बिहारशरीफ के मघड़ा में तीन दिवसीय वार्षिक शीतलाष्टमी मेला:झारखंड, यूपी, दिल्ली से भी पहुंचेंगे श्रद्धालु; सीसीटीवी कैमरों से निगरानी, सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम

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बिहारशरीफ मुख्यालय से महज 5 किलोमीटर की दूरी पर स्थित ऐतिहासिक मघड़ा ग्राम में आस्था का सैलाब उमड़ने को तैयार है। प्राचीन सिद्धपीठ मां शीतला के दरबार में मंगलवार से तीन दिवसीय वार्षिक शीतलाष्टमी मेले का भव्य आगाज होगा। चैत्र कृष्ण सप्तमी से शुरू होने वाले इस मेले को लेकर न केवल बिहार, बल्कि उत्तर प्रदेश, झारखंड,पश्चिम बंगाल,दिल्ली और उत्तराखंड जैसे राज्यों के साथ-साथ विदेशों से भी श्रद्धालुओं का जत्था मघड़ा पहुंचेगा। इतिहास की परतों में मघड़ा का महत्व इस मंदिर की प्राचीनता का प्रमाण चीनी यात्री ह्वेनसांग के यात्रा वृत्तांतों में मिलता है। मंदिर के पुजारी मिथलेश कुमार मिश्रा बताते हैं कि जब ह्वेनसांग नालंदा विश्वविद्यालय में अध्ययनरत थे, तब वे बड़ी पहाड़ी स्थित पुस्तकालय से विश्वविद्यालय जाने के क्रम में इसी नीम और पीपल के वृक्षों की छांव में विश्राम किया करते थे। उन्होंने अपनी रचनाओं में इस देवी स्थान का विशेष उल्लेख किया है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, जब भगवान विष्णु ने माता सती के शरीर के खंड किए थे, तब महादेव ने सती के अवशेषों को एक ‘मघ’ (घड़े) में रखकर इसी पावन धरती पर छिपाया था, जिसके कारण इस गांव का नाम मघड़ा पड़ा। कालांतर में राजा वृषकेतु को माता ने स्वप्न में दर्शन दिए, जिसके बाद खुदाई के दौरान मां की प्रतिमा प्राप्त हुई। अनोखी परंपरा: ‘मिट्ठी कुआं’ के जल से बनता है बसियौरा मघड़ा मंदिर की सबसे विशिष्ट परंपरा ‘बसियौरा’ पूजा है। सप्तमी के दिन श्रद्धालु चने की दाल, चावल और सब्जी का प्रसाद तैयार करते हैं और अष्टमी के दिन माता को बासी भोग लगाया जाता है। इस दौरान पूरे गांव में चूल्हा नहीं जलता और स्वच्छता का ऐसा नियम है कि घरों में झाड़ू तक नहीं लगाई जाती। इस प्रसाद को बनाने के लिए गांव के ही ऐतिहासिक ‘मिट्ठी कुआं’ के जल का प्रयोग होता है। लोक मान्यता है कि जहां से माता की प्रतिमा प्रकट हुई थी, वही स्थान आज कुएं के रूप में है, जिसका पानी भीषण गर्मी में भी कभी नहीं सूखता। आरोग्य और मनोकामना की देवी चेचक (माता) जैसे असाध्य रोगों से मुक्ति के लिए यह सिद्धपीठ पूरे देश में विख्यात है। श्रद्धालुओं का अटूट विश्वास है कि माता के दरबार का जल और भभूत लगाने मात्र से ही असाध्य चर्म रोगों का नाश होता है। मन्नत पूरी होने पर भक्त यहाँ ‘जीव के बदले जीव’ अर्पित करने की परंपरा के तहत कबूतर और अन्य भेंट चढ़ाते हैं।
सुरक्षा के कड़े इंतजाम, सीसीटीवी से निगरानी मेले की व्यापकता को देखते हुए नगर निगम और जिला प्रशासन ने सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए हैं। वार्ड पार्षद प्रतिनिधि जयंत शर्मा ने बताया कि इस बार पूरे मेला क्षेत्र को सीसीटीवी कैमरों से लैस किया गया है। मंदिर परिसर में 16 और बाहरी क्षेत्रों में 20 कैमरे लगाए गए हैं, जिनका सीधा मॉनिटरिंग कंट्रोल रूम से होगा। श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए लाइटिंग, पेयजल, मोबाइल शौचालय और मेडिकल कैंप की व्यवस्था की गई है। तालाब में किसी भी अप्रिय घटना को रोकने के लिए एसडीआरएफ (SDRF) की टीम को तैनात रहने का निर्देश दिया गया है।

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