‘108 पर फोन किया था, बोले गाड़ी भेज रहे हैं… लेकिन मरीज की सांसें टूटने लगीं, इसलिए प्राइवेट एंबुलेंस करनी पड़ी…’ यह दर्द सिर्फ एक परिवार का नहीं, बल्कि झारखंड की बदहाल 108 एंबुलेंस सेवा की हकीकत बन चुका है। ओरमांझी के नजदीक एक गांव से रिम्स पहुंचे एक मरीज के परिजन ने बताया कि करीब 26 किलोमीटर की दूरी तय करने के लिए उन्हें 2800 रुपए देने पड़े। राज्य में गंभीर मरीजों के लिए लाइफलाइन मानी जाने वाली 108 सेवा अब खुद इमरजेंसी में नजर आ रही है। कॉल सेंटर में बात होने के बाद भी कई जगहों पर एंबुलेंस एक-एक घंटे तक नहीं पहुंच रही। मजबूरी में मरीजों के परिजन निजी एंबुलेंस या किराये की गाड़ियों का सहारा लेने को विवश हैं।
दैनिक भास्कर की पड़ताल में सामने आया कि शुक्रवार दोपहर 1 बजे से शाम 5 बजे तक रिम्स इमरजेंसी में पहुंचे 26 मरीजों में से कई निजी एंबुलेंस से लाए गए थे। इनमें 9 मरीजों के परिजनों ने बताया कि उन्होंने पहले 108 सेवा को फोन किया था, लेकिन लंबे इंतजार के बाद भी एंबुलेंस नहीं आई। मरीज की हालत बिगड़ती देख उन्हें निजी एंबुलेंस करनी पड़ी। 108 सेवा समय पर नहीं मिलने का फायदा निजी एंबुलेंस चालक उठा रहे हैं। झारखंड के शहरी क्षेत्र में रिस्पॉन्स टाइम 25 मिनट है, वहीं ग्रामीण क्षेत्रों में 40 मिनट है। लेकिन दुर्भाग्य है कि झारखंड में 80% मामलों में रिस्पॉन्स टाइम फेल साबित होता है। बड़ा सवाल : भरोसा किस पर करें राज्य में 108 एंबुलेंस सेवा को गरीब और जरूरतमंद मरीजों के लिए सबसे बड़ी राहत माना जाता है। लेकिन जब गंभीर मरीज को अस्पताल पहुंचाने में ही एक-एक घंटे की देरी होने लगे, तो सवाल पूरे सिस्टम पर उठना तय है। अब नई एजेंसी का चयन होने तक मरीजों की जिंदगी इंतजार में अटकी हुई रहेगी। मेंटेनेंस में लापरवाही से बिगड़ी स्थिति एजेंसी को केवल एंबुलेंस चलाने ही नहीं, बल्कि उनके रखरखाव की जिम्मेदारी भी दी गई थी। लेकिन कई गाड़ियों का समय पर मेंटेनेंस नहीं हुआ। खराब होने के बाद एंबुलेंस लंबे समय तक ऑफ रोड खड़ी रहीं। नतीजा यह हुआ कि जरूरत के समय सड़क पर एंबुलेंस कम दिखीं और मरीजों को सेवा नहीं मिल सकी। लगातार शिकायतों के बाद एनएचएम ने खत्म किया संचालन एजेंसी से करार 108 सेवा को लेकर लगातार मिल रही शिकायतों के बाद राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (एनएचएम) ने बड़ी कार्रवाई की है। विभाग ने एंबुलेंस संचालन कर रही एजेंसी के साथ हुआ करार खत्म कर दिया है। करीब एक वर्ष में एजेंसी के खिलाफ 100 से अधिक शिकायतें विभाग तक पहुंचीं। हालांकि, नई एजेंसी के चयन तक वर्तमान एजेंसी को ही सेवा संचालन जारी रखने का निर्देश दिया गया है। गिरिडीह निवासी 70 वर्षीय सुकर ठाकुर पहले से शुगर के मरीज हैं। शरीर में सूजन और सांस लेने में दिक्कत बढ़ने के बाद परिजनों ने एंबुलेंस के लिए संपर्क किया, लेकिन सुविधा नहीं मिली। इसके बाद भाड़े की गाड़ी बुक कर रिम्स लाया गया। यहां पहुंचने के बाद भी करीब 45 मिनट तक इमरजेंसी के बाहर पड़ा रहा। एसएनएमएमसीएच धनबाद से रेफर 18 वर्षीय खुशी कुमारी को सांस लेने में गंभीर परेशानी थी। परिजनों ने बताया कि वहां से 108 एंबुलेंस से रिम्स भेजने की बात हुई थी, लेकिन काफी देर तक गाड़ी नहीं पहुंची। मरीज की हालत लगातार बिगड़ रही थी, इसलिए ज्यादा इंतजार नहीं किया। निजी एंबुलेंस बुक कर रिम्स लाना पड़ा। भाड़े की गाड़ी से पहुंचे सुकर ठाकुर निजी एंबुलेंस से लाई गई खुशी कुमारी इन 2 केस स्टडीज से जानिए परेशानी


