![]()
आयुष्मान योजना के तहत इलाज कराने वाले मरीजों को राजधानी के निजी अस्पतालों में इलाज शुरू कराने से लेकर क्लेम सेटलमेंट तक कई तरह की तकनीकी और भुगतान संबंधी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। निजी अस्पतालों का दावा है कि राजधानी के अस्पतालों का आयुष्मान मद में 50 करोड़ रुपए से अधिक बकाया है। कुछ अस्पतालों को हाल में कई महीनों की लंबित क्लेम राशि मिली है, लेकिन इसके बावजूद बड़ी रकम अब भी अटकी हुई है। अस्पताल प्रबंधकों और चिकित्सकों के अनुसार, समस्या केवल भुगतान में देरी तक सीमित नहीं है। पैकेज के तहत इलाज की अवधि, स्टेप डाउन व क्लेम की स्वीकृति के दौरान राशि में कटौती भी हो रही है। इधर, अस्पतालों का कहना है कि कई मामलों में वास्तविक इलाज खर्च तक निकलना मुश्किल हो रहा है। राजधानी रांची के निजी अस्पतालों के प्रबंधन और डॉक्टरों के मुताबिक आयुष्मान योजना में समस्या केवल भुगतान में देरी तक सीमित नहीं है, बल्कि पैकेज के तकनीकी नियम भी जमीनी हकीकत से मेल नहीं खाते हैं। इन सभी मामलों में सबसे गंभीर मामला मरीजों के क्रिटिकल केयर व वेंटिलेटर सपोर्ट से जुड़ा हुआ है। 5 दिन वेंटिलेटर पर मरीज, पर पैसा मिल रहा सिर्फ 3 दिन का निजी अस्पतालों के चिकित्सकों के अनुसार आयुष्मान की पैकेज व्यवस्था में वेंटिलेटर समेत कई श्रेणियों के मरीजों को लेकर एक बड़ी तकनीकी दिक्कत सामने आ रही है। उदाहरण देते हुए बताया कि यदि कोई मरीज 5 दिन तक वेंटिलेटर पर रहता है, तो पैकेज में शुरुआती 3 दिन तक ही वेंटिलेटर कवरेज मिल रहा है। इसके बाद पैकेज को एक स्तर नीचे यानी स्टेप डाउन कर दिया जाता है, जिससे स्वीकृत राशि कम हो जाती है। अस्पतालों का तर्क है कि मरीज की हालत के अनुसार उसे 5 दिन या उससे अधिक समय तक वेंटिलेटर पर रखना पड़ सकता है। ऐसे में वास्तविक खर्च और पैकेज से मिलने वाली राशि के बीच अंतर बढ़ जाता है। क्लेम जमा होने के बाद 3-4 माह तक इंतजार अस्पतालों के अनुसार मरीज का इलाज पूरा होने के बाद क्लेम प्रक्रिया में तीन से चार महीने तक का समय लग रहा है। हाल में राजधानी के कुछ प्रमुख निजी अस्पतालों को कई महीनों की लंबित क्लेम राशि का भुगतान हुआ है। इसके बावजूद अस्पतालों के अनुसार 50 करोड़ रुपए से अधिक की राशि अब भी बकाया है। भुगतान नहीं होने से व्यवस्था पर असर पड़ रहा है। असर : मरीजों को शुरुआती खर्च उठाना पड़ रहा मरीजों और उनके परिजनों का आरोप है कि भर्ती करने के बाद आयुष्मान योजना में रजिस्ट्रेशन और अप्रूवल की प्रक्रिया पूरी होने में दो-तीन दिन लग जाते हैं। इस दौरान मरीज के परिजनों को इलाज का शुरुआती खर्च खुद उठाना पड़ रहा है। अस्पताल प्रबंधकों का कहना है कि कई बार अप्रूवल में लगने वाला समय मरीज के परिजनों के लिए अतिरिक्त आर्थिक बोझ बन जाता है। मामले में असली तकनीकी दिक्कत कहां है पैकेज की अवधि : कुछ बीमारियों के इलाज में मरीज की वास्तविक जरूरत और पैकेज में तय अवधि के बीच अंतर होने की बात अस्पताल बता रहे हैं। स्टेप डाउन : अस्पताल में वेंटिलेटर जैसे गंभीर मामलों में निर्धारित अवधि के बाद पैकेज की श्रेणी नीचे आने से भुगतान कम होने की शिकायत है। क्लेम अप्रूवल और सेटलमेंट : इलाज के बाद क्लेम की प्रक्रिया पूरी होने और भुगतान मिलने में महीनों लगने की बात अस्पताल प्रबंधन कह रहा है। वास्तविक खर्च बनाम पैकेज राशि : अस्पतालों का कहना है कि दवा, जांच, उपकरण, आईसीयू और मानव संसाधन पर होने वाला वास्तविक खर्च कई मामलों में पैकेज से मिलने वाली राशि से अधिक हो जाता है। अपर मुख्य सचिव के साथ बैठक में डॉक्टरों ने उठाया था मुद्दा इधर, आयुष्मान से जुड़ी इन समस्याओं को लेकर बीते दिनों डॉक्टरों और स्वास्थ्य विभाग के अपर मुख्य सचिव अजय कुमार सिंह के बीच हुई बैठक में भी चर्चा हुई थी। बैठक में आयुष्मान भारत प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना के तहत लागू टू-टियर व्यवस्था से संबंधित विषयों पर विचार-विमर्श किया गया। संबंधित मुद्दों के समाधान के लिए आगे भी चर्चा जारी रखने पर सहमति बनी थी। क्लेम की जांच कर भुगतान कराया जाएगा
आयुष्मान क्लेम का भुगतान अस्पतालों को नियमित रूप से किया जा रहा है। जिन अस्पतालों के क्लेम लंबित होंगे उनकी प्रक्रिया भी चल रही है, जल्द से जल्द अस्पतालों के सभी क्लेम की जांच कर उनका भुगतान कराया जाएगा। – अजय कुमार सिंह, अपर मुख्य सचिव, स्वास्थ्य विभाग
अस्पतालों में आयुष्मान का 50 करोड़ अटका:क्लेम में कटौती से इलाज पर असर, 5 दिन वेंटिलेटर पर मरीज; पैसा मिल रहा 3 दिन का
