
अमेरिका से अपनी आंखों का इलाज कराकर लौटते ही अभिषेक बनर्जी ने भारतीय जनता पार्टी (भाजपा), मुख्य निर्वाचन आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार पर हमला बोला. साथ ही सुप्रीम कोर्ट पर भी सवाल दाग दिये. भारत निर्वाचन आयोग (ECI) में आयुक्तों के बीच 14 बार आपत्तियों और असहमति की खबरों के सामने आने के बाद तृणमूल कांग्रेस (TMC) ने सीधे देश की शीर्ष अदालत (Supreme Court) का रुख किया. उन्होंने CEC ज्ञानेश कुमार को पद से तुरंत हटाने और पूरे मामले की सुप्रीम कोर्ट के प्रधान न्यायाधीश (CJI) की निगरानी में न्यायिक जांच की मांग उठाकर बड़ा सियासी धमाका कर दिया है.
मतदाताओं को वोट से वंचित करना लोकतंत्र की नींव पर हमला
अभिषेक बनर्जी ने कहा कि कथित तौर पर किसी खास राजनीतिक दल को फायदा पहुंचाने के लिए लाखों वैध मतदाताओं को मताधिकार से वंचित करना देश के लोकतंत्र की नींव पर सीधा प्रहार है. मीडिया रिपोर्ट में 2 चुनाव आयुक्तों (सुखबीर सिंह संधु और विवेक जोशी) द्वारा 10 महीनों में विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) पर 14 बार आपत्ति दर्ज कराने का हवाला देते हुए अभिषेक बनर्जी ने मुख्य चुनाव आयुक्त को तुरंत पद से हटाने की मांग की.
अदालत की निगरानी में जांच की मांग
तृणमूल कांग्रेस (All India Trinamool Congress – AITC) के राष्ट्रीय महासचिव ने मांग की कि चुनाव आयोग के कामकाज, निर्णयों और प्रक्रियात्मक अनियमितताओं की सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में निष्पक्ष जांच होनी चाहिए. उन्होंने आरोप लगाया कि राजनीतिक लाभ के लिए मतदाता सूचियों से लाखों आम नागरिकों के नाम हटाये गये हैं, जो लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन है.
CJI और सुप्रीम कोर्ट से सीधी गुहार
अभिषेक बनर्जी ने कहा कि ‘इंडिया’ (INDIA) गठबंधन के सभी विपक्षी दलों ने बंगाल चुनाव के बाद CJI और सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों को पत्र लिखकर गंभीर चिंताएं जतायीं थीं, लेकिन उन पर ध्यान नहीं दिया गया. उन्होंने पूछा कि क्या मुख्य न्यायाधीश की अगुवाई वाली पीठ अब इस पर कार्रवाई करेगी? सर्वोच्च अदालत इस संस्थागत पतन से अपना मुंह नहीं मोड़ सकती.
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ECI के अंदरूनी असंतोष पर तल्ख टिप्पणी
डायमंड हार्बर के टीएमसी सांसद अभिषेक बनर्जी का यह बयान उस मीडिया रिपोर्ट के बाद आया है, जिसमें कहा गया था कि 2 चुनाव आयुक्तों की जानकारी के बिना ही कई महत्वपूर्ण फैसले लिये गये थे. अभिषेक बनर्जी ने कहा कि जब संवैधानिक संस्थाओं की तटस्थता पर बार-बार सवाल उठते हैं और उन्हें अनसुना किया जाता है, तो देश का न्यायिक नेतृत्व ही जनता की आखिरी उम्मीद बचता है.
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