Hezbollah pushes Israeli forces back why ground attack in Lebanon more difficult than in 2006 हिजबुल्लाह ने खदेड़ दिए इजरायली सैनिक, क्यों 2006 से भी ज्यादा मुश्किल है लेबनान में जमीनी हमला?, International Hindi News

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लेबनान और इजरायल के बीच तनाव का एक लंबा इतिहास रहा है, और हाल के घटनाक्रम इस तनाव को और गहराते नजर आ रहे हैं। इजरायल की सेना ने दक्षिणी लेबनान में ज़मीनी हमला शुरू किया है, जिससे हिजबुल्लाह के साथ टकराव तेज हो गया है। इजरायल ने इसे “सीमित, स्थानीय और लक्षित” ऑपरेशन करार दिया है, लेकिन क्षेत्रीय विशेषज्ञों का मानना है कि यह संभवतः एक लंबे संघर्ष की शुरुआत हो सकती है। हिजबुल्लाह ने कहा है कि उसके लड़ाकों ने आज ओदाइसा और यारून में इजरायली सैनिकों को पीछे हटने और नुकसान पहुंचाने में सफलता हासिल की है। इजरायल ने भी माना है कि उसके 8 जवान शहीद हो गए। कुछ अन्य मीडिया रिपोर्टों में भी दावा किया गया है कि हिजबुल्लाह अब बहुत आत्मविश्वास से भरा हुआ है क्योंकि उसने इजरायली सैनिकों को पीछे धकेलने में कामयाबी पाई है। वे इसे एक रणनीतिक जीत के रूप में देख रहे हैं। आज हम 2006 के युद्ध और वर्तमान स्थिति के संदर्भ में समझेंगे कि क्यों इजरायल के लिए यह हमला आसान नहीं होगा।

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2006 का युद्ध: असफलता या सबक?

2006 के इजरायल-लेबनान युद्ध को ऑपरेशन “चेंज ऑफ डाइरेक्शन” के नाम से जाना जाता है। यह इजरायल के लिए एक बड़ी चुनौती साबित हुआ। यह युद्ध 34 दिनों तक चला, जिसमें 121 इजरायली सैनिकों की मौत हुई और 20 से अधिक टैंकों को हिज़बुल्लाह ने नष्ट कर दिया। इजरायली सैनिकों को लेबनानी सीमा पर हिज़बुल्लाह की सुनियोजित घातक रणनीतियों का सामना करना पड़ा।

इस युद्ध के परिणामों का मूल्यांकन करने के लिए इजरायल की सरकार ने विनोग्राड आयोग गठित किया था। आयोग ने इसे एक असफलता के रूप में करार दिया। आयोग ने निष्कर्ष निकाला कि “इजरायल ने एक लंबा युद्ध शुरू किया, जो बिना किसी स्पष्ट सैन्य विजय के समाप्त हुआ।” इजरायली सेना, विशेषकर उसके उच्च कमान और जमीनी बलों को इस युद्ध के दौरान प्रभावी सैन्य प्रतिक्रिया देने में विफल बताया गया था।

हिजबुल्लाह: एक मजबूत और सुनियोजित विरोधी

हिज़बुल्लाह को क्षेत्र का सबसे ताकतवर गैर-देशी सैन्य समूह माना जाता है। इजरायल के लिए लेबनान में जमीनी हमले की सबसे बड़ी चुनौती हिज़बुल्लाह की ताकत, उसकी गुरिल्ला युद्धनीति और इलाके की बेहतर जानकारी है। 2006 के युद्ध में हिज़बुल्लाह ने अपने अचूक रॉकेट हमलों और घातक रणनीतियों से इजरायली सेना को गहरा नुकसान पहुंचाया था।

हिज़बुल्लाह की रणनीति केवल रक्षात्मक नहीं रही; उसने हमलों की भी योजना बनाई, जो इजरायल की सेना के लिए अचंभित कर देने वाले साबित हुए। इसके अलावा, हिज़बुल्लाह के पास आधुनिक हथियारों का एक बड़ा भंडार है, जिनमें रॉकेट, मिसाइल और टैंक रोधी हथियार शामिल हैं।

2006 का युद्ध क्यों हुआ था?

2006 के इजरायल-लेबनान युद्ध को “जुलाई युद्ध” के नाम से भी जाना जाता है। यह मुख्य रूप से इजरायल और लेबनान स्थित हिज़बुल्लाह के बीच हुआ था। इस युद्ध के कई कारण थे, जिनमें प्रमुख भूमिका क्षेत्रीय तनाव और हिज़बुल्लाह की गतिविधियों ने निभाई। युद्ध की शुरुआत 12 जुलाई 2006 को हुई, जब हिज़बुल्लाह ने इजरायल की सीमा पर एक हमला किया।

प्रमुख कारण

सैनिकों का अपहरण: युद्ध की तात्कालिक वजह हिज़बुल्लाह द्वारा इजरायली सैनिकों का अपहरण था। हिज़बुल्लाह ने सीमा पर गश्त कर रहे दो इजरायली सैनिकों को अपहृत कर लिया और कई अन्य को मार गिराया। इजरायल ने इस घटना को अपने खिलाफ एक बड़ी आक्रामक कार्रवाई माना और इसका जवाब देने के लिए सैन्य कार्रवाई शुरू कर दी।

