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दैनिक भास्कर ने विधानसभा में अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के लिए आरक्षित 40 सीटों के विधायकों के बीच सर्वे किया। दलित समाज की नुमाइंदगी करने वाले इन विधायकों से हमने पूछा कि क्या देश या राज्य में आरक्षण की समीक्षा होनी चाहिए? इसमें से 30% विधायकों ने मांग किया कि SC को मिल रहे आरक्षण की समीक्षा होनी चाहिए। जबकि 45% विधायकों ने कहा कि आरक्षण में किसी तरह के छेड़छाड़ की कोई जरूरत नहीं है। वहीं, 17.5% विधायकों ने इस मुद्दे पर कुछ भी बोलने से इनकार कर दिया। 7.5% विधायकों से संपर्क नहीं हो पाया। NDA के दो अहम सहयोगी और केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी के बीच आरक्षण के मुद्दे पर जारी घमासान के बीच आरक्षित सीटों के सभी 40 विधायकों से हमने 3 सवाल पूछे… सवाल-1: क्या वर्तमान आरक्षण व्यवस्था की समीक्षा होना चाहिए? सवाल-2: क्या आपको अभी जरूरत है, क्या अमीर दलित परिवारों को ये सुविधा छोड़ देना चाहिए? सवाल-3: क्या ‘जातीय समीक्षा’ की जरूरत है ताकि पता चले कि किस दलित जाति को आरक्षण का सबसे कम लाभ मिला है? अब इन सवालों के जवाब विस्तार से पढ़िए 40 में से 18 विधायक बोले- आरक्षण में छेड़छाड़ नहीं होना चाहिए 40 में से 18 विधायक (45% फीसदी) ने कहा कि आरक्षण में किसी तरह के छेड़छाड़ की कोई जरूरत नहीं है। यह जैसा है, बेहतर है। बिहार सरकार के मंत्री पर पश्चिम चंपारण के रामनगर से BJP विधायक नंदकिशोर राम ने कहा, ’आरक्षण की समीक्षा नहीं होनी चाहिए। मगर यह जांच अवश्य होनी चाहिए कि किस दलित जाति को इसका अधिक लाभ मिला और किस दलित जाति को सबसे कम मिला है।’ भोजपुर के अगिआंव से BJP विधायक महेश पासवान ने कहा, ’आरक्षण की समीक्षा नहीं होनी चाहिए। इसे 9वीं अनुसूची में शामिल करना चाहिए। इस पर चर्चा ही बेकार है।’ समस्तीपुर के कल्याणपुर से JDU के सीनियर लीडर महेश्वर हजारी ने कहा, ’आरक्षण की समीक्षा बिलकुल नहीं होनी चाहिए। ये फूट डालो- राज करो की नीति है। दलित आज भी घृणा के पात्र समझे जाते हैं। आरक्षण समाप्त करने की साजिश है।’ मसौढ़ी से JDU विधायक अरुण मांझी ने कहा,’ये लोग अपना राग अलाप रहे हैं। संविधान में बाबा साहेब आंबेडकर ने आरक्षण दिया है। इसमें कहीं कोई चर्चा की जरूरत नहीं है। जिस तरह आरक्षण चल रहा है। वैसे चलते रहना चाहिए। गरीबी थोड़े मिट गई है। आरक्षण में कोई छेड़छाड़ नहीं चाहिए।’ 30 फीसदी विधायकों का तर्क समीक्षा समय की मांग 40 में से 12 विधायक ने माना कि अभी आरक्षण की समीक्षा का सही समय है। इसका लाभ कुछ सीमित जातियों को मिल रहा है, जबकि जो गरीब और जरूरतमंद हैं वो और गरीब होते जा रहे हैं। खगड़िया के अलौली से विधायक रामचंंद्र सदा ने कहा,’आरक्षण की समीक्षा की मांग जायज है। बहुत लोग आगे बढ़ गए हैं। जो लोग पीछे छूटे हैं, उन्हें आगे आने का मौका देना चाहिए।आज के डेट में दो-चार जाति के लोग आगे बढ़े हैं। बाकी जाति के लोग आज भी जमीन पर हैं।’ JDU के सीनियर लीडर श्याम रजक ने कहा, ’आरक्षण की समीक्षा हो। इसमें ये जाना जाए कि आजादी के बाद भी जिस झोपड़ी में दलित के दादा रहते थे उसी झोपड़ी में वो भी रहते हैं। आज भी गंदी बस्ती में रहकर उसका बच्चा गुजर-बसर कर रहा है। इस बात की समीक्षा हो। स्पेशल कमेटी बनाकर इसकी जांच होनी चाहिए।’ इमामगंज की विधायक दीपा मांझी ने कहा, ’बिलकुल आरक्षण की समीक्षा होनी चाहिए। इसका मतलब आरक्षण खत्म करना नहीं, बल्कि यह देखना है कि इसका लाभ वास्तव में सबसे वंचित तक पहुंच रहा है या नहीं।’ अररिया के रानीगंज से विधायक अविनाश मंगलम ने कहा, ’आरक्षण की समीक्षा होनी चाहिए। इससे पता चलेगा कि वंचित लोगों को इसका कितना लाभ मिल पाया है। कितना विकास हुआ है। कहां छूटा है।’ मंत्री-IAS बन जाने के बाद भी SC लोगों के साथ हो रहा भेदभाव क्या अमीर हो जाने वाले आरक्षित वर्ग के लोगों को आरक्षण छोड़ देना चाहिए? शामिल लगभग 90 फीसदी विधायकों ने साफ इनकार किया कि अमीर या सुविधा संपन्न हो जाने पर आरक्षण छोड़ देना चाहिए। इनका मानना है कि अभी भी लोगों की मानसिकता नहीं बदली है। दलित मंत्री हो जाएं या IAS, इनके साथ भेदभाव किया जाता है। आज भी छुआछूत जिंदा है। ज्यादातर विधायकों ने कहा कि आरक्षण भीख में नहीं मिली। यह संविधान ने मिला अधिकार है। चेनारी से LJP(R) के विधायक मुरारी प्रसाद गौतम ने कहा, ‘आर्थिक रूप से सबल होने से कोई सवर्ण नहीं बन जाता। दलितों के खिलाफ सामाजिक पूर्वाग्रह आज भी बरकरार है। इसलिए क्रीमी लेयर जैसी अवधारणा या आरक्षण छोड़ने की बात दलितों पर लागू करना गलत है।’ अगिआंव से BJP विधायक महेश पासवान ने कहा, ‘आज भी किसी दलित नेता में इतनी हैसियत नहीं है कि वह सामान्य (General) सीट से बिना आरक्षण के चुनाव जीत सके। गांव में आज भी छुआछूत कायम है।’ सीतामढ़ी के बथनाहा से विधायक अनिल कुमार ने कहा, ’मुझे आरक्षण की जरूरत नहीं है। स्कूलिंग से लेकर इंजनीयिरिंग और नौकरी तक मुझे कभी आरक्षण की जरूरत नहीं पड़ी। जब हम इस काबिल हो गए हैं तो हमें इसकी जरूरत क्यों। छोड़ना या नहीं छोड़ना ये लोगों की स्वेच्छा पर निर्भर करता है।’ पूर्णिया के बनमनखी से BJP विधायक कृष्ण कुमार ऋषि ने कहा, ’आरक्षण समाज को मिलता है। कोई छोड़ देगा कोई पकड़ लेगा, ऐसा नहीं होता है न। इस पर चर्चा करना ही गलत है।’ चेनारी से LJP(R) विधायक मुरारी प्रसाद गौतम ने कहा,’अमीरी-गरीबी ऐसा कुछ भी नहीं है। ये सब सवर्ण ने किया है। दलित समाज में ये लागू नहीं होता है। दलितों के साथ ये अन्याय है। सामाजिक रुप से हम अभी भी पिछड़े हैं। आर्थिक रूप से सबल होते तो सवर्ण में गिनती नहीं होती।’ आजादी के 75 साल बाद भी गरीब क्यों गरीब रह गए? लगभग 40 फीसदी विधायकों ने इस बात को स्वीकार किया कि जाति के आधार पर समझने की जरूरत है कि गरीब अभी भी गरीब क्यों रह गए हैं। अभी तक वे क्यों सामाजिक तौर पर पीछे हैं। उनके शिक्षा का स्तर क्यों नहीं सुधरा है। रोसड़ा से BJP विधायक बीरेंद्र कुमार ने कहा, ’आरक्षण का दायरा घटने के बजाय बढ़ रहा है। अगर SC-ST के कुछ लोगों ने अच्छा प्रदर्शन किया है तो इसका दायरा सीमित किया जाना चाहिए। पहले एक सामाजिक सर्वे होना चाहिए।’ बक्सर के राजपुर से विधायक संतोष निराला ने कहा, ’हर जाति में गरीब और अमीर हैं। सब में बदलाव होना चाहिए। केवल एससी-एसटी में ही क्यों? आरक्षण के कारण ही आईएएस, आईपीएस, मंत्री, विधायक बन रहे हैं। नहीं तो कोई नहीं बन पाते।’
30% दलित विधायकों ने माना आरक्षण की समीक्षा जरूरी:45% विरोध में, 5 बार के विधायक बोले-हम मंत्री-IAS बन जाएं, आज भी छुआछूत होती है
