पटना9 मिनट पहले
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इंदिरा गांधी आयुर्विज्ञान संस्थान (IGIMS) पटना के कार्डियोलॉजी विभाग ने महाधमनी (Aorta) की गंभीर बीमारी का सफल इलाज बिना चीर-फाड़ किया है। यह प्रक्रिया थोरैसिक एंडोवास्कुलर एओर्टिक रिपेयर (TEVAR) तकनीक से की गई, जिसमें मरीज पूरे समय होश में रहा। यह बिहार और झारखंड में इस तरह का पहला सफल उपचार है।
इस उपलब्धि के बाद अब जटिल एओर्टिक बीमारियों से जूझ रहे मरीजों को इलाज के लिए बड़े शहरों पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा। यह तकनीक कम खर्च, कम जोखिम और तेजी से रिकवरी के साथ पटना में ही उपलब्ध है।

TEVAR तकनीक से सफल ऑपरेशन के बाद मरीज के साथ डॉक्टरों की टीम।
ऑपरेशन के दौरान मरीज होश में रहा
इस पूरी प्रक्रिया की सबसे खास बात यह रही कि मरीज को जनरल एनेस्थीसिया (बेहोशी की दवा) देने की आवश्यकता नहीं पड़ी। ऑपरेशन स्थानीय बेहोशी (लोकल एनेस्थीसिया) में ही किया गया और मरीज पूरे समय होश में रहा।
ऑपरेशन सफल रहा और मरीज को सिर्फ तीन दिन में अस्पताल से छुट्टी दे दी गई। आमतौर पर ऐसे मामलों में मरीजों को लंबे समय तक अस्पताल में भर्ती रहना पड़ता है।
क्या है TEVAR तकनीक?
TEVAR एक आधुनिक और उन्नत इलाज तकनीक है, जिसका उपयोग महाधमनी से जुड़ी खतरनाक बीमारियों, जैसे एन्यूरिज्म (जब धमनी असामान्य रूप से फैल जाती है) और एओर्टिक डिसेक्शन (जब महाधमनी में दरार आ जाती है) के उपचार में किया जाता है।
इस तकनीक में छाती खोलने की जरूरत नहीं होती। डॉक्टर शरीर में एक छोटे से चीरे के जरिए एक स्टेंट ग्राफ्ट डालते हैं, जो अंदर से कमजोर हिस्से को सहारा देता है और रक्त प्रवाह को सामान्य करता है।
पहले इन बीमारियों का इलाज ओपन हार्ट या ओपन चेस्ट सर्जरी से होता था, जो काफी जटिल और जोखिम भरा होता था। इसमें मरीज को लंबे समय तक अस्पताल के आईसीयू वार्ड में रहना पड़ता था और रिकवरी में हफ्तों लग जाते थे।
TEVAR तकनीक से बड़ा ऑपरेशन करने की आवश्यकता नहीं पड़ती। संक्रमण का खतरा कम होता है और मरीज जल्दी चलने-फिरने लगता है। यही वजह है कि इसे ज्यादा सुरक्षित और प्रभावी विकल्प माना जा रहा है।

आमतौर पर एऑर्टिक एन्यूरिज्म का पता लगाने के लिए अल्ट्रासाउंड किया जाता है। फूली हुई धमनियां इस बीमारी के होने का संकेत देती हैं।
महाधमनी की बीमारी क्यों है जानलेवा?
महाधमनी (Aorta) शरीर की सबसे बड़ी रक्त वाहिका होती है, जो दिल से पूरे शरीर में खून पहुंचाती है। अगर इसमें दरार (डिसेक्शन) या ज्यादा फैलाव (एन्यूरिज्म) हो जाए तो खून का प्रवाह रुक सकता है, जिससे शरीर के जरूरी अंग प्रभावित हो सकते हैं। समय पर इलाज न मिले तो जान भी जा सकती है। इसलिए इसका समय पर और सही इलाज बेहद जरूरी होता है।
डॉक्टरों की टीम ने रचा इतिहास
इस जटिल प्रक्रिया को डॉ. रवि विष्णु प्रसाद (प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष) के नेतृत्व में सफलतापूर्वक अंजाम दिया गया। उनकी टीम मे डॉ. चन्द्र भानु चंदन,डॉ. गौतम शामिल रहे।
कार्डियोलॉजी विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो.(डॉ.) रवि विष्णु प्रसाद ने बताया कि, मधुबनी का रहने वाला 60 वर्षीय मरीज जो एओर्टिक बीमारियों से जूझ रहा था। उसे IGIMS में 20 अप्रैल को भर्ती कराया गया। 21 अप्रैल को सफल ऑपरेशन के महज 3 दिनों बाद यानी 24 अप्रैल को उसे अस्पताल से डिस्चार्ज कर दिया गया है। मरीज फिलहाल पूरी तरह से स्वस्थ है।

पूर्वी भारत के मरीजों के लिए बड़ी राहत
अब तक इस तरह का एडवांस इलाज कराने के लिए मरीजों को दिल्ली, मुंबई या दूसरे बड़े शहरों में जाना पड़ता था। इससे इलाज का खर्च बढ़ जाता था। समय और संसाधनों की भी ज्यादा जरूरत होती थी। लेकिन अब बिहार और झारखंड के मरीजों को स्थानीय स्तर पर ही सुविधा मिलेगी। कम खर्च में बेहतर इलाज संभव होगा।
बिहार में स्वास्थ्य सेवाओं की नई पहचान IGIMS, पटना की इस उपलब्धि ने यह साबित कर दिया है कि बिहार अब अत्याधुनिक चिकित्सा सुविधाओं के मामले में तेजी से आगे बढ़ रहा है।
यह सफलता सिर्फ एक ऑपरेशन नहीं, बल्कि हजारों मरीजों के लिए उम्मीद की नई किरण है। जहां इलाज आसान, सुरक्षित और सुलभ हो रहा है।



