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बिहार के वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी कुंदन कृष्णन की ओर से पांच करोड़ रुपये के मानहानि नोटिस भेजे जाने के मामले में बक्सर के सांसद सुधाकर सिंह ने अपना पक्ष रखा है। उन्होंने कहा कि भरत भूषण तिवारी की मौत के मामले में सवाल उठाना जनप्रतिनिधि का दायित्व है। इसका जवाब तथ्यों, पारदर्शिता और निष्पक्ष जांच के जरिए देना चाहिए, न कि करोड़ों रुपये के हर्जाने की चेतावनी देकर। सुधाकर सिंह ने कहा, वह पीड़ित परिवार को न्याय दिलाने और प्रशासनिक जवाबदेही सुनिश्चित करने की मांग से पीछे नहीं हटेंगे। उन्होंने लोकसभा अध्यक्ष से इस मामले का संज्ञान लेने और यह जांच कराने का अनुरोध किया है कि कहीं कानूनी नोटिस का उद्देश्य उनके संसदीय दायित्वों के निर्वहन को प्रभावित करना तो नहीं है। भरत भूषण तिवारी की मौत पर उठाए थे सवाल सांसद सुधाकर सिंह ने भोजपुर जिले के बिलौटी गांव में 17 जून 2026 को भरत भूषण तिवारी की मौत का मामला उठाया था। उनके मुताबिक, इस मामले में बिहार एसटीएफ की कार्रवाई के बाद संबंधित पुलिसकर्मियों के खिलाफ कार्रवाई हुई, मृतक की मां की शिकायत पर प्राथमिकी दर्ज की गई और राज्य सरकार ने 20 जून 2026 को सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति विनोद कुमार सिन्हा की अध्यक्षता में न्यायिक जांच आयोग का गठन किया। सुधाकर सिंह ने कहा कि जांच पूरी होने और निष्कर्ष सामने आने से पहले किसी को दोषी ठहराना उचित नहीं है, लेकिन किसी अधिकारी को सवालों से परे भी नहीं माना जा सकता। 6 अक्टूबर को भेजा गया था कानूनी नोटिस राजद सांसद के मुताबिक, कुंदन कृष्णन के अधिवक्ता की ओर से 6 अक्टूबर 2026 को उन्हें कानूनी नोटिस भेजा गया। नोटिस में उनके वक्तव्यों को झूठा, दुर्भावनापूर्ण और मानहानिकारक बताते हुए सार्वजनिक रूप से माफी मांगने, संबंधित आरोप वापस लेने और भविष्य में ऐसे बयान नहीं देने की मांग की गई है। सांसद का कहना है कि नोटिस में 15 दिनों के भीतर इन मांगों को पूरा नहीं करने पर पांच करोड़ रुपये के दीवानी हर्जाने का दावा करने और आपराधिक कार्रवाई शुरू करने की चेतावनी दी गई है। उन्होंने सवाल उठाया कि पांच करोड़ रुपये की राशि किस आधार पर तय की गई है। 22 अक्टूबर को भेजा जवाब, तीन प्रमुख आपत्तियां सांसद ने बताया कि उन्होंने अपने अधिवक्ता के माध्यम से 22 अक्टूबर को नोटिस का जवाब भेजा। इसमें तीन प्रमुख आपत्तियां उठाई गई हैं। हस्ताक्षर और प्राधिकार पर सवाल: सांसद के मुताबिक, नोटिस के साथ कुंदन कृष्णन के हस्ताक्षर या उनके सत्यापित निर्देश और अधिवक्ता के प्राधिकार से जुड़े दस्तावेज संलग्न नहीं हैं। व्यक्तिगत और संस्थागत प्रतिष्ठा का मुद्दा: उनका कहना है कि नोटिस में व्यक्तिगत प्रतिष्ठा के साथ बिहार सरकार और पुलिस विभाग की संस्थागत छवि का बचाव भी दिखाई देता है। सरकारी अनुमति का सवाल: सांसद के अनुसार, नोटिस में सरकार की पूर्व स्वीकृति का स्पष्ट उल्लेख नहीं है और न ही इससे संबंधित आदेश या स्वीकृति-पत्र संलग्न किया गया है। ये आपत्तियां