अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत… अमेरिका को हमेशा से आंख दिखाने वाला ईरान इस बार कैसे हो गया बेबस?

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अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत… अमेरिका को हमेशा से आंख दिखाने वाला ईरान इस बार कैसे हो गया बेबस?

मिडिल ईस्ट में एक बार फिर ऐसा भूचाल आया है, जिसकी गूंज पूरी दुनिया में सुनाई दे रही है. ईरान में इजराइल और अमेरिका की ओर से किए गए एक बड़े और सटीक सैन्य हमले में देश की सबसे शक्तिशाली और सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत हो गई. यह घटना सिर्फ एक नेता की मौत तक सीमित नहीं है, बल्कि ये आने वाले दिनों में मिडिल ईस्ट में बड़े संकट की आहट जैसी है. एक रात में जो कुछ हुआ उसने ईरान की सुरक्षा व्यवस्था, उसकी आंतरिक स्थिरता और वैश्विक समीकरणों को पूरी तरह बदलकर रख दिया है.

रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह हमला कोई अचानक में लिया गया फैसलाभर नहीं था, बल्कि इसके पीछे महीनों की योजना, खुफिया जानकारी और सैन्य तैयारी शामिल थी. अमेरिका और इजराइल को ईरान के संवेदनशील ठिकानों और शीर्ष नेताओं के हर कदम की सटीक जानकारी थी. यही वजह रही कि हमले सीधे उन स्थानों पर किए गए, जहां देश के बड़े सैन्य ठिकाने थे और राजनीतिक शक्ति केंद्रित थी. बताया जा रहा है कि हमले का मुख्य उद्देश्य केवल सैन्य ठिकानों को नुकसान पहुंचाना नहीं था, बल्कि ईरान के शीर्ष नेतृत्व क कमजोर करना भी था. खामेनेई की लोकेशन तक पहुंच पाना इस बात का संकेत है कि हमलावरों के पास बेहद एडवांस इंटेलिजेंस मौजूद थी. यह भी कहा जा रहा है कि सटीक हमले को अंजाम देने के लिए साइबर और सैटेलाइट निगरानी का भी बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया गया.

एयर डिफेंस सिस्टम पूरी तरह से किया ध्वस्त

इस पूरे घटनाक्रम में सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि ईरान की मजबूत मानी जाने वाला एयर डिफेंस सिस्टम इतनी जल्दी कैसे ध्वस्त हो गया. शुरुआती हमलों में ही एयर डिफेंस सिस्टम को बर्बाद कर दिया गया, जिससे देश के ऊपर का आसमान पूरी तरह असुरक्षित हो गया.
विशेषज्ञों का मानना है कि जब किसी देश का एयर डिफेंस सिस्टम पहले ही चरण में ध्वस्त हो जाए, तो उसके बाद होने वाले हमलों को रोकना लगभग असंभव हो जाता है. यही वजह रही कि हमले के बाद ईरान को जवाबी कार्रवाई करने का पर्याप्त समय ही नहीं मिल पाया. इसने न केवल सैन्य स्तर पर बल्कि मनोवैज्ञानिक रूप से भी ईरान को कमजोर कर दिया.

एक साथ कई शहरों पर हमलों ने तोड़ी कमर

हमले की एक और खास बात यह रही कि इसे कई शहरों में एक साथ अंजाम दिया गया. राजधानी तेहरान के अलावा इस्फहान, क़ोम, करज और केरमंशाह जैसे महत्वपूर्ण शहरों को निशाना बनाया गया. इससे देश की कमांड और कंट्रोल सिस्टम पूरी तरह से टूट गया.जब किसी देश के अलग-अलग हिस्सों में एक साथ हमला होता है, तो उसके लिए संभलना बेहद मुश्किल हो जाता है. यही रणनीति यहां भी अपनाई गई, जिससे ईरान की जवाबी क्षमता लगभग ठप हो गई. समुद्र और हवा दोनों दिशाओं से किए गए हमलों ने स्थिति को और जटिल बना दिया.

अमेरिका-ईरान के बीच आखिर क्यों पनपा तनाव?

