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रांची वीमेंस कॉलेज के प्रांगण में सरहुल की पूर्व संध्या पर आयोजित सांस्कृतिक महोत्सव ने झारखंड की समृद्ध परंपराओं को जीवंत कर दिया। ढोल-नगाड़ों की थाप और पारंपरिक वेशभूषा में सजी छात्राओं के उत्साह ने पूरे कॉलेज परिसर को उत्सवमय बना दिया। यह आयोजन भावी पीढ़ी को अपनी जड़ों और प्रकृति संरक्षण के प्रति जागरूक करने का सशक्त माध्यम बना। शुभारंभ मुख्य अतिथि मेयर रोशनी खलखो, प्राचार्य डॉ. विनीता सिंह, प्रोफेसर इंचार्ज डॉ. रेनू कुमारी व अन्य वरिष्ठ शिक्षिकाओं द्वारा दीप प्रज्ज्वलित कर किया गया। अतिथियों को पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ सम्मानित किया गया। रोशनी खलखो ने अपने संबोधन की शुरुआत नागपुरी भाषा में की, जिससे छात्राओं के बीच आत्मीयता का संचार हुआ। उन्होंने छात्राओं को प्रेरित करते हुए कहा कि “अप्प ही अपनी संस्कृति अउर परम्परा को बचा के राख सकती है।” उन्होंने जोर दिया कि सरहुल एक धार्मिक पर्व नहीं है, बल्कि यह मानव जीवन दर्शन और प्रकृति के साथ गहरे तालमेल का प्रतीक है। छात्राओं से बड़ी संख्या में जुलूस में शामिल होने की अपील की। आर्ट कैंप: कैनवास पर जीवंत सरहुल डोरंडा में ‘सरहुल रंग–प्रकृति व परंपरा’ चित्रकला शिविर का आयोजन किया गया। कलाकृति स्कूल ऑफ आर्ट्स व सोहराई आर्ट झारखंड के साझा प्रयास से आयोजित इस दो दिवसीय कार्यशाला में 12 से 25 वर्ष के युवा कलाकारों ने तूलिका से झारखंड की विरासत को जीवंत किया। कलाकारों ने सरहुल के उल्लास, जनजातीय जीवनशैली और प्रकृति प्रेम को सोहराई व पारंपरिक शैलियों में उकेरा। वरिष्ठ चित्रकार व निदेशक धनंजय कुमार ने कहा कि सरहुल प्रकृति के प्रति हमारी आस्था का प्रतीक है। मनस्वी तिग्गा, जया, पीहू व आर्यन सहित कई युवाओं ने चित्र बनाए। प्राचार्य डॉ. विनीता सिंह ने कहा कि झारखंड की संस्कृति प्रकृति की पूजा पर आधारित है। सखुआ के फूलों का खिलना जीवन के नए चक्र का प्रतीक है। जनजातीय व क्षेत्रीय भाषा विभाग के शिक्षकों डॉ. सैलजा बाला (मंच संचालन), डॉ. पूनम सिंह (सरहुल की प्रासंगिकता) और डॉ. अनुपमा मिश्रा (सरहुल संदेश) ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। अंत में सभी ने प्रकृति संरक्षण का संकल्प लिया। सखुआ फूलों का खिलना नए चक्र का प्रतीक
मुंडारी, नागपुरी, कुड़ुख, पंचपरगनिया, हो, खड़िया, हिंदी, इतिहास, होम साइंस व भूगोल की छात्राओं ने एक से बढ़कर एक सांस्कृतिक प्रस्तुतियां दीं। मुंडारी विभाग की छात्राओं ने ‘बा चांडु: मुलु लेना, सारजोम बा बाताना…’ यानी सरहुल का चांद उग आया, सखुए में फूल खिल रहे हैं पर नृत्य किए। पारंपरिक परिधानों व गहनों में सजी छात्राओं ने झारखंड की जनजातीय विविधता का सुंदर चित्रण किया। ढोल, मांदर व नगाड़े बजाए। छात्राओं की सांस्कृतिक प्रस्तुतियों से जीवंत हुई झारखंडी विरासत रांची | (NUSRL के ‘सेंटर फॉर स्टडी एंड रिसर्च इन ट्राइबल राइट्स’ द्वारा सरहुल की पूर्व संध्या पर कार्यक्रम का आयोजन किया गया। आदिवासी संस्कृति, प्रकृति के प्रति कृतज्ञता व संवैधानिक अधिकारों के अंतर्संबंधों पर गहन चर्चा हुई। प्रसिद्ध लेखक महादेव टोप्पो ने मुख्य अतिथि के रूप में शिरकत की। उन्होंने आदिवासी जीवन दर्शन को रेखांकित करते हुए कहा कि आदिवासी समाज का हर त्योहार प्रकृति से जुड़ा है। यहां जंगल से लकड़ी काटने या फल तोड़ने से पहले प्रकृति को प्रणाम करने की परंपरा है, जो अन्य जीव-जंतुओं के अधिकारों के प्रति संवेदनशीलता को दर्शाती है। कुलपति प्रो. अशोक आर. पाटिल ने भविष्य की पीढ़ियों के लिए पारंपरिक ज्ञान और प्राकृतिक संतुलन के महत्व पर जोर दिया। कार्यक्रम के दौरान छात्रों ने ‘बाहा पर्व’ के इतिहास और महत्व पर आधारित एक नाटक का मंचन किया। झारखंड में फल तोड़ने से पहले प्रकृति को प्रणाम करने की है परंपरा: टोप्पो NUSRL में सरहुल सरहुल पूर्व संध्या
सरहुल का चांद उग आया, सखुए में फूल खिल रहे हैं…
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