लद्दाख में एक मकान की मरम्मत के दौरान दीवार और छत गिरने से पश्चिम चंपारण के दो राजमिस्त्रियों की मौत हो गई। यह घटना यंथाग गांव के पास हुई, जहां दोनों मजदूर काम कर रहे थे। मृतकों की पहचान मो. फारूक और साठी थाना क्षेत्र के लछनौता गांव स्थित बौद्ध टोला निवासी ओजीर बैठा के रूप में हुई है। मो. फारूक और ओजीर बैठा बेहतर रोजगार की तलाश में लद्दाख गए थे। वे दोनों वहां राजमिस्त्री के तौर पर काम करते थे और अपने परिवारों के मुख्य कमाऊ सदस्य थे। यंथाग गांव में एक पुराने मकान की मरम्मत का काम चल रहा था। इसी दौरान मकान की जर्जर दीवार और छत अचानक ढह गई। दोनों मजदूर मलबे के नीचे दब गए। स्थानीय लोगों ने तत्काल राहत एवं बचाव कार्य शुरू किया। काफी मशक्कत के बाद दोनों मजदूरों को मलबे से बाहर निकाला गया, लेकिन तब तक उनकी मौत हो चुकी थी। घटना की सूचना उनके पैतृक गांव पश्चिम चंपारण पहुंचते ही दोनों परिवारों में मातम छा गया। परिजनों का रो-रोकर बुरा हाल है और पूरे गांव में शोक की लहर दौड़ गई है। शवों के पहुंचने का इंतजार कर रहे परिजन ग्रामीणों के मुताबिक, मो. फारूक और ओजीर बैठा की कमाई से ही उनके परिवारों का भरण-पोषण होता था। डेढ़ महीने पहले दोनों काम की तलाश में लद्दाख गए थे। उनकी असामयिक मौत से दोनों परिवार गहरे आर्थिक संकट में आ गए हैं। फिलहाल, दोनों शवों को आवश्यक कानूनी प्रक्रिया पूरी करने के बाद उनके पैतृक गांव भेजने की तैयारी की जा रही है। परिजन शवों के पहुंचने का इंतजार कर रहे हैं।
लद्दाख में बिहार के 2 राजमिस्त्रियों की मौत:मलबे के नीचे दबने से हादसा, बेतिया से डेढ़ महीने पहले गए थे
लद्दाख में एक मकान की मरम्मत के दौरान दीवार और छत गिरने से पश्चिम चंपारण के दो राजमिस्त्रियों की मौत हो गई। यह घटना यंथाग गांव के पास हुई, जहां दोनों मजदूर काम कर रहे थे। मृतकों की पहचान मो. फारूक और साठी थाना क्षेत्र के लछनौता गांव स्थित बौद्ध टोला निवासी ओजीर बैठा के रूप में हुई है। मो. फारूक और ओजीर बैठा बेहतर रोजगार की तलाश में लद्दाख गए थे। वे दोनों वहां राजमिस्त्री के तौर पर काम करते थे और अपने परिवारों के मुख्य कमाऊ सदस्य थे। यंथाग गांव में एक पुराने मकान की मरम्मत का काम चल रहा था। इसी दौरान मकान की जर्जर दीवार और छत अचानक ढह गई। दोनों मजदूर मलबे के नीचे दब गए। स्थानीय लोगों ने तत्काल राहत एवं बचाव कार्य शुरू किया। काफी मशक्कत के बाद दोनों मजदूरों को मलबे से बाहर निकाला गया, लेकिन तब तक उनकी मौत हो चुकी थी। घटना की सूचना उनके पैतृक गांव पश्चिम चंपारण पहुंचते ही दोनों परिवारों में मातम छा गया। परिजनों का रो-रोकर बुरा हाल है और पूरे गांव में शोक की लहर दौड़ गई है। शवों के पहुंचने का इंतजार कर रहे परिजन ग्रामीणों के मुताबिक, मो. फारूक और ओजीर बैठा की कमाई से ही उनके परिवारों का भरण-पोषण होता था। डेढ़ महीने पहले दोनों काम की तलाश में लद्दाख गए थे। उनकी असामयिक मौत से दोनों परिवार गहरे आर्थिक संकट में आ गए हैं। फिलहाल, दोनों शवों को आवश्यक कानूनी प्रक्रिया पूरी करने के बाद उनके पैतृक गांव भेजने की तैयारी की जा रही है। परिजन शवों के पहुंचने का इंतजार कर रहे हैं।