हिजबुल्लाह की बढ़ती ताकत: 1980 और 1990 के दशक में हिज़बुल्लाह ने खुद को एक शक्तिशाली गैर-राज्य सैन्य संगठन के रूप में स्थापित कर लिया था। लेबनान के दक्षिणी भाग में इसकी मजबूत पकड़ थी, और इजरायल इसे एक प्रमुख खतरे के रूप में देखता था। हिजबुल्लाह की मिसाइल क्षमताओं और इजरायल पर लगातार होने वाले हमलों ने तनाव को बढ़ा दिया था।

इजरायल-फिलिस्तीनी संघर्ष: इजरायल और फिलिस्तीनी गुटों के बीच संघर्ष भी इस युद्ध का एक महत्वपूर्ण कारण था। हिज़बुल्लाह फिलिस्तीनियों का समर्थन करता है और गाज़ा पट्टी में हो रहे संघर्ष के कारण हिज़बुल्लाह ने इजरायल पर हमले तेज कर दिए थे।

सीमा विवाद और सुरक्षा: इजरायल और लेबनान के बीच सीमा विवाद लंबे समय से चला आ रहा था। इजरायल ने दक्षिणी लेबनान में अपनी सुरक्षा के लिए सैन्य उपस्थिति बनाई थी, जिसे हिज़बुल्लाह ने लगातार चुनौती दी। इजरायल के लिए यह हमला उसके उत्तर में उसकी सुरक्षा को खतरे में डालने जैसा था।

युद्ध की शुरुआत और परिणाम

इस घटना के बाद इजरायल ने हिज़बुल्लाह के खिलाफ व्यापक हवाई और जमीनी हमले शुरू कर दिए। 34 दिनों तक चले इस युद्ध में दोनों पक्षों को भारी नुकसान हुआ। इजरायल ने हिज़बुल्लाह की मिसाइल क्षमताओं को खत्म करने की कोशिश की, जबकि हिज़बुल्लाह ने इजरायल के उत्तरी हिस्सों पर रॉकेट दागे। इस युद्ध में 1,000 से अधिक लेबनानी नागरिकों की मौत हुई, जबकि इजरायल के 121 सैनिक और 40 नागरिक मारे गए। युद्ध का कोई स्पष्ट विजेता नहीं निकला और आखिरकार संयुक्त राष्ट्र के हस्तक्षेप से 14 अगस्त 2006 को युद्धविराम हुआ।

वर्तमान स्थिति: क्या यह 2006 का रिपीट है?

2024 में इजरायल ने फिर से लेबनान में प्रवेश किया है, लेकिन सवाल उठता है कि क्या यह स्थिति 2006 की तरह ही होगी? बुधवार को इजरायल ने पुष्टि की कि दक्षिणी लेबनान में हुए संघर्ष में उसके आठ सैनिक मारे गए। इजरायल के लिए यह इस साल का सबसे घातक दिन था। दूसरी तरफ, हिज़बुल्लाह ने दावा किया है कि उसने इजरायली सेना के तीन मेरकवा टैंकों को नष्ट कर दिया।

हालांकि, इस बार इजरायल ने अपने ऑपरेशन को “सीमित” और “स्थानीय” बताया है, लेकिन जमीन पर हालात कुछ और संकेत दे रहे हैं। इजरायल ने बड़ी संख्या में सैनिकों और टैंकों को लेबनान की सीमा पर तैनात किया है, जिससे अंदेशा है कि यह ऑपरेशन लंबा खिंच सकता है।

क्या इजरायल को 2006 से सबक मिला है?

2006 के युद्ध के बाद इजरायल ने अपनी सैन्य रणनीति में कई बदलाव किए हैं। इस बार इजरायल की कोशिश है कि युद्ध लंबा न खिंचे और हिज़बुल्लाह की गुरिल्ला रणनीतियों से निपटने के लिए बेहतर योजना बनाई जाए। इजरायल की खुफिया एजेंसियां हिज़बुल्लाह की गतिविधियों पर नजर रख रही हैं, ताकि इस बार वैसी गलतियों को दोहराया न जाए जो 2006 में हुई थीं।

लेकिन फिर भी, हिज़बुल्लाह के खिलाफ एक व्यापक ज़मीनी युद्ध लड़ना आसान नहीं है। हिज़बुल्लाह के पास इजरायल के रॉकेट डिफेंस सिस्टम “आयरन डोम” को भी चुनौती देने की क्षमता है, और उसके पास इजरायल के अंदर तक पहुंचने वाले रॉकेट हैं। इसके अलावा, हिज़बुल्लाह को ईरान का खुला समर्थन प्राप्त है, जो इसे लगातार वित्तीय और सैन्य मदद पहुंचा रहा है।

नतीजा क्या हो सकता है?

इस जमीनी संघर्ष के दूरगामी परिणाम हो सकते हैं। अगर इजरायल और हिज़बुल्लाह के बीच संघर्ष लंबा खिंचता है, तो यह न केवल लेबनान और इजरायल के लिए विनाशकारी होगा, बल्कि पूरे मध्य-पूर्व को अस्थिर कर सकता है। हिज़बुल्लाह की रणनीति और इजरायल की सैन्य ताकत का यह नया मुकाबला पूरी दुनिया की नजरों में है। 2006 के अनुभवों से इजरायल ने सबक लिया है, लेकिन यह देखना बाकी है कि क्या ये सबक पर्याप्त होंगे या नहीं। लेबनान की धरती एक बार फिर युद्ध के मैदान में बदल चुकी है, और इस बार परिणाम पहले से कहीं अधिक अनिश्चित हैं।

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