आज की भागदौड़ भरी जिंदगी और ‘प्राइवेसी’ के दौर में जब फ्लैट कल्चर और एकल परिवार का चलन बढ़ रहा है, रांची के कुछ आंगन आज भी सांझा चूल्हे की महक से महक रहे हैं। जब बाहर की दुनिया ठहर जाती है, तब परिवार ही वह ‘संबल’ बनता है जो हमें टूटने नहीं देता। संयुक्त परिवार सिर्फ रहने की व्यवस्था नहीं, बल्कि एक अनुशासन और संवेदना का नाम है। यहां दादी की कहानियों में सीख है, तो दादा की नसीहतों में भविष्य की सुरक्षा। आइए मिलते हैं शहर के दो ऐसे परिवारों से जिनकी एकजुटता आज के युवाओं के लिए एक ‘लर्निंग चैप्टर’ है। गाड़ोदिया परिवार… 56 साल से एक ही किचन, नाश्ते की टेबल पर सुलझती हैं हर मुश्किल मारवाड़ी सम्मेलन के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष गोवर्धन प्रसाद गाड़ोदिया का घर रांची में एकता की मिसाल है। 3 बेटे-बहुएं व पोते-पोतियों से भरे इस घर में पिछले 56 सालों से एक ही किचन में खाना बनता है। गाड़ोदिया जी कहते हैं, ‘बिजनेस की टेंशन हो या घर की समस्या, जब हम सवेरे नाश्ते की टेबल पर साथ बैठते हैं, तो मुश्किल चुटकियों में हल हो जाती है।’ इस परिवार की खूबसूरती देखिए- आज पूरा घर जश्न में डूबा है क्योंकि परिवार के सबसे छोटे सदस्य हर्षित ने 12वीं बोर्ड में 97.4% अंक लाकर संयुक्त परिवार में पढ़ाई का बेहतर माहौल दिखाया।
इमाम अली की विरासत… 27 सदस्यों का ‘मिनी हिंदुस्तान’, जहां दादा की नसीहत आज भी कानून है रांची के इन घरों में आज भी चहकती है ‘संयुक्त’ खुशियां ब्रांबे के स्वतंत्रता सेनानी शेख इमाम अली की तीसरी पीढ़ी आज भी एक छत के नीचे रहती है। अधिवक्ता नसर इमाम बताते हैं कि उनके परिवार में कुल 27 सदस्य हैं। 7 भाई, उनकी प|ियां और 10 बच्चों का यह बड़ा कुनबा आज भी दादा और पिता की उस नसीहत पर चलता है, जिसमें उन्होंने मिल-जुलकर रहने को ही सबसे बड़ी दौलत बताया था। महिलाएं मिलकर खाना बनाती हैं व पूरा परिवार दस्तरख्वान पर बैठकर एक साथ खाता है। चाहे ईद हो या किसी की शादी, इस घर की रौनक देखने लायक होती है।

