक समेत अन्य को आरोपी बनाया गया है। जेल भेजे गए आरोपियों में दरभंगा जिले के बाजीपुर निवासी किशोर दास की पुत्री शाखा कुमारी, असम के तमोलपुर जिले के बीलपर निवासी अजीत ओरंग की पुत्री अंजुलियस ओरंग, गया के बैकठपुर के रहने वाले प्रमोद ठाकुर, असम के नवगाथ जिले के लाल गांव के निवासी याकूब की पुत्री पोलो उराव और कोयमडोर के लखीमपुर जिले के नौथ लखीम के रहने वाले पोलो उड़ांव के अलावा असम के ही नवगाथ की सुस्मिता कुमारी शामिल है। ‘बच्चों को जबरन रोका गया था’ एसपी अरविंद्र प्रताप सिंह ने बताया कि मुक्त कराए गए लोगों में 67 लड़का और 39 लड़कियां हैं। जिसमें से 29 लड़के और 10 लड़कियां नबालिग हैं। मुक्त कराए गए सभी बच्चों के अभिभावकों को बुलाया गया है। जिन्हें चाइल्ड लाइन के माध्यम से बच्चों को सौंपा जाएगा। सभी बच्चों से एक-एक कर पूछताछ की गई है। पूछताछ के दौरान यह बात सामने आयी है कि कंपनी में बच्चों को जबरन रोका गया था। कुछ लोग जिन्हें काम पसंद नहीं आया वह वापस जाना चाह रहे थे तो उन्हें जाने नहीं दिया जा रहा था। यहां तक की परिवार के लोगों से भी बात नहीं करने दिया जा रहा था। शारीरिक शोषण की शिकायत नहीं एसपी ने बताया कि लोकल स्तर पर भी शिकायत के बाद चेकिंग की जा रही थी। इसी दौरान कंपनी के चंगुल में फंसी एक लड़की के परिवार से संपर्क हुआ। जिसके बाद परिवार के लोगों ने मानवाधिकार आयोग से संपर्क किया। दिल्ली से मानवाधिकार आयोग के अधिकारी दो दिन पहले समस्तीपुर पहुंचे और बच्चों के छिपाने के ठिकानों की जानकारी ली। मानवाधिकार आयोग के अधिकारी इस मामले में एसपी और डीएम से सीधा संपर्क बनाया और बच्चों को रखे गए ठिकानों पर धावा बोला। जिसके बाद बच्चों की बरामदगी संभव हुई। सभी बच्चों से एक-एक कर बयान लिया गया है। अब तक किसी ने भी शारीरिक शोषण की शिकायत नहीं की है। रजिस्ट्रेशन के नाम पर लिए जाते थे 25 हजार रुपए जानकारी के मुताबिक कृषि विभाग के साथ ही अन्य विभागों में सरकारी नौकरी दिलाने के नाम पर बच्चों को बुलाया जाता था। रजिस्ट्रेशन के नाम पर 25 हजार रुपए लिए जाते थे। दो महीने की ट्रेनिंग के नाम पर बच्चों को रोका जाता था। आपस में एक दूसरे से बात करने की मनाही थी। नए बच्चों के साथ हमेशा कंपनी के कर्मी नजर रखने के लिए होते थे। फोन पर घर परिवार से बात नहीं करने देते थे। उनसे मार्केटिंग का काम कराया जाता था। जो लोग यह काम करने से मनाही करते थे उनके साथ मारपीट की जाती थी।


