Friday, June 19, 2026

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तेजस्वी और निशांत अगले महीने बिहार दौरे पर आमने-सामने होंगे

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद की तरह अब उनके बेटे निशांत कुमार व तेजस्वी यादव भी अगले महीने से बिहार के राजनीतिक मैदान में आमने-सामने होंगे। दोनों की पार्टियों, जदयू व राजद ने अपने-अपने नेता के बिहार दौरे के लिए तैयारी शुरू कर दी है। इसे बिहार की राजनीति में एक नए युग की शुरुआत के साथ ही राजनीतिक ध्रुवीकरण के दृष्टिकोण से भी देखा जा रहा है। वैसे तो राजद ने होली के बाद ही तेजस्वी के बिहार दौरे की तैयारी पूरी कर ली थी। संचार एवं समन्वय स्थापित करने के लिए चार जोनल प्रभारियों की नियुक्ति भी कर दी गई। हालांकि, राज्यसभा चुनाव, ईद और रामनवमी को देखते हुए उनका दौरा अप्रैल में करने की योजना बनाई गई है। दूसरी तरफ, बीते 8 मार्च को निशांत कुमार के जदयू की सदस्यता ग्रहण करने के बाद ही घोषणा की गई थी कि वे बिहार दौरा करेंगे। इस तरह बीते तीन दशकों से बिहार की राजनीति की धुरी रहे नीतीश कुमार और लालू प्रसाद के बेटे भी अब आमने-सामने आ गए हैं। नए वैचारिक टकराव की शुरुआत होगी मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के राज्यसभा जाने से निशांत कुमार के बिहार की राजनीति में उतरने का मुहूर्त बना। निशांत की एंट्री को जदयू में नई ऊर्जा और भविष्य के नेतृत्व के रूप में देखा जा रहा है। उनके दौरे में बिहार के लोग कैसे प्रतिक्रिया देते हैं, इस पर सबकी नजर होगी। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि दोनों युवा नेताओं के इस समानांतर दौरे से बिहार की राजनीति में नए पोस्टर वॉर और वैचारिक टकराव की शुरुआत होगी। दोनों का मकसद जनता के बीच जाना निशांत कुमार राज्यव्यापी यात्रा की शुरुआत चंपारण (महात्मा गांधी की कर्मभूमि) से कर सकते हैं। इसका उद्देश्य जमीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं से जुड़ना और सरकार के कार्यों को जनता तक पहुंचाना है। वहीं, नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव अगले महीने अपनी यात्रा के जरिए जनता के बीच जाएंगे। वे राज्य सरकार की नीतियों और हालिया राजनीतिक बदलावों को लेकर मोर्चा खोलेंगे। निशांत को अभी राजनीतिक अनुभव की जरूरत तेजस्वी यादव को विरासत के साथ-साथ करीब 15 साल का जनसमर्थन और राजनीतिक अनुभव है। जबकि निशांत कुमार के पास विरासत तो है, लेकिन अब उनके इस दौरे से जनाधार और अनुभव की शुरुआत होगी। एक तरफ भाजपा के लिए तेजस्वी यादव स्पष्ट राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी हैं। उनके खिलाफ रणनीति बनाना आसान है, जबकि निशांत कुमार के मामले में भाजपा की स्थिति अलग है।

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