
West Bengal Election 2026: पश्चिम बंगाल में चुनावी तारीखों का एलान होते ही ‘सत्ता के सिंहासन’ की जंग निर्णायक मोड़ पर आ गयी है. चुनाव आयोग ने घोषणा की है कि राज्य में 2 चरणों में 23 और 29 अप्रैल को मतदान होगा. 294 सीटों वाली बंगाल विधानसभा के लिए मुख्यमंत्री ममता बनर्जी अपने अभेद्य किले को बचाने के लिए ‘बंगाली अस्मिता’ और कल्याणकारी योजनाओं की ढाल लेकर मैदान में हैं, तो भाजपा प्रधानमंत्री मोदी के चेहरे और हिंदुत्व के नैरेटिव से ‘परिवर्तन’ की पटकथा लिखने को बेताब है. अस्तित्व बचाने की जद्दोजहद में जुटी माकपा और अकेले दम पर खोयी जमीन तलाशती कांग्रेस इस मुकाबले को चतुष्कोणीय बनाने की कोशिश कर रही हैं.
TMC : ममता बनर्जी का चेहरा और योजनाओं का ‘सुरक्षा कवच’
ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस (AITC) की सबसे बड़ी ताकत आज भी ममता बनर्जी का जुझारू व्यक्तित्व है. दीदी की छवि बंगाल के ग्रामीण अंचल में इतनी गहरी है कि विपक्षी दल इसका तोड़ नहीं ढूंढ़ पा रहे हैं. पार्टी का मजबूत बूथ स्तरीय संगठन और ‘लक्ष्मी भंडार’ जैसी कैश ट्रांसफर योजनाओं ने महिलाओं और गरीबों के बीच एक वफादार वोट बैंक तैयार किया है. हालांकि, 15 साल की सत्ता के बाद उभरी एंटी-इनकम्बेंसी और भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप पार्टी के लिए सबसे बड़ी चुनौती हैं. जिला स्तर पर गुटबाजी और स्थानीय नेताओं के प्रति जनता का आक्रोश ममता बनर्जी की राह में रोड़े अटका सकता है.
BJP : मोदी लहर और हिंदुत्व के सहारे ‘परिवर्तन’ की आस
भाजपा ने पिछले एक दशक में बंगाल में शून्य से शिखर तक का सफर तय किया है. वर्ष 2016 में महज 3 सीटों से शुरू हुई पार्टी आज करीब 39 प्रतिशत वोट शेयर के साथ मुख्य विपक्षी दल है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का नेतृत्व और भ्रष्टाचार के खिलाफ आक्रामक रुख भाजपा की ताकत है. लेकिन, पार्टी के सामने सबसे बड़ी कमजोरी स्थानीय स्तर पर ‘कद्दावर बंगाली चेहरे’ की कमी और टीएमसी द्वारा थोपा गया ‘बाहरी’ का टैग है. इसके अलावा, भाजपा की प्रदेश इकाई में जारी आंतरिक कलह और उत्तर भारतीय मॉडल पर अत्यधिक निर्भरता उसकी संभावनाओं को सीमित कर सकती है.
- बंगाल बीजेपी की ताकत : 2001 के चुनाव में केवल 5 प्रतिशत वोट, 2016 में 3 सीट और 2021 में 39 प्रतिशत वोट. पार्टी के 12 सांसद और 65 से अधिक विधायक.
- बंगाल बीजेपी की कमजोरी : राष्ट्रीय स्तर पर करिश्माई नेताओं की मौजूदगी के बावजूद पार्टी को टीएमसी से करारी हार का सामना करना पड़ता है.
- क्या कहते हैं विश्लेषक : वास्तव में कथित ‘उत्तर भारतीय मॉडल’ पर भाजपा की अत्यधिक निर्भरता अक्सर पार्टी की संभावनाओं के खिलाफ काम करती है. एसआईआर पर भाजपा के अत्यधिक जोर देने से मतुआ समुदाय जैसे विभिन्न समूह पार्टी से दूरी बना सकते हैं. बंगाल इकाई की आंतरिक गुटबाजी भी नुकसान पहुंचाती है.
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Left Front: आक्रोश को वोट में तब्दील करने की कोशिश
पश्चिम बंगाल में लगातार 34 साल तक राज करने वाली माकपा आज हाशिये पर है. पार्टी को अपने स्वच्छ छवि वाले नेताओं और ‘आरजी कर’ जैसे मुद्दों पर किये गये आंदोलनों से उम्मीद है, लेकिन यह आक्रोश वोटों में तब्दील होगा या नहीं, इस पर संशय है.
