राज्यसभा की दूसरी सीट पर भाकपा-माले की दावेदारी से महागठबंधन में बढ़ी सियासी खींचतान झारखंड की दो राज्यसभा सीटों के लिए होने वाले चुनाव से पहले सत्तारूढ़ महागठबंधन के भीतर सियासी खींचतान शुरू हो गई है। विधानसभा के संख्या बल के हिसाब से एक सीट पर झामुमो (JMM) की जीत लगभग तय है, जबकि दूसरी सीट पर अब तक कांग्रेस अपना स्वाभाविक दावा मान कर चल रही थी। लेकिन, अब भाकपा-माले ने इस दूसरी सीट पर अपनी दावेदारी पेश कर महागठबंधन की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। विधानसभा में महज दो विधायक होने के बावजूद भाकपा-माले ने गठबंधन में अपनी वफादारी और अहम भूमिका का हवाला देते हुए अपने वरिष्ठ नेता और पूर्व विधायक विनोद सिंह को राज्यसभा भेजने की मांग की है। माले का तर्क: हम मजबूत सिपाही, हमें मिले मौका चेन्नई में पार्टी की केंद्रीय कमेटी की बैठक में हिस्सा लेने गए भाकपा-माले के प्रदेश सचिव मनोज भक्त ने कहा कि एक सीट पर झामुमो अपना प्रत्याशी उतरे और दूसरी सीट भाकपा-माले को दे। सहयोगी दलों का दो टूक जवाब: यहाँ भावनाएं नहीं, संख्या बल देखा जाता है भाकपा-माले का यह प्रस्ताव महागठबंधन के अन्य दलों के गले नहीं उतर रहा है। झामुमो और कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं ने अनौपचारिक रूप से इसे अव्यावहारिक करार दिया है। उनका साफ कहना है कि राज्यसभा चुनाव जैसे अहम मौकों पर भावनाएं नहीं, बल्कि विधायकों का संख्या बल काम आता है। जिसके पास संख्या बल है, दावेदारी उसी की बनती है। भाजपा में भी हलचल तेज, प्रदेश अध्यक्ष दिल्ली तलब इधर, भाजपा भी अपनी रणनीति तैयार करने में जुट गई है। भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष आदित्य साहू को आलाकमान ने दिल्ली बुलाया है। वे 1 जून को दिल्ली रवाना होंगे, जहाँ 1-2 जून को पार्टी के शीर्ष नेताओं के साथ प्रत्याशी के नाम पर मंथन होगा। माना जा रहा है कि इस बैठक के बाद भाजपा अपने प्रत्याशी की घोषणा कर देगी। विधानसभा में वर्तमान दलगत स्थिति (कुल सीटें: 81) पूरा गणित ऐसे समझें: जीत का फॉर्मूला: एक राज्यसभा सीट जीतने के लिए प्रथम वरीयता के 28 विधायकों के वोट की जरूरत है। महागठबंधन के पास कुल 56 विधायक हैं ($28 times 2 = 56$), यानी दोनों सीटें जीतने का एकदम सटीक और पर्याप्त आंकड़ा सत्ता पक्ष के पास है। विपक्ष की स्थिति: विपक्ष (NDA) के पास कुल 24 वोट हैं। उन्हें एक सीट जीतने के लिए भी बहुमत के आंकड़े (28) से 4 वोट कम पड़ रहे हैं। तो क्या माले बिगाड़ सकती है खेल? भाकपा-माले के वर्तमान में दो विधायक हैं—विनोद सिंह (बगोदर) और अरूप चटर्जी (निरसा)। भले ही माले के पास सिर्फ 2 विधायक हैं, लेकिन अगर सीट न मिलने पर उन्होंने वोटिंग से दूरी बनाई, तो महागठबंधन का कुल आंकड़ा घटकर 54 रह जाएगा। ऐसी स्थिति में दूसरी सीट पर महागठबंधन के प्रत्याशी की राह मुश्किल हो सकती है और उन्हें क्रॉस वोटिंग या दूसरी वरीयता के वोटों पर निर्भर रहना पड़ सकता है।
राज्यसभा चुनाव: दो विधायकों वाली भाकपा-माले ने भी मांगी सीट
