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कृष्णमय झारखंड:500 वर्ष पूर्व चैतन्य की यात्रा ने हर कोने में बसाए मंदिर


पुरातत्व विभाग के पूर्व उपनिदेशक डॉ. हरेंद्र सिन्हा की खोज में सामने आए टेराकोटा शैली के दुर्लभ देवालय मध्यकाल में झारखंड भक्ति आंदोलन का महत्वपूर्ण केंद्र था। 15वीं सदी में चैतन्य महाप्रभु ने पुरी से वृंदावन यात्रा के दौरान अपनी पुस्तक ‘चैतन्य चरितामृत’ में यहां की पावन भूमि को ‘झारिखंड’ नाम से दर्ज किया। संत कबीरदास जी ने भी इस भूमि की दिव्यता का वर्णन करते हुए कहा,-‘कब से छोड़ी मथुरा नगरी, कब से छोड़ी काशी… झारखंड में आय विराजे, वृंदावन के वासी।’ भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति धारा को जन-जन तक पहुंचाने वाले चैतन्य महाप्रभु का झारखंड से बेहद गहरा और ऐतिहासिक नाता रहा है। जगन्नाथ पुरी (ओडिशा) से जब महाप्रभु वृंदावन और काशी की खोज के लिए निकले, तो उनका रास्ता झारखंड के घने जंगलों से होकर गुजरा था। आज 500 साल बाद भी उस दिव्य यात्रा के पदचिह्न राज्य के अलग-अलग कोनों में जीवंत हैं।

महाप्रभु के दर्शन के बाद भक्तों ने अपने इलाके में 16-17वीं शताब्दी में मंदिर बनवाए हरेंद्र सिन्हा ने बताया कि हजारीबाग-रांची-बोकारो मार्ग पर स्थित चंदनकियारी ब्लॉक में एक ही जगह टेराकोटा शैली के 3 प्राचीन मंदिर मिले हैं, जो सीधे तौर पर इसी कालखंड और प्रभाव के हैं। गुमला के नवरत्नगढ़ स्थित ऐतिहासिक ‘धोबी मठ’ का सीधा संबंध चैतन्य महाप्रभु के अनुयायियों और इसी वैष्णव परंपरा से है। पांडरा के निकट की झाड़ियों में भी पुरानी ईंटों और टेराकोटा शैली के ध्वंसावशेष मिले हैं। महाप्रभु के दर्शन करने गए स्थानीय भक्तों ने बाद में अपने-अपने इलाकों में ऐसे मंदिरों की स्थापना कराई थी। महाप्रभु जहां-जहां से गुजरे, उनके प्रभाव और स्मृति में भक्तों ने देवालय बनाए। इस पूरे रूट को हेरिटेज सर्किट के रूप में सहेजा जा सकता है।
बेशकीमती है बंशीधर की मूर्ति
डॉ. नीरज कहते हैं कि गढ़वा के बंशीधर नगर में कमलासन पर विराजमान श्रीकृष्ण की 4.2 फीट ऊंची प्रतिमा अद्वितीय है। साथ में राधारानी भी हैं, जिसकी चर्चा राहुल सांकृत्यायन ने भी की है। 2022 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के पुरालेखीय अध्ययन में पुष्टि हुई कि यह मूर्ति मंदिर से भी पुरानी है। प्रतिमा पर कैथी लिपि में अंकित विवरण के अनुसार, इसे 1706 ई. में भेंट किया गया था। क्योंकि इस पर हरिनाथ गुरु व नागवंशी राजा रघुनाथ शाह का नाम अंकित है।
एक्सपर्ट्स : हरेंद्र सिन्हा, पूर्व उपनिदेशक संस्कृति व पुरातत्व विभाग, रांची }डॉ. नीरज कुमार मिश्र, सहायक अधीक्षण, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, रांची मंडल

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