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परंपराओं की होली…उड़े गुलाल:रांची में होली का त्योहार यानी रंग, रस्म और रिश्तों का संगम


राजधानी में होली केवल रंगों का उत्सव नहीं, बल्कि सदियों से चली आ रही परंपराओं, आस्था और सामाजिक एकता का जीवंत प्रतीक है। चुटिया की ऐतिहासिक डोल यात्रा, बहावलपुरी पंजाबी समाज की सांझी अगजा और मारवाड़ी समाज की ठंडी होली- तीनों मिलकर रांची की सांस्कृतिक विविधता को खास पहचान देते हैं। रांची में होली के ये विविध रूप बताते हैं कि यहां रंगों के साथ परंपराओं की भी गहरी छाप है- जहां आस्था, इतिहास और सामाजिक समरसता एक साथ झलकती है। 700 वर्ष पुरानी परंपरा से जुड़ी है चुटिया की फगडोल यात्रा चुटिया स्थित प्राचीन श्रीराम मंदिर, चुटिया का इतिहास 1685 से जुड़ा माना जाता है। कहा जाता है कि चुटिया कभी नागवंशी शासकों की राजधानी थी और उसी समय से यहां फगुआ और होलिका दहन का आयोजन होता रहा है। परंपरा के अनुसार पाहन होलिका दहन से एक दिन पहले ‘फगुआ काटते’ हैं, इसलिए यहां एक दिन पहले ही होलिका दहन किया जाता है। श्रीराम मंदिर फगडोल जतरा आयोजन समिति के मुख्य संरक्षक विजय कुमार साहू बताते हैं कि होली के दिन यहां ‘फगडोल’ मनाया जाता है। सुबह गीली होली खेलने के बाद दोपहर एक बजे से श्रद्धालु नए वस्त्र धारण कर डोल जतरा मैदान पहुंचते हैं। भगवान श्रीराम, लक्ष्मण और मां जानकी के विग्रहों को डोली में सुसज्जित कर डोल चबूतरे पर विराजमान किया जाता है। पहले श्रद्धालु भगवान के चरणों में अबीर अर्पित कर फिर बुजुर्गों के चरणों में अबीर डाल आशीर्वाद लेते हैं। 4 मार्च को दोपहर 2 बजे यात्रा निकलेगी
1 मार्च की रात 10:25 बजे श्रीराम मंदिर चुटिया के महंत और नगर के पुरोहितों द्वारा विधि-विधान से होलिका दहन किया गया। फगडोल जतरा मेला समिति के अध्यक्ष विजय तिर्की के अनुसार, 4 मार्च को दोपहर 2 बजे डोल यात्रा निकलेगी, जो शाम 5 बजे तक मेले के रूप में चलेगी। बहावलपुरी समाज की सांझी अगजा और ‘मन्न की रोटी’ रांची के कृष्णानगर कॉलोनी में बसे बहावलपुरी पंजाबी समाज ने होली को सामूहिक रूप देने की अनूठी पहल की है। 12 वर्षों बाद समाज ने सामूहिक होलिका दहन की शुरुआत की, जिसे ‘सांझी अगजा’ नाम दिया गया। समाज के प्रतिनिधि नरेश पपनेजा बताते हैं कि पहले सभी परिवार अपने-अपने घरों में होलिका दहन करते थे, लेकिन अब सांझी लोहड़ी की तर्ज पर सामूहिक आयोजन किया जाता है। 2 मार्च की रात गुरुद्वारा मंदिर चौक पर सामूहिक अगजा जलाई गई। इससे पूर्व प्रत्येक परिवार ने घर में आटे और गुड़ से ‘मन्न की रोटी’ तैयार की। इस रोटी में प्रह्लाद रूपी धागा बांधा जाता है और गोइठे की अग्नि में पकाया जाता है। मान्यता है कि रोटी पूरी तरह पक जाती है, लेकिन प्रह्लाद का प्रतीक धागा नहीं जलता। इसके बाद सभी परिवार एकत्र होकर विधि-विधान से पूजा करते हैं और बड़ों का आशीर्वाद लेते हैं। कल 10 बजे निकलेगी समाज की होली टोली
4 मार्च को सुबह 10 बजे से समाज की होली टोली निकलेगी। बच्चे, महिलाएं और बुजुर्ग एक-दूसरे के घर जाएंगे, रंग-गुलाल लगाएंगे और गीत-संगीत के साथ होली मनाएंगे। जिन घरों में हाल ही में विवाह हुआ हो या नया शिशु जन्मा हो, वहां विशेष बधाई दी जाएगी। मारवाड़ी समाज की आस्था से जुड़ी ठंडी होली व गणगौर पूजा
मारवाड़ी समाज में होलिका दहन से पहले डांडा रोपण की परंपरा निभाई जाती है। इसके बाद महिलाएं ‘ठंडी होली’ पूजती हैं। मान्यता है कि जिन महिलाओं के पुत्र होते हैं, वे इस दिन उपवास रखती हैं और पूजा के बाद ही व्रत खोलती हैं। रात्रि में होलिका की अग्नि प्रज्वलित होने पर सभी लोग अग्नि के फेरे लगाकर पूजा-अर्चना करते हैं। इस अवसर पर मूंग-भात, मूंग का हलवा और कांजी बड़ा जैसे पारंपरिक व्यंजन बनाए जाते हैं। विनिता सिंघानिया ने बताया कि होली के दूसरे दिन छारंडी पर सांपदा माता की पूजा की जाती है। सफेद कच्चे सूत के सोलह तार लेकर उन्हें होली की अग्नि दिखाकर सोलह गांठें लगाई जाती हैं और हल्दी से रंगा जाता है। गेंहूं के सोलह दाने लेकर कथा सुनी जाती है और डोरा धारण किया जाता है। बाद में वैशाख माह में इस डोरे का विधिवत विसर्जन किया जाता है। गणगौर पूजा के लिए राख सुरक्षित रख लेते हैं
रश्मि कोठारी मालपानी ने बताया कि होलिका दहन की राख को भी सुरक्षित रखा जाता है, जिससे गणगौर पूजा के लिए पिंडी बनाई जाती है। इसी दिन से गणगौर पूजा की शुरुआत होती है। मारवाड़ी समाज में होली पारिवारिक परंपरा, व्रत-उपवास और सांस्कृतिक मूल्यों का उत्सव है।

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