राज्यसभा की दूसरी सीट पर भाकपा-माले की दावेदारी से महागठबंधन में बढ़ी सियासी खींचतान झारखंड की दो राज्यसभा सीटों के लिए होने वाले चुनाव से पहले सत्तारूढ़ महागठबंधन के भीतर सियासी खींचतान शुरू हो गई है। विधानसभा के संख्या बल के हिसाब से एक सीट पर झामुमो (JMM) की जीत लगभग तय है, जबकि दूसरी सीट पर अब तक कांग्रेस अपना स्वाभाविक दावा मान कर चल रही थी। लेकिन, अब भाकपा-माले ने इस दूसरी सीट पर अपनी दावेदारी पेश कर महागठबंधन की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। विधानसभा में महज दो विधायक होने के बावजूद भाकपा-माले ने गठबंधन में अपनी वफादारी और अहम भूमिका का हवाला देते हुए अपने वरिष्ठ नेता और पूर्व विधायक विनोद सिंह को राज्यसभा भेजने की मांग की है। माले का तर्क: हम मजबूत सिपाही, हमें मिले मौका चेन्नई में पार्टी की केंद्रीय कमेटी की बैठक में हिस्सा लेने गए भाकपा-माले के प्रदेश सचिव मनोज भक्त ने कहा कि एक सीट पर झामुमो अपना प्रत्याशी उतरे और दूसरी सीट भाकपा-माले को दे। सहयोगी दलों का दो टूक जवाब: यहाँ भावनाएं नहीं, संख्या बल देखा जाता है भाकपा-माले का यह प्रस्ताव महागठबंधन के अन्य दलों के गले नहीं उतर रहा है। झामुमो और कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं ने अनौपचारिक रूप से इसे अव्यावहारिक करार दिया है। उनका साफ कहना है कि राज्यसभा चुनाव जैसे अहम मौकों पर भावनाएं नहीं, बल्कि विधायकों का संख्या बल काम आता है। जिसके पास संख्या बल है, दावेदारी उसी की बनती है। भाजपा में भी हलचल तेज, प्रदेश अध्यक्ष दिल्ली तलब इधर, भाजपा भी अपनी रणनीति तैयार करने में जुट गई है। भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष आदित्य साहू को आलाकमान ने दिल्ली बुलाया है। वे 1 जून को दिल्ली रवाना होंगे, जहाँ 1-2 जून को पार्टी के शीर्ष नेताओं के साथ प्रत्याशी के नाम पर मंथन होगा। माना जा रहा है कि इस बैठक के बाद भाजपा अपने प्रत्याशी की घोषणा कर देगी। विधानसभा में वर्तमान दलगत स्थिति (कुल सीटें: 81) पूरा गणित ऐसे समझें: जीत का फॉर्मूला: एक राज्यसभा सीट जीतने के लिए प्रथम वरीयता के 28 विधायकों के वोट की जरूरत है। महागठबंधन के पास कुल 56 विधायक हैं ($28 times 2 = 56$), यानी दोनों सीटें जीतने का एकदम सटीक और पर्याप्त आंकड़ा सत्ता पक्ष के पास है। विपक्ष की स्थिति: विपक्ष (NDA) के पास कुल 24 वोट हैं। उन्हें एक सीट जीतने के लिए भी बहुमत के आंकड़े (28) से 4 वोट कम पड़ रहे हैं। तो क्या माले बिगाड़ सकती है खेल? भाकपा-माले के वर्तमान में दो विधायक हैं—विनोद सिंह (बगोदर) और अरूप चटर्जी (निरसा)। भले ही माले के पास सिर्फ 2 विधायक हैं, लेकिन अगर सीट न मिलने पर उन्होंने वोटिंग से दूरी बनाई, तो महागठबंधन का कुल आंकड़ा घटकर 54 रह जाएगा। ऐसी स्थिति में दूसरी सीट पर महागठबंधन के प्रत्याशी की राह मुश्किल हो सकती है और उन्हें क्रॉस वोटिंग या दूसरी वरीयता के वोटों पर निर्भर रहना पड़ सकता है।


