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रूफटॉप सोलर सिस्टम लगाने में झारखंड फिसड्डी, गुजरात पहले पायदान पर

Rooftop Solar Installation: भारत में रूफटॉप सोलर ऊर्जा के क्षेत्र में पिछले सात वर्षों के दौरान बड़ा बदलाव देखने को मिला है. वर्ष 2018 में 152 मेगावाट स्थापित क्षमता के साथ महाराष्ट्र देश में पहले स्थान पर था. उसके बाद कर्नाटक और तमिलनाडु का स्थान था, जबकि गुजरात 94 मेगावाट क्षमता के साथ चौथे स्थान पर था. लेकिन मार्च 2026 तक तस्वीर पूरी तरह बदल चुकी है. लेकिन, इस मामले में झारखंड फिसड्डी नजर आ रहा है. नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय (एमएनआरई) के आंकड़ों, जिन्हें क्लाइमेट कम्पैटिबल फ्यूचर्स (सीसीएफ) ने संकलित किया है, के अनुसार गुजरात अब 6,882 मेगावाट क्षमता के साथ देश में शीर्ष स्थान पर पहुंच चुका है. महाराष्ट्र 5,442 मेगावाट के साथ दूसरे स्थान पर है, जबकि राजस्थान और केरल क्रमशः 2,090 मेगावाट और 1,850 मेगावाट की क्षमता पार कर चुके हैं.

25.7 गीगावाट तक पहुंची देश की कुल क्षमता

मार्च 2026 तक देश की कुल रूफटॉप सोलर क्षमता 25.7 गीगावाट तक पहुंच चुकी है. अकेले वर्ष 2026 की पहली तिमाही में 2.7 गीगावाट नई क्षमता जोड़ी गयी, जो पिछले वर्ष की समान अवधि की तुलना में 125 प्रतिशत अधिक है. इस वृद्धि में 82 प्रतिशत योगदान आवासीय क्षेत्रों का रहा. इसमें प्रधानमंत्री सूर्य घर मुफ्त बिजली योजना की अहम भूमिका रही है. फरवरी 2024 में शुरू की गयी इस योजना के तहत परिवारों को 78 हजार रुपये तक की सब्सिडी प्रदान की जाती है और एक करोड़ घरों तक पहुंचने का लक्ष्य रखा गया है.

कुछ राज्यों तक सीमित रह गयी सौर क्रांति

रूफटॉप सोलर सिस्टम लगाने में झारखंड फिसड्डी, गुजरात पहले पायदान पर

सीसीएफ के विश्लेषण के अनुसार देश में रूफटॉप सोलर की वृद्धि समान रूप से नहीं हुई है. शीर्ष 10 राज्यों के पास देश की कुल स्थापित क्षमता का लगभग 86 प्रतिशत हिस्सा है. इसके विपरीत पूर्वोत्तर राज्यों और पूर्वी भारत के कई हिस्सों में इसकी शुरुआत भी अपेक्षाकृत धीमी रही है. पूर्वोत्तर में असम 344 मेगावाट क्षमता के साथ सबसे आगे है, जबकि मणिपुर में 11 मेगावाट, सिक्किम में पांच मेगावाट, नागालैंड में एक मेगावाट और मेघालय में महज 0.21 मेगावाट क्षमता स्थापित हो पायी है. यह आंकड़ा गुजरात की 6.8 गीगावाट क्षमता के सामने बेहद छोटा है.

झारखंड और पूर्वी भारत की स्थिति चिंताजनक

पूर्वी भारत में रूफटॉप सोलर को लेकर स्थिति अभी भी कमजोर बनी हुई है. बिहार में 218 मेगावाट, ओडिशा में 156 मेगावाट और झारखंड में केवल 95 मेगावाट क्षमता स्थापित हो सकी है. पश्चिम बंगाल की स्थिति और भी खराब है, जहां केवल 67 मेगावाट क्षमता स्थापित हुई है. यह स्थिति तब है जब देश की लगभग एक-चौथाई आबादी पूर्वी भारत में रहती है. विशेषज्ञों का मानना है कि यहां सौर ऊर्जा की उपलब्धता में कोई कमी नहीं है, बल्कि समस्या मजबूत तंत्र और जागरूकता की है.

मजबूत इकोसिस्टम से गुजरात और महाराष्ट्र अग्रणी

क्लाइमेट कम्पैटिबल फ्यूचर्स के मुख्य कार्यकारी अधिकारी डॉ. मनीष राम के अनुसार गुजरात, महाराष्ट्र और केरल जैसे राज्यों ने वर्षों पहले ही इंस्टॉलर नेटवर्क, वित्तीय सहायता प्रणाली और उपभोक्ता जागरूकता का मजबूत आधार तैयार कर लिया था. इसके अलावा इन राज्यों की वितरण कंपनियां नेट मीटरिंग के आवेदनों को तेजी से मंजूरी देती हैं और रूफटॉप सोलर को एक अवसर के रूप में देखती हैं. इसके विपरीत पूर्वी राज्यों की वितरण कंपनियां वित्तीय दबाव में हैं. यहां वेंडर नेटवर्क कमजोर है, ऋण सुविधाएं सीमित हैं और लोगों के बीच सरकारी सब्सिडी को लेकर जागरूकता भी कम है. नतीजा यह है कि संभावनाएं होने के बावजूद प्रगति धीमी बनी हुई है.

