शिक्षा चुनाव का एजेंड़ा होना चाहिए। देश और समाज के लिए जरूरी है कि इसे सभी राजनीतिक दल अपने घोषणा पत्र में जगह दें। राजधानी समेत देश के कोने-कोने से आए शिक्षाविदों ने शनिवार को इसकी मांग उठाई…
शिक्षा चुनाव का एजेंड़ा होना चाहिए। देश और समाज के लिए जरूरी है कि इसे सभी राजनीतिक दल अपने घोषणा पत्र में जगह दें। राजधानी समेत देश के कोने-कोने से आए शिक्षाविदों ने शनिवार को इसकी मांग उठाई है। मौका था, आओ राजनीति करें कार्यक्रम के तहत हिन्दुस्तान और एजुकेशन प्रमोशन सोसाइटी ऑफ इंडिया (ईपीएसआई) की ओर से ‘मेरा वोट दिलाएगा बेहतर शिक्षा व्यवस्था’ पर परिसंवाद के आयोजन का। प्रदेश के उप मुख्यमंत्री डॉ. दिनेश शर्मा कार्यक्रम के मुख्य अतिथि रहे।मुख्य अतिथि डॉ. दिनेश शर्मा, हिन्दुस्तान लखनऊ के कार्यकारी सम्पादक कृष्ण कांत उपाध्याय, रीजनल रेवेन्यू हेड अंशुमान साह, ईपीएसआई के ऑल्टर्नेट प्रेसिडेंट डॉ. एच चतुर्वेदी, भारतीय प्रबंध संस्थान (आईआईएम) लखनऊ के कार्यकारी निदेशक प्रो. बीके मोहंती, डॉ.बीआर आम्बेडर विश्वविद्यालय आगरा के पूर्व कुलपति डॉ. जीसी सक्सेना ने दीप प्रज्वलित कर कार्यक्रम की शुरुआत की।
हिन्दुस्तान के कार्यकारी सम्पादक श्री उपाध्याय ने अतिथियों का स्वागत करते हुए सरकारी स्कूली शिक्षा के मौजूदा हालातों को बयां किया। रीजनल रेवेन्यू हेड अंशुमान साह ने शिक्षा को बेहतर दिशा देने के लिए ठोस कदम उठाए जाने पर जोर दिया। डॉ. एच चतुर्वेदी ने शिक्षा के मौजूदा हालातों के साथ उनके सुधार के लिए पांच सूत्री कार्यक्रम भी रखा। वहीं, मुख्य अतिथि डॉ. दिनेश शर्मा ने प्रदेश में शिक्षा के सकारात्मक दिशा में हो रहे सुधार कार्यक्रम पर प्रकाश डाला। आईआईएम लखनऊ के कार्यकारी निदेशक प्रो. बीके मोहंती ने शिक्षा में पैसे और अंग्रेजी भाषा के बजाए काबिलियत पर जोर देने की बात कही। जयपुरिया इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट की प्रिंसिपल डॉ. कविता पाठक ने क्षमताओं में विकास और शिक्षा में लैंगिक भेदभाव को खत्म करने की वकालत की।
तकनीकी शिक्षा को ओर घट रहा रुझान
प्राइवेट कॉलेज एसोसिशएन के डॉ. अतुल कुमार जैन ने तकनीकी शिक्षा में सामने आ रहे परेशानियों पर रोशनी डाली। कहा कि रोजगार के अवसर न मिलने के चलते छात्रों को रुझान गिरा है। कोलकाता के टेक्नो इंडिया ग्रुप के अरिंदम डे ने शिक्षकों की गुणवत्ता पर सवाल उठाए। डॉ. राम मनोहर लोहिया अवध विश्वविद्यालय फैजाबाद और डॉ. बीआर आम्बेडकर विश्वविद्यालय आगरा के पूर्व कुलपति डॉ. जीसी सक्सेना ने चुनावी मुद्दों पर सवाल खड़े किए। कहा कि जाति, धर्म, विकास, रोजगार मुद्दा बनता है लेकिन, राजनीतिक दल शिक्षा को मुद्दा नहीं बना रहे। जिसका नतीजा है कि देश की स्थिति बिगड़ रहा है।
तीन साल देश में काम करें आईआईटी-आईआईएम के छात्र
ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती उर्दू, अरबी-फारसी विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. माहरूख मिर्जा ने आईआईएम और आईआईटी जैसे संस्थानों से निकलने वाले छात्र-छात्राओं के लिए पहले तीन साल देश में काम करने की शर्त रखे जाने की वकालत की। ईपीएसआई के ऑल्टर्नेट प्रेसिडेंट डॉ. एच चतुर्वेदी ने विभिन्न राजनीतिक दलों से सम्पर्क कर शिक्षा को चुनावी एजेंड़ा बनाने की रणनीति को साझा किया। आईपीएसआई के एक्जीक्यूटिव सेक्रेटरी पी. पलनिवेल ने धन्यावाद ज्ञापित किया।
डॉ.दिनेश शर्मा को पुस्तक की गई भेंट
उप मुख्यमंत्री डॉ. दिनेश शर्मा को इस अवसर पर पुस्तक भेंट की गई। ‘क्वालिटी, अक्रेडटैशन एंड रैकिंग ’ पुस्तक का संपादन डॉ. एच चतुर्वेदी ने किया है। इसमें, देश की मौजूदा उच्च शिक्षा पर किए गए मंथन को संकलित किया गया है। उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू ने कुछ दिन पहले ही इस पुस्तक का विमोचन किया है।
आम चुनाव-2019 में शिक्षा भी बनें मुद्दा : डॉ. चतुर्वेदी
ईपीएसआई के ऑल्टर्नट प्रेसिडेंट डॉ. एच चतुर्वेदी ने आम चुनाव-2019 में शिक्षा को अहम मुद्दा बनाए जाने की वकालत की। कहा कि छात्रसंख्या के मामले में सिर्फ चीन भारत को टक्कर दे रहा है। 29 करोड़ बच्चे शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं। जिसमें, 4 करोड़ उच्च शिक्षा में हैं। शिक्षकों की संख्या करीब एक करोड़ के आसपास है। जिसमें, 15 लाख के आसपास उच्च शिक्षा में हैं। शिक्षा के निजी हाथों में आने के बाद चुनौती और भी बढ़ी है। अब सबके लिए अवसर उपलब्ध हैं। अब चुनौती है कि इसे विश्व स्तर पर अलग पहचान दिलाई जाए। इसके लिए जरूरी है कि शिक्षा आमचुनाव में मुद्दा बने। डॉ. चतुर्वेदी ने पांच सूत्री मांगों के बारे में मुख्य अतिथि डॉ. दिनेश शर्मा और अन्य मेहमानों को जानकारी दी।
यह पांच सूत्री मांग घोषणा पत्र में हो शामिल
1. शिक्षा पर होने वाला खर्च बढ़ाया जाए : सरकार द्वारा शिक्षा के क्षेत्र को दिया जाने वाला बजट काफी कम है। वर्ष 1966 में कोठारी कमीशन ने जीडीपी का 6 प्रतिशत शिक्षा को दिए जाने की वकालत की थी। डॉ. हरिवंश चतुर्वेदी ने बताया कि अभी तक सरकार इसे लागू नहीं कर पाए है। पिछले कुछ वर्षों के दौरान यह 3.5 प्रतिशत रहा है। जिसमें,उच्च शिक्षा के लिए सिर्फ 1.6 प्रतिशत है। मांग है कि वर्ष 2022 तक इसे 6 प्रतिशत तक लाया जाना चाहिए।
2. नि:शुल्क स्कूली शिक्षा : स्कूली शिक्षा में गुणवत्ता बढ़ाने की जरूरी है। इसके साथ ही, कक्षा 12 तक सभी बच्चों को निशुल्क शिक्षा देने की व्यवस्था की जाए। जो बच्चे प्राइवेट स्कूलों में पढ़ रहे हैं उनका खर्च भी सरकार उठाए।
3. वर्ष 2030 तक सभी को निशुल्क उच्च शिक्षा : वर्तमान में उच्च शिक्षा की स्थिति अच्छी नहीं है। 18 से 23 वर्ष आर्य के सिर्फ 25.4 प्रतिशत छात्र-छात्राएं ही उच्च शिक्षा की ओर जा रहे हैं। जबकि, चीन में यह करीब 47 प्रतिशत है। वर्ष 2022 तक इस प्रतिशत को चीन से आगे बढ़ाया जाए। वर्ष 2030 तक निशुल्क उच्च शिक्षा प्रदान किए जाने की व्यवस्था की जाए।
