![]()
पाकुड़ जिला मुख्यालय में एक अनोखी दुर्गा प्रतिमा है, जिसका विसर्जन कंधे पर बैठाकर किया जाता है। कलिकापुर स्थित इस प्रतिमा को 300 साल से एक ही कलाकार पीढ़ी दर पीढ़ी बनाते आ रहे हैं।स्वरूप में कोई बदलाव नहीं होता। यह कलिकापुर दुर्गा मंदिर बहुत पुराना है, जहां सालभर भक्त पूजा करने आते हैं। शारदीय नवरात्रि के पहले दिन से ही यहां उत्सव शुरू हो जाता है। मंदिर समिति और आसपास के लोग तैयारियों में जुटते हैं। बंगाल और झारखंड की मिली-जुली संस्कृति दिखती है। बंगाली सहित अन्य समुदाय के लोग मिलकर मां दुर्गा की पूजा में शामिल होते हैं। यह मंदिर जिले के जागृत दुर्गा मंदिरों में गिना जाता है। नवरात्रि की षष्ठी को मां की प्रतिमा स्थापित होती है, जिसके बाद भक्तों के लिए मंदिर के दरवाजे खुल जाते हैं। सप्तमी, अष्टमी और नवमी को विशेष आरती होती है। अष्टमी पर सैकड़ों लोग ‘डाल’ देते हैं, यह एक पुरानी परंपरा है। लोगों के कंधे में विराज कर मंदिर से निकलती है मां वहीं, दशमी के दिन मां का विसर्जन होता है और उस दिन मां किसी वाहन पर नहीं बल्कि लोगों के कंधे में विराज कर मंदिर से निकलती है और कलिकापुर समेत आसपास के क्षेत्र में भ्रमण कर मां का विसर्जन होता है इसके अलावा तय मुहूर्त में ही माँ मंदिर से विसर्जन के लिए निकलती है। वहीं पूजा समिति से जुड़े अर्धांदु शेखर गांगुली,आलोक मंडल,तारक दत्ता समेत बड़ी संख्या में युवक पूजा की तैयारी में जुटे हुए हैं.मंदिर के आसपास स्वच्छता अभियान चलाया गया है साफ सफाई की विशेष व्यवस्था की गई है। दुर्गा पूजा के दौरान मंदिर में उमड़ने वाली भीड़ को नियंत्रित करने के लिए सुरक्षा के विशेष उपाय किए गए हैं। आकर्षक लाइट लगाए गए हैं वहीं प्रसाद वितरण के लिए अलग से व्यवस्था भी की गई है। समिति के सदस्य एएस गांगुली ने बताया कि पाकुड़ शहर में सदियों तक कलिकापुर में ही मां दुर्गा की पूजा होती थी। कालांतर में शहर में तीन स्थानों पर दुर्गा पूजा प्रारंभ हुआ। इस मंदिर में काफी भीड़ होती है। उन्होंने बताया कि सदियों से चली आ रही परंपरा का निर्वहन करते हुए आज भी मां की पूजा पारंपरिक रीति रिवाज से की जाती है। दशमी के दिन महिलाएं सिंदूर खेलकर मां को विदाई देती है।
पाकुड़ में मां दुर्गा का विसर्जन कंधे पर होता है:300 साल से एक ही परिवार बना रहा प्रतिमा, सालभर आते हैं श्रद्धालु
