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सावन में लौटे परदेसी, कांवरिया पथ पर रोजगार की दुनिया

सावन में लौटे परदेसी, कांवरिया पथ पर रोजगार की दुनिया

सुलतानगंज(भागलपुर) से शुंभाकर की रिपोर्ट

Sultanganj Kanwar Path News: सुलतानगंज से देवघर तक जाने वाला कच्चा कांवरिया पथ इन दिनों फिर से जीवंत होने लगा है. विश्व प्रसिद्ध श्रावणी मेला 30 जुलाई से शुरू होना है, लेकिन उससे पहले ही कांवरिया पथ पर रोजी-रोटी की दुनिया सजने लगी है. पंजाब, हरियाणा और दिल्ली जैसे राज्यों में मजदूरी करने वाले हजारों लोग अपने गांव लौट रहे हैं. वजह सिर्फ बाबा भोलेनाथ के प्रति आस्था नहीं, बल्कि साल का सबसे बड़ा रोजगार भी है.

सावन का महीना यहां के हजारों परिवारों के लिए किसी त्योहार से कम नहीं होता. दो महीने तक चलने वाला श्रावणी मेला इन परिवारों की सालभर की कमाई का बड़ा जरिया बन जाता है. यही कारण है कि गांवों में फिर से रौनक लौट आई है और कांवरिया पथ के किनारे अस्थायी बाजार आकार लेने लगे हैं.

सावन की दस्तक के साथ गांव लौटने लगे परदेसी मजदूर

सुलतानगंज-देवघर कच्चा कांवरिया पथ से जुड़े गांवों में इन दिनों अलग ही हलचल है. कोई दुकान के लिए सामान खरीद रहा है तो कोई बांस-बल्ली और तिरपाल जुटाकर अस्थायी झोपड़ी तैयार कर रहा है.

कमराय के सुधीर कुमार, असरगंज के रंजीत कुमार, धांधी बेलारी के रौशन कुमार और शिवनंदनपुर के अमरजीत बिंद बताते हैं कि वे सालभर पंजाब, हरियाणा और दिल्ली में मजदूरी करते हैं. लेकिन जैसे ही सावन शुरू होता है, वे अपने गांव लौट आते हैं.

उनका कहना है कि श्रावणी मेले के दौरान बाबा भोलेनाथ के भक्तों की सेवा करने का अवसर भी मिलता है और परिवार के साथ रहकर अच्छी आमदनी भी हो जाती है.

Sultanganj Kanwar Path News: कांवरिया पथ पर सजने लगा अस्थायी बाजार

श्रावणी मेले से पहले ही कांवरिया पथ के दोनों ओर अस्थायी दुकानों की कतारें दिखाई देने लगी हैं. यहां चाय, नाश्ता, शरबत, फल, भोजन, दवा, रेनकोट, लाठी, पूजा सामग्री और यात्रा में जरूरी सामान की दुकानें तेजी से तैयार हो रही हैं.

कई परिवार पूरे दो महीने के लिए अपना घर छोड़कर कांवरिया पथ के किनारे ही डेरा डाल देते हैं. वहीं खाना बनता है, वहीं रात गुजरती है और दिनभर लाखों कांवरियों की सेवा की जाती है.

स्थानीय लोगों के लिए यह केवल दुकानदारी नहीं, बल्कि धार्मिक सेवा का भी हिस्सा माना जाता है.

श्रावणी मेला क्यों कहलाता है ग्रामीण अर्थव्यवस्था की जीवनरेखा

स्थानीय लोगों का कहना है कि श्रावणी मेला केवल धार्मिक आयोजन नहीं है. यह हजारों गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों की आर्थिक मजबूती का सबसे बड़ा अवसर भी है.

मेला शुरू होते ही छोटे दुकानदार, ठेला संचालक, फल विक्रेता, वाहन चालक, कारीगर, मजदूर और स्थानीय युवा बड़ी संख्या में रोजगार से जुड़ जाते हैं. लाखों श्रद्धालुओं की आवाजाही से पूरे क्षेत्र में व्यापार बढ़ जाता है और स्थानीय बाजारों में नई जान आ जाती है.

यही वजह है कि कई परिवार पूरे साल इस मेले का इंतजार करते हैं.

Sultanganj Kanwar Path News: सेवा और स्वरोजगार का अनोखा संगम

सुलतानगंज से देवघर तक हर साल एक अलग ही तस्वीर देखने को मिलती है. यहां व्यापार और सेवा एक-दूसरे से जुड़े हुए नजर आते हैं. दुकानदार मानते हैं कि वे केवल सामान नहीं बेच रहे, बल्कि बाबा भोलेनाथ के भक्तों की सेवा कर रहे हैं.

यही भावना उन्हें हर साल परदेस की नौकरी छोड़कर गांव लौटने के लिए प्रेरित करती है. श्रावणी मेले के दौरान ग्रामीणों की भागीदारी, प्रशासन की तैयारियां और लाखों श्रद्धालुओं की आस्था मिलकर इस पूरे मार्ग को जीवंत बना देती हैं.

आने वाले दिनों में और बढ़ेगी रौनक

30 जुलाई से विश्व प्रसिद्ध श्रावणी मेले की औपचारिक शुरुआत होनी है. जैसे-जैसे तिथि नजदीक आएगी, कांवरिया पथ पर श्रद्धालुओं की संख्या और अस्थायी दुकानों की रौनक दोनों तेजी से बढ़ेंगी.

स्थानीय लोगों को उम्मीद है कि इस बार भी लाखों श्रद्धालुओं के आने से कारोबार अच्छा रहेगा और दो महीने तक चलने वाला यह मेला हजारों परिवारों के लिए आर्थिक संबल साबित होगा.

श्रावणी मेला इसलिए केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक नहीं है, बल्कि यह सुलतानगंज और आसपास के गांवों की अर्थव्यवस्था की धड़कन भी है.

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