4. सस्ते शिक्षा ऋण व छात्रवृत्ति : बड़ी संख्या में युवा शिक्षा ऋण लेकर पढ़ाई करते हैं। इसकी ब्याज दर 10 से 12 प्रतिशत तक होती है। मांग है कि इसे घटाकर 5 प्रतिशत किया जाए। वापसी की समयसीमा को 7 वर्ष से बढ़ाकर 15 वर्ष तक किया जाना चाहिए।
5. नई शिक्षा नीति : देश के लिए नई शिक्षा नीति तैयार की जाए। जिसमें, शिक्षा की मौजूदा सभी समस्याओं और चुनौतियों का हल दिया जाए। जरूरी है कि नई नीति तैयार करने के साथ ही उसे तत्काल प्रभाव से लागू किया जाए। डॉ. एच चतुर्वेदी ने बताया कि वर्ष 1986 में शिक्षा नीति तैयार की गई है। जिसे छह वर्ष बाद 1992 में लागू किया जा सका। इस तरह की देरी न हो।
अंग्रेजी बोलने वाले जरूरी नहीं काबिल हो : प्रो. मोहंती
आईआईएम लखनऊ के कार्यकारी निदेशक प्रो. बीके मोहंती ने देश में काबिलियत को पहचान न मिलने को लेकर आपत्ति जताई। प्रो. मोहंती ने देश की मौजूदा आर्थिक स्थिति पर चिंता जताई। कहा कि उड़ीसा और उत्तर प्रदेश में कई ऐसी जगह हैं जहां बच्चों को एक वक्त के खाने के लिए बेचा जा रहा है। ऐसे में स्थितियां काफी खराब है।
अंग्रेजी और पैसे का आरक्षण : प्रो. मोहंती ने कहा कि देश के बड़े संस्थानों में एक अलग तरह का आरक्षण काम कर रहा है। पहला आरक्षण अंग्रेजी बोलने वालों के लिए है। अंग्रेजी सिर्फ एक भाषा है। लेकिन, अब इसे काबिलियत से जोड़कर देखा जाता है। अंग्रेजी आती है तो काबिल मान लिया जाता है। दूसरा आरक्षण पैसे वालों के लिए है। उन्होंने उड़ीसा के एक युवक की कहानी बयां की। जिसने, तृतीय श्रेणी से एमए गणित की पढ़ाई की। अपने देश में उसे चपरासी के बराबर नौकरी मिले। लेकिन, ऑक्सफोर्ड के एक प्रोफेसर ने उसकी काबिलियत को पहचान कर उसे शोध का मौका दिया। बाद में वह आईआईटी कानपुर में प्रोफेसर बने।
क्षमताओं को विकसित करना जरूरी : कविता पाठक
जयपुरिया इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट की प्रिंसिपल डॉ. कविता पाठक ने क्षमता के विकास पर जोर दिया। कहा कि संसाधन हैं इन्हें उन्हें ठीक से इस्तेमाल करने की जरूरी है। उन्होंने शिक्षकों के लिए एक सुरक्षित माहौल तैयार करने की वकालत की। कहा कि दुनिया के दूसरे देशों में व्यवस्था है। जहां, एक शिक्षक को निर्धारित मानक पूरे करने पर आगे बढ़ने का मौका मिलता है। लेकिन, भारत की स्थिति अलग है। यहां जान पहचान से लेकर संबंधों पर लोग आगे बढ़ते हैं। उन्होंने शिक्षा के क्षेत्र में लैंगिक समानता पर भी जोर दिया।
पिस्तौल रखकर होती थी नकल, तोड़ी माफिया की कमर : डॉ. दिनेश शर्मा
