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करीब तीन दशक पहले सतनपुर (सराय पहाड़ी) और बांधगोड़ा (पोंड टुंगरी) की पहाड़ियों पर दूर-दूर तक हरियाली नहीं, सिर्फ पेड़ों के ठूंठ नजर आते थे। पत्थर कारोबार और अतिक्रमण के दबाव में जंगल उजड़ रहा था। तब कुछ ग्रामीणों युवाओं ने ठान लिया कि पहाड़ को खत्म नहीं होने देंगे। पौधे लगाए, पेड़ों की रखवाली की और गांव के लोगों को अभियान से जोड़ा। आज उसी मेहनत का नतीजा है कि उजड़ी पहाड़ी फिर घने जंगल में बदल गई है। जंगल में डेढ़ दर्जन से अधिक मोर, खरगोश, सियार समेत कई छोटे वन्यजीव और पक्षियों की अनेक प्रजातियां नजर आती हैं। यह जंगल सिर्फ पेड़ों की वापसी नहीं, बल्कि ग्रामीणों की उस जिद की जीत है जिसने प्रकृति को दोबारा सांस लेने का मौका दिया। स्थानीय ग्रामीणों के अनुसार बोकारो शहर और स्टील प्लांट बनने से पहले बांधगोड़ा, सतनपुर के तेतुलिया, संतालडीह, बघरायबेड़ा समेत आसपास करीब 250 एकड़ वनभूमि घने जंगल से ढकी थी। सखुआ, खैर, कुसुम, पलाश, महुआ और आम के पेड़ों के साथ जड़ी-बूटियां भी मिलती थीं। पहाड़ी पर अंग्रेजों के समय का पुराना वॉच टावर भी है। 1990 के बाद पेड़ों की कटाई और पत्थर कारोबार बढ़ा तो जंगल सिमटता गया। कई जगह सिर्फ ठूंठ बच गए। माफियाओं का विरोध और पहरेदारी की गई लोगों को जंगल से जोड़ने के लिए आसस क्लब के लोग हर रविवार पहाड़ी पर पहुंचकर सामूहिक रूप से खिचड़ी बनाते थे। माधो मुंडा अलग-अलग पेड़ों के बीज बोरी में भरकर लाते और पहाड़ी पर डालते। ग्रामीणों को भू-माफिया, लकड़ी माफिया और पत्थर माफिया का विरोध करना पड़ा। ग्रामीणों के अनुसार समिति से जुड़े लोगों पर झूठे मुकदमे तक किए गए। अधिवक्ता रंजीत गिरि समेत कई लोगों और वन विभाग के अधिकारियों संजीव कुमार, मनीष अरविंद व रेंजर अजय कुमार का सहयोग मिला। युवाओं ने संभाली कमान, 1995 में बना आसस उजड़ते जंगल को देखकर योगो पूर्ति के नेतृत्व में रामदयाल सिंह, रामकुमार मांझी, दलगोविंद सोरेन, प्रकाश समेत युवाओं ने लोगों को जोड़ना शुरू किया। 31 दिसंबर 1995 को आदिवासी सामाजिक संस्थान (आसस) का गठन हुआ। उद्देश्य जंगल-पहाड़ बचाने के साथ शिक्षा और युवाओं को बढ़ावा देना भी था। पौधे लगाने के साथ बचे पेड़ों के ठूंठों की भी रक्षा शुरू हुई। इसे देख 13 जून 2006 को तत्कालीन धनबाद वन प्रमंडल के डीएफओ सह बोकारो प्रभारी संजीव कुमार ने ग्रामीणों के पहल को सहयोग का भरोसा दिया। अब 2026 में चारों तरफ फैला जंगल और हरियाली। 1990 के दशक में वीरान पड़ा सतनपुर पहाड़ का निरीक्षण करते युवक।
आदिवासी युवकों के जिद और मेहनत ने उजड़े पहाड़ को बनाया हरा-भरा