उत्तर भारत में राजस्थान और हरियाणा बेहतर स्थिति में

उत्तर भारत में राजस्थान 2,090 मेगावाट और हरियाणा 1,188 मेगावाट क्षमता के साथ बेहतर प्रदर्शन कर रहे हैं. उत्तर प्रदेश में 715 मेगावाट क्षमता स्थापित हो चुकी है और वर्ष 2026 की शुरुआत में नई क्षमता जोड़ने के मामले में यह शीर्ष तीन राज्यों में शामिल रहा. दिल्ली में 410 मेगावाट और पंजाब में 581 मेगावाट क्षमता स्थापित हुई है. वहीं उत्तराखंड में 274 मेगावाट, जम्मू-कश्मीर में 42 मेगावाट और हिमाचल प्रदेश में 67 मेगावाट क्षमता ही विकसित हो पायी है.

केवल सब्सिडी नहीं, क्रियान्वयन भी जरूरी

विशेषज्ञों का मानना है कि केवल सब्सिडी बढ़ाने से समस्या का समाधान नहीं होगा. पूर्वोत्तर राज्यों को अन्य राज्यों की तुलना में अधिक केंद्रीय सहायता मिलती है. उदाहरण के लिए असम में तीन किलोवाट क्षमता वाले सोलर सिस्टम के लिए करीब 1.3 लाख रुपये की संयुक्त केंद्र और राज्य सब्सिडी उपलब्ध है, लेकिन इसके बावजूद वहां अपेक्षित वृद्धि नहीं हो पायी है. क्लाइमेट रिस्क होराइजन के निदेशक आशीष फर्नांडिस के अनुसार आर्थिक रूप से कमजोर राज्यों के लिए सस्ती नवीकरणीय ऊर्जा विकास का महत्वपूर्ण माध्यम बन सकती है. इसके लिए वितरण कंपनियों, वेंडरों और राज्य सरकारों के बीच बेहतर समन्वय आवश्यक है.

2035 के लक्ष्य के लिए सभी राज्यों की भूमिका अहम

हाल ही में केंद्र सरकार ने संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन फ्रेमवर्क कन्वेंशन के लिए भारत के तीसरे राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (एनडीसी 3.0) को मंजूरी दी है. इसके तहत वर्ष 2035 तक सकल घरेलू उत्पाद की उत्सर्जन तीव्रता में 47 प्रतिशत की कमी और 60 प्रतिशत गैर-जीवाश्म आधारित बिजली क्षमता का लक्ष्य तय किया गया है. ये लक्ष्य केवल गुजरात, महाराष्ट्र या कुछ चुनिंदा राज्यों के भरोसे हासिल नहीं किए जा सकते. सभी राज्यों की सक्रिय भागीदारी जरूरी होगी. रूफटॉप सोलर बिना अतिरिक्त जमीन और ट्रांसमिशन लाइनों के स्वच्छ ऊर्जा उपलब्ध कराने का सबसे तेज माध्यम माना जा रहा है.

लक्ष्य से अभी काफी पीछे है देश

हालिया प्रगति के बावजूद देश अभी अपने लक्ष्य से काफी पीछे है. मार्च 2026 तक 30 गीगावाट के आवासीय रूफटॉप लक्ष्य के मुकाबले केवल 9.56 गीगावाट क्षमता स्थापित हो सकी है. वहीं एक करोड़ परिवारों तक पहुंचने के लक्ष्य के मुकाबले करीब 32 लाख परिवार ही इस योजना से जुड़ पाए हैं. डॉ मनीष राम के अनुसार आने वाले वर्षों में सफलता केवल सब्सिडी पर निर्भर नहीं करेगी, बल्कि मंजूरी की प्रक्रिया, वित्तपोषण, स्थानीय वेंडर नेटवर्क और वितरण कंपनियों की कार्यशैली पर निर्भर करेगी. आखिर सौर ऊर्जा की रोशनी छतों पर तभी पहुंचेगी, जब नीतियां कागजों से उतरकर जमीन पर भी उतनी ही तेजी से काम करेंगी.

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कैसे काम करता है सीसीएफ

क्लाइमेट कम्पैटिबल फ्यूचर्स (सीसीएफ) के बारे में क्लाइमेट कम्पैटिबल फ्यूचर्स एक बेंगलुरु-आधारित अनुसंधान एवं परामर्श संगठन है, जो एक जलवायु-अनुकूल दुनिया की ओर संक्रमण को तेज करने के लिए काम कर रहा है. यह जलवायु अनुकूलन, ऊर्जा संक्रमण और चक्रीय अर्थव्यवस्था के क्षेत्रों में कार्रवाई-उन्मुख अनुसंधान, डेटा-संचालित अंतर्दृष्टि और क्रियान्वयन रणनीतियां विकसित करता है और न्यायसंगत व टिकाऊ जलवायु कार्रवाई को आगे बढ़ाने के लिए हितधारकों के साथ साझेदारी करता है.

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