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झारखंड के आदिवासी लोकजीवन, पर्व-त्योहार और अखरा से जुड़े मांदर को जियोग्राफिकल इंडिकेशन (जीआई) टैग मिल गया है। भारत सरकार की जीआई रजिस्ट्री, चेन्नई ने इसे भौगोलिक संकेतक का दर्जा दिया है। पारंपरिक लाल और नगड़ा मिट्टी से तैयार इस लोकवाद्य को अब कानूनी और भौगोलिक पहचान मिल गई है। मांदर को जीआई टैग दिलाने की प्रक्रिया 2021 से चल रही थी। दूसरे राज्यों में इससे मिलते-जुलते वाद्ययंत्र होने के कारण पंजीकरण की प्रक्रिया लंबित थी। अब इसे झारखंड के मांदर के रूप में पंजीकृत किया गया है। राज्य के 43 पारंपरिक वाद्यों में मांदर सर्वोपरि ‘मांदर सम्राट’ मनपूरन नायक ने कहा-मांदर केवल एक वाद्य नहीं, झारखंड की सांस्कृतिक धरोहर है। इसके बिना अखरा पूरी तरह सूना है। राज्य के 43 पारंपरिक वाद्यों में मांदर को सर्वोपरि माना गया है। विशेषज्ञ और एनयूएसआरएल के विजिटिंग फैकल्टी डॉ. सत्यदीप सिंह ने आवेदन से लेकर अंतिम पैरवी तक मुख्य भूमिका निभाई। उन्होंने बताया कि मांदर को जीआई टैग दिलाने के लिए प्रसिद्ध मानवशास्त्री शरत चंद्र राय की 1915 की कृति, तारकचंद्र दास के 1931 के शोध और डब्ल्यूजी आर्चर की 1940 की पुस्तक ‘द ब्लू ग्रोव’ के साथ पटना संग्रहालय (1920) और बिहार गजेटियर के साक्ष्य पेश किए गए। डॉ. सिंह के अनुसार, यह पंजीकरण पारंपरिक कारीगरों के संरक्षण और झारखंड की समृद्ध लोक परंपरा को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान दिलाएगा। पूरी प्रक्रिया में एनयूएसआरएल के कुलपति प्रो. अशोक पाटिल, तत्कालीन गुमला उपायुक्त कर्ण सत्यार्थी और मुख्यमंत्री लघु कुटीर उद्यम विकास बोर्ड का भी महत्वपूर्ण योगदान रहा। जीआई टैग का फायदा राज्यभर के पारंपरिक वादक और शिल्पकार अब जीआई पहचान, आधिकारिक ब्रांड और लोगो के साथ मांदर को बाजार में बेच सकेंगे। इससे झारखंड में पारंपरिक तरीके से तैयार किए जाने वाले मांदर की अलग पहचान बनेगी और दूसरे क्षेत्रों में बने मिलते-जुलते या नकली उत्पादों से इसे अलग करना आसान होगा। जीआई टैग मांदर को भौगोलिक पहचान को सुरक्षित रखने के साथ पारंपरिक कारीगरों के हुनर और इस लोकवाय से जुड़ी विरासत को संरक्षित करने में भी मदद करेगा। उपभोक्ता भी जीआई पहचान के जरिए झारखंड के पारंपरिक मांदर की पहचान कर सकेंगे। इससे नकली या बिना अधिकृत पहचान वाले उत्पादों पर रोक लगाने में मदद मिलने की उम्मीद है। खास मिट्टी से बनता है मांदर 69 वर्षीय मनपूरन नायक 56 साल से मांदर बजा रहे हैं। 13 साल की उम्र में 1970 में आकाशवाणी में उनका चयन हुआ था। अब महिलाएं भी मांदर बजाने के लिए आगे आ रही हैं। नायक होटवार स्थित कला मंदिर में उन्हें प्रशिक्षण देते हैं। नायक ने कहा,जब से गीत-संगीत का जन्म हुआ, तब से मांदर है। यह मिट्टी से बनता है, इसलिए हमारे लिए सबसे खास है। इसे जीआई टैग मिलना पुरखों और माटी का सच्चा सम्मान है। मांदर की आवाज ढोल, ढोलकी, नगाड़ा और डफली जैसे वाद्यों से ज्यादा खनकदार होती है।
मांदर की थाप को मिली देशभर में पहचान:अखरा से जीआई रजिस्ट्री तक पहुंचा मांदर, 2021 से चल रही थी प्रक्रिया