डॉ़. दिनेश शर्मा ने कहा कि माध्यमिक विभाग संभाला तो देख कर हैरान रह गया। यूपी बोर्ड में नकल माफिया का कब्जा हुआ करता था। परीक्षा केन्द्र बिकते थे। चाकू, पिस्तौल टेबल पर रखकर नकल कराई जाती थी। यूपी बोर्ड की साख अंतरराष्ट्रीय स्तर पर काफी गिरी गई थी। नकल माफिया की जड़ें यहां काफी गहरी थी। खराब लगा जब प्रधानमंत्री ने कहा था कि यहां नकल के टेंडर होते हैं। कुछ जिलों में तो टैम्पो वालों को केन्द्र का पता होता था। इसे एक चुनौति के रूप में लिया। रणनीति बनाई। पुलिस एसटीई को शामिल किया। रातों रात केन्द्रों पर छापे मारे गए। नतीजा यह निकला कि माफियों की कमर टूट गई। जिस यूपी बोर्ड की परीक्षा में नकलतियों की संख्या हजारों में हुआ करती थी वहां इस बार सिर्फ 400 के आसपास पकड़े गए।
बेसिक में अमूलचूक सुधार
उपमुख्यमंत्री डॉ. दिनेश शर्मा ने शिक्षा को चुनौती घोषणा पत्र में शामिल किए जाने की बात का समर्थन किया। उन्होंने प्रदेश की शिक्षा की तस्वीर प्रस्तुत की। बताया कि बेसिक शिक्षा से लेकर उच्च शिक्षा तक में सुधार हो रहा है। बेसिक शिक्षा में स्कूल बनवाए गए हैं। बच्चों को ड्रेस, जूते, बस्ते, भोजन से लेकर हर चीज की व्यवस्था की गई है। काफी काम हुए है।
सुखी मन शिक्षक, तनावमुक्त विद्यार्थी
डॉ. शर्मा ने कहा कि माध्यमिक शिक्षा में आने के बाद एजेंडे को क्रमवार विभाजित किया। चार सूत्र बांधे। पहला था सुखी मन शिक्षक। कहा, अभी तक शिक्षक काफी परेशान रहते थे। वेतनमान, ड्यूटी से लेकर पेंशन तक के लिए बाबुओं के चक्कर लगाया करते थे। अब अगर वह इन सब चीजों में उलझेगा तो पढ़ाई प्रभावित होती। इस सभी व्यवस्थाओं में सुधार किया। गुणवत्तापरख शिक्षा देने के लिए पाठ्यक्रम में व्यापक बदलाव किए गए।
माफिया, नौकरशाह से लेकर राजनेता तक का दबाव
डॉ. शर्मा ने बदलाव की इस दिशा के अनुभव भी साझा किए। रहा कि एनसीईआरटी लागू करने का फैसला कभी आसान नहीं था। राजनेता, माफिया, नौकरशाह से लेकर प्रकाशकों तक की ओर से दबाव बनाए गए। लेकिन, अपने फैसले पर अड़े रहे। यहां मुख्यमंत्री ने समर्थम किया। कैबिनेट से फैसले पास किए गए। एनसीईआरटी उत्तर प्रदेश की किताबों सीबीएसई से भी बेहतर हैं। 20-25 साल पुराने दामों पर किताबें मिल रही हैं।
ट्रांसफर से लेकर केन्द्र निर्धारण तक ऑनलाइन
डॉ. दिनेश शर्मा ने बताया कि ट्रांसफर पोस्टिंग के लिए शिक्षक परेशान होते थे। बाबु टहलाया करते थे। इस पूरी प्रक्रिया को ऑनलाइन कर दिया। जिसके सारा खेल खत्म हो गया। अब सबकुछ घर बैठे ऑनलाइन ट्रांसफर हो रहे हैं। इसी तरह, परीक्षा केन्द्र बनाने को लेकर बड़ा खेल होता था। ऑनलाइन व्यवस्था लागू कर सबकुछ बदल दिया गया। इस बार सभी केन्द्रों पर सीसीटीवी कैमरे की चौकसी के बीच परीक्षा कराई गई। डॉ. शर्मा ने कहा कि यूपी बोर्ड के शिक्षा के स्तर पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहुंचाने का काम चल रहा है। इसमें अमूलचूक परिवर्तन हो रहे हैं।
पढ़ाई के साथ रोजगार के लिए पहल
डॉ. शर्मा ने बताया कि बच्चों को पढ़ाई के साथ रोजगार मिले, इसके लिए निजी कम्पनियों के साथ मिलकर