सांसद की ओर से रखी गई हैं। नोटिस जारी करने वाले पक्ष का जवाब उपलब्ध नहीं है। सरकार की अनुमति पर उठाए सवाल राजद सांसद सुधाकर सिंह ने अखिल भारतीय सेवा (आचरण) नियम, 1968 के नियम 17 का उल्लेख करते हुए कहा कि आधिकारिक कृत्यों की आलोचना के संबंध में न्यायालय या प्रेस के माध्यम से प्रतिवाद करने के लिए सरकार की पूर्व स्वीकृति से जुड़े प्रावधानों को स्पष्ट किया जाना चाहिए। सुधाकर सिंह ने मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी से पूछा कि क्या राज्य सरकार ने इस कानूनी कार्रवाई की अनुमति दी है। यदि अनुमति दी गई है, तो उसका आदेश और दायरा सार्वजनिक किया जाना चाहिए। यदि अनुमति नहीं दी गई है, तो सरकार को स्पष्ट करना चाहिए कि एक वरिष्ठ अधिकारी के आधिकारिक कार्यों से जुड़े सवालों पर निजी कानूनी कार्रवाई किस आधार पर की जा रही है।
लोकसभा अध्यक्ष से विशेषाधिकार समिति के संज्ञान में लाने की मांग राजद सांसद सुधाकर सिंह ने लोकसभा अध्यक्ष से पूरे मामले का संज्ञान लेने और यह जांच कराने का अनुरोध किया है कि कानूनी नोटिस का उद्देश्य उनके संसदीय दायित्वों को प्रभावित करना तो नहीं है। उन्होंने कहा कि यदि प्रथमदृष्टया ऐसे आधार मिलते हैं, तो मामले को विशेषाधिकार समिति के समक्ष भेजने पर विचार किया जाना चाहिए। उन्होंने लोकसभा सचिवालय के माध्यम से बिहार सरकार से यह जानकारी भी मांगे जाने की मांग किया है कि नोटिस जारी करने से पहले कोई सरकारी अनुमति ली गई थी या नहीं, संबंधित अधिवक्ता किस प्राधिकार के तहत काम कर रहे हैं और इस मामले में सरकार का आधिकारिक रुख क्या है। सांसद ने भरत भूषण तिवारी की मौत के मामले में गठित न्यायिक जांच आयोग की वर्तमान स्थिति, जांच की प्रगति और निष्कर्षों को सार्वजनिक करने की भी मांग की है। जनहित में सवाल उठाने से पीछे नहीं हटेंगे- सुधाकर सिंह राजद सांसद सुधाकर सिंह ने कहा, लोकतंत्र में जनप्रतिनिधियों का दायित्व जनता की समस्याएं उठाना, प्रशासनिक फैसलों की समीक्षा करना और सरकार से जवाबदेही सुनिश्चित करना है। उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 105 का उल्लेख करते हुए संसदीय अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और संसदीय कार्यवाही से जुड़े संरक्षण के महत्व पर जोर दिया। सभी सांसदों और विधायकों को भी भेजा पत्र राजद सांसद सुधाकर सिंह ने आगे ने कहा कि आईएएस और आईपीएस अधिकारी संविधान और कानून के अधीन काम करते हैं। उनके मुताबिक, किसी भी अधिकारी का सम्मान उसके पद के साथ-साथ निष्पक्षता, संवेदनशीलता, पारदर्शिता और जनता के प्रति जवाबदेही से तय होता है। सुधाकर सिंह ने कहा कि भरत भूषण तिवारी की मौत के मामले में उठाए गए सवालों का जवाब पांच करोड़ रुपये के नोटिस से नहीं, बल्कि निष्पक्ष जांच और तथ्यों से दिया जाना चाहिए। उन्होंने बताया कि इस संबंध में पत्र सभी सांसदों और विधायकों को भी भेजा जा रहा है।
5 करोड़ के मानहानि नोटिस पर सुधाकर सिंह का जवाब:बोले- मौत के मामले में सवाल उठाना जनप्रतिनिधि का दायित्व, लोकसभा अध्यक्ष से मामला संज्ञान में लाने की मांग