इस पूरे घटनाक्रम को समझने के लिए यह जरूरी है कि अमेरिका और ईरान के बीच के पुराने संबंधों पर नजर डाली जाए. दोनों देशों के बीच दशकों से तनाव बना हुआ है. ईरान की नीतियां और उसका परमाणु कार्यक्रम हमेशा अमेरिका के लिए चिंता का विषय रहा है. ईरान लगातार यह कहता रहा है कि उसका परमाणु कार्यक्रम केवल शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए है, लेकिन अमेरिका और उसके सहयोगी देशों को इस पर संदेह रहा है. इसके अलावा इजरायल के साथ ईरान के रिश्ते भी बेहद तनावपूर्ण रहे हैं, जो इस टकराव को और गहरा करते हैं.अयातुल्ला खामेनेई इस पूरे संघर्ष के केंद्र में रहे. उन्होंने पश्चिमी देशों के खिलाफ सख्त रुख अपनाया और ईरान की स्वतंत्र नीतियों को मजबूती से आगे बढ़ाया. यही कारण है कि वे लंबे समय तक वैश्विक राजनीति में एक महत्वपूर्ण और विवादास्पद चेहरा बने रहे.

कौन थे अयातुल्ला अली खामेनेई?

अयातुल्ला अली खामेनेई ईरान के सर्वोच्च नेता थे और देश की राजनीति, सेना और न्यायपालिका पर उनका नियंत्रण था. उनका जन्म 1939 में मशहद में हुआ था और उन्होंने इस्लामिक शिक्षा में गहरी पकड़ बनाई. वे 1979 की इस्लामिक क्रांति के बाद उभरे नेताओं में से एक थे.
क्रांति के बाद उन्होंने विभिन्न महत्वपूर्ण पदों पर काम किया और ईरान-इराक युद्ध के दौरान राष्ट्रपति भी रहे. अयातुल्ला रुहोल्लाह खुमैनी की मौत के बाद उन्होंने सुप्रीम लीडर का पद संभाला और लगभग तीन दशकों से अधिक समय तक इस पद पर बने रहे. उनके नेतृत्व में ईरान ने एक मजबूत राजनीतिक और सैन्य ढांचा विकसित किया, जिसमें इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) की भूमिका बेहद अहम रही. यह संगठन देश की सुरक्षा के साथ-साथ विदेशों में भी ईरान के प्रभाव को बढ़ाने का काम करता रहा.

अयातुल्ला अली खामेनेई के खिलाफ उठने लगी थी आवाज

इस पूरी घटना का एक और महत्वपूर्ण पहलू ईरान के अंदर की स्थिति है. पिछले कुछ वर्षों में देश में आर्थिक समस्याएं, प्रतिबंधों का असर और सामाजिक असंतोष बढ़ता गया है. कई बार सरकार के खिलाफ बड़े स्तर पर प्रदर्शन भी देखने को मिले हैं. बताया जा रहा है कि इस घटना के बाद कुछ जगहों पर लोगों ने विरोध के बजाय जश्न मनाया. हालांकि ऐसी खबरों की पुष्टि अलग-अलग स्रोतों से होनी बाकी है, लेकिन यह संकेत जरूर मिलता है कि देश के भीतर एक वर्ग ऐसा भी है जो मौजूदा व्यवस्था से संतुष्ट नहीं था.यदि यह सच है, तो यह केवल एक सैन्य या राजनीतिक संकट नहीं, बल्कि सामाजिक असंतुलन का भी संकेत है. किसी भी देश के लिए यह स्थिति बेहद चुनौतीपूर्ण होती है, जब बाहरी हमलों के साथ-साथ आंतरिक समर्थन भी कमजोर पड़ने लगे.

तेल के बाजार में दिखेगा बड़ा उतार-चढ़ाव

ईरान मिडिल ईस्ट की राजनीति में एक प्रमुख शक्ति रहा है. ऐसे में वहां की सत्ता में बड़ा बदलाव पूरे क्षेत्र को प्रभावित कर सकता है. तेल बाजार से लेकर सुरक्षा व्यवस्था तक हर क्षेत्र में इसका असर देखने को मिल सकता है.विशेषज्ञों का मानना है कि इस घटना के बाद क्षेत्र में तनाव और बढ़ सकता है. कई देश अपनी सुरक्षा नीतियों की समीक्षा कर सकते हैं और नए गठबंधन बन सकते हैं. इसके अलावा वैश्विक स्तर पर भी कूटनीतिक गतिविधियां तेज होने की संभावना है.

इसे भी पढ़ें:- 36 साल तक सत्ता संभालने वाले ईरान के सुप्रीम लीडर की मौत, जानिए उनका पूरा परिवार

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