
Horticulture College Khuntpani, चाईबासा (शचिंद्र कुमार दाश): पश्चिमी सिंहभूम स्थित चाईबासा के उद्यान महाविद्यालय, खूंटपानी में दीक्षारंभ कार्यक्रम का शुभारंभ बेहद उत्साह के साथ हुआ. इस अवसर पर मुख्य अतिथि के रूप में आईसीएआर–आईएआरआई, झारखंड के प्रधान वैज्ञानिक सह अकादमिक समन्वयक डॉ. विशाल नाथ उपस्थित रहे. उन्होंने नवप्रवेशित विद्यार्थियों को बागवानी क्षेत्र में उपलब्ध व्यापक करियर संभावनाओं से अवगत कराते हुए उन्हें लक्ष्य निर्धारण के लिए प्रेरित किया. कार्यक्रम की शुरुआत महाविद्यालय के सह-अधिष्ठाता डॉ. अरुण कुमार सिंह के स्वागत भाषण से हुई. उन्होंने मुख्य अतिथि का परिचय देते हुए उनके अनुभव और बागवानी क्षेत्र में योगदान पर प्रकाश डाला.
झारखंड में बागवानी विकास की व्यापक संभावनाएं
मुख्य अतिथि डॉ. विशाल नाथ ने अपने संबोधन में हरित क्रांति का उल्लेख करते हुए बताया कि डॉ. एम.एस. स्वामीनाथन के नेतृत्व में पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में कृषि उत्पादन में ऐतिहासिक वृद्धि हुई. उन्होंने कहा कि इन क्षेत्रों में फसल सघनता आज भी लगभग 200 प्रतिशत है, जबकि झारखंड में यह केवल 120–121 प्रतिशत के आसपास है. यह अंतर राज्य में कृषि एवं बागवानी विकास की अपार संभावनाओं को दर्शाता है.
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देश में बागवानी और कृषि उत्पादन में लगातार वृद्धि
डॉ. नाथ ने आंकड़ों के माध्यम से बताया कि देश में खाद्यान्न उत्पादन वर्ष 2015-16 के 251.54 मिलियन टन से बढ़कर 2024-25 में 357.73 मिलियन टन तक पहुंच गया है. वहीं, बागवानी उत्पादन 2013-14 के 280.70 मिलियन टन से बढ़कर 2024-25 में 367.72 मिलियन टन हो गया है. उन्होंने कहा कि पहले “एक अनार सौ बीमार” जैसी कहावत प्रचलित थी, क्योंकि पोषक फलों की उपलब्धता सीमित थी, लेकिन आज उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है. अब आवश्यकता गुणवत्ता, पोषण और मूल्य संवर्धन पर ध्यान केंद्रित करने की है.
बागवानी में झारखंड की मजबूत पहचान
डॉ. नाथ ने कहा कि महाराष्ट्र, तमिलनाडु, तेलंगाना और कर्नाटक जैसे राज्यों की भौगोलिक परिस्थितियां झारखंड से काफी हद तक मिलती-जुलती हैं और वे बागवानी क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति कर चुके हैं. इसके बावजूद झारखंड की उपलब्धियां भी कम नहीं हैं. उन्होंने बताया कि झारखंड देश में बेल उत्पादन में दूसरे, लीची में चौथे, कटहल में छठे और मिर्च उत्पादन में आठवें स्थान पर है. झारखंड की कृषि-जलवायु परिस्थितियां फलोत्पादन के लिए अत्यंत अनुकूल हैं. उन्होंने कहा कि समयपूर्व फलन और शीघ्र बाजार उपलब्धता से किसानों को बेहतर मूल्य मिल सकता है.
प्रसंस्करण और मूल्य संवर्धन पर दिया जोर
अपने व्याख्यान में डॉ. नाथ ने प्रसंस्करण और मूल्य संवर्धन की आवश्यकता पर विशेष बल दिया. उन्होंने कटहल को उच्च निर्यात क्षमता वाला उत्पाद बताते हुए कहा कि यदि राज्य में व्यवस्थित प्रसंस्करण इकाइयां स्थापित की जाएं, तो किसानों और युवाओं के लिए उद्यमिता के नए अवसर खुल सकते हैं. रेडी-टू-कुक और रेडी-टू-ईट उत्पादों के माध्यम से बेहतर बाजार मूल्य प्राप्त किया जा सकता है.
विद्यार्थियों से कहा- यही समय है मजबूत नींव रखने का
अंत में विद्यार्थियों को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि अध्ययन काल ही भविष्य की मजबूत नींव रखने का सबसे उपयुक्त समय है. बागवानी केवल उत्पादन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह प्रसंस्करण, विपणन, निर्यात और एग्री-बिजनेस से जुड़ा एक व्यापक क्षेत्र है, जिसमें युवाओं के लिए अनेक संभावनाएं मौजूद हैं. कार्यक्रम का संचालन और समन्वय अंजलि विवा मिंज, सहायक प्राध्यापक द्वारा किया गया. कार्यक्रम में महाविद्यालय के सभी सहायक प्राध्यापक एवं बड़ी संख्या में छात्र-छात्राएं उपस्थित रहे. विद्यार्थियों ने डॉ. नाथ के प्रेरणादायक मार्गदर्शन के लिए उनका और महाविद्यालय प्रशासन का आभार व्यक्त किया.
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