सीवान सदर अस्पताल की इमरजेंसी व्यवस्था पूरी तरह बदहाल नजर आ रही है। हालात ऐसे हैं कि यहां गंभीर मरीजों का इलाज अब विशेषज्ञ एमबीबीएस डॉक्टरों के बजाय बीएमएस और इंटर्न डॉक्टरों के भरोसे चल रहा है। अस्पताल प्रशासन ने इमरजेंसी वार्ड के बाहर डॉक्टरों और नर्सिंग स्टाफ का ड्यूटी रोस्टर तो चस्पा कर दिया है, लेकिन रोस्टर में नाम दर्ज कई डॉक्टर ड्यूटी पर पहुंच ही नहीं रहे हैं। इसका खामियाजा सीधे मरीजों को भुगतना पड़ रहा है। पोस्टमार्टम और इंजुरी रिपोर्ट से जुड़े कार्य बाधित जानकारी के अनुसार विगत कई दिनों से सुबह, दोपहर और रात की शिफ्ट में तैनात एमबीबीएस डॉक्टर लगातार अनुपस्थित मिल रहे हैं। ऐसे में इमरजेंसी में पहुंचने वाले गंभीर मरीजों का इलाज मजबूरी में बीएमएस डॉक्टर और इंटर्न डॉक्टर कर रहे हैं। इससे न केवल इलाज व्यवस्था प्रभावित हो रही है, बल्कि पोस्टमार्टम, इंजुरी रिपोर्ट, मेडिकल फिटनेस और कानूनी प्रक्रियाओं से जुड़े कार्य भी बाधित हो रहे हैं। सबसे गंभीर सवाल यह है कि मरीजों का पुर्जा अनुपस्थित एमबीबीएस डॉक्टरों के नाम से काटा जा रहा है, जबकि इलाज कोई और कर रहा है। बीएमएस और इंटर्न डॉक्टरों को इमरजेंसी में सहयोग के लिए लगाया गया है, लेकिन उन्हें कानूनी रूप से पोस्टमार्टम, इंजुरी रिपोर्ट या फिटनेस सर्टिफिकेट जारी करने का अधिकार नहीं है। बावजूद इसके अस्पताल की अव्यवस्था के कारण उनसे वही काम कराया जा रहा है। सोमवार को हालात तब और शर्मनाक हो गए जब सुबह 8 बजे से दोपहर 2 बजे तक ड्यूटी पर तैनात एमबीबीएस डॉक्टर राघवेंद्र वाजपेयी अस्पताल पहुंचे ही नहीं। उस दौरान इमरजेंसी में मारपीट, सड़क दुर्घटना और अन्य गंभीर मरीजों की भारी भीड़ लगी रही। अफरा-तफरी इस बात को लेकर मची रही कि आखिर पर्चा किस डॉक्टर के नाम से काटा जाए। बाद में अनुपस्थित डॉक्टर के नाम से ही पर्चा काटा गया और पूरे वार्ड का जिम्मा अकेले बीएमएस डॉक्टर विपुल कुमार संभालते रहे। स्थिति यहीं नहीं थमी। दोपहर 2 बजे के बाद की शिफ्ट में तैनात एमबीबीएस डॉक्टर सुनील कुमार भी ड्यूटी से गायब मिले, जबकि बीएमएस डॉक्टर निशांत प्रभाकर इमरजेंसी संभालते दिखे। सवाल उठ रहा है कि जब इमरजेंसी वार्ड में तैनात एमबीबीएस डॉक्टर लगातार गायब रहेंगे तो मरीजों की जानकी जिम्मेदारी आखिर कौन लेगा?
पूरे मामले में जब सदर अस्पताल अधीक्षक डॉ. अनिल सिंह से संपर्क करने की कोशिश की गई तो उन्होंने फोन रिसीव नहीं किया। इससे अस्पताल प्रशासन की कार्यशैली पर भी गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।