- माकपा की ताकत : 34 साल तक पश्चिम बंगाल पर शासन करने का लंबा इतिहास. 2021 के बंगाल विधानसभा चुनाव की तुलना में 2024 के लोकसभा चुनाव में थोड़ी मजबूती मिली. पूरे बंगाल में 20 दिनों तक चली ‘बांग्ला बचाओ यात्रा’ के दौरान ‘अच्छी प्रतिक्रिया’ से पार्टी उत्साहित. अपने नेताओं की स्वच्छ छवि और साधारण जीवनशैली पर गर्व.
- माकपा की कमजोरी : आंदोलनों और प्रदर्शनों से माकपा को 2021 के विधानसभा चुनावों और 2019 एवं 2024 के लोकसभा चुनावों में कोई खास चुनावी लाभ नहीं हुआ. 2011 में सत्ता में रहते हुए उसे 39 प्रतिशत वोट मिले थे, जिसमें से 30 प्रतिशत वोट अकेले माकपा को मिले. एक दशक बाद 2021 में वाम मोर्चा को सिर्फ 4.73 प्रतिशत वोट मिले. घटता जनाधार और नेताओं का उम्रदराज होना वाम मोर्चा के लिए बड़ी बाधाएं हैं. वाम मोर्चा एक दशक में राजनीतिक हाशिये पर पहुंच गया है.
- क्या कहते हैं विश्लेषक : वाम मोर्चा का गांव से लेकर शहर तक बड़ा जनाधार रहा है. पार्टी के नेता लंबे समय तक निष्क्रिय रहने के बाद अब सक्रियता दिखा रहे हैं. युवा नेताओं को मौका दिया जा रहा है. आने वाले दिनों में इसका लाभ पार्टी को मिल सकता है.
कांग्रेस : विधानसभा चुनाव 2026 अकेले लड़ने का फैसला
कांग्रेस ने इस बार वाम दलों से गठबंधन तोड़कर अकेले चुनाव लड़ने का साहसी फैसला किया है. मालदा और मुर्शिदाबाद जैसे अपने पारंपरिक गढ़ों में कांग्रेस को पुनरोत्थान की उम्मीद है. हालांकि, दोनों दलों के पास संसाधनों की कमी और ढहता हुआ सांगठनिक ढांचा सबसे बड़ी कमजोरी बनकर उभरा है.
- कांग्रेस की ताकत : कांग्रेस ने अपनी प्रासंगिकता बहाल करने के लिए अकेले चुनाव लड़ने का फैसला किया. वाम मोर्चा से लंबे समय से चले आ रहे गठबंधन को खत्म कर दिया. 2021 के चुनावों में मिली हार के बावजूद उत्तर और मध्य बंगाल के मालदा, मुर्शिदाबाद और नदिया जैसे जिलों में प्रभाव बरकरार है.
- कांग्रेस की कमजोरियां : 1970 के दशक के अंत में वाम मोर्चा के उदय से पहले दशकों तक पश्चिम बंगाल पर शासन करने वाली कांग्रेस राज्य में पुनः मजबूत पकड़ बनाने के लिए संघर्ष कर रही है. संगठनात्मक पतन, दलबदल और सीमित संसाधनों ने कई जिलों में पार्टी को कमजोर कर दिया है.
- क्या कहते हैं विश्लेषक : यदि इन क्षेत्रों में कांग्रेस ने ढंग से चुनाव प्रचार किया, तो धीरे-धीरे पार्टी का पुनरुत्थान हो सकता है. पार्टी की एक और ताकत उम्मीदवारों को आकर्षित करने की इसकी क्षमता है. आगामी चुनाव में पार्टी के टिकट के लिए सैंकड़ों आवेदन मिले हैं, जो संकेत हैं कि पिछले चुनावों में झटके के बावजूद लोगों को पार्टी से उम्मीद है.
West Bengal Election 2026: 2 चरणों का चुनाव और बदलता समीकरण
आमतौर पर बंगाल में चुनाव कई चरणों में होते रहे हैं, लेकिन इस बार 2 चरणों में मतदान होना प्रशासनिक और रणनीतिक रूप से बड़ा बदलाव है. 23 और 29 अप्रैल को होने वाला यह मतदान तय करेगा कि बंगाल की जनता ‘निरंतरता’ को चुनती है या ‘बदलाव’ को. वोटर लिस्ट से 63 लाख नामों का हटना और 60 लाख नामों का लंबित होना इस चुनाव का सबसे बड़ा ‘एक्स फैक्टर’ साबित हो सकता है, जिसने सभी दलों को अपनी रणनीति पर पुनर्विचार करने के लिए मजबूर कर दिया है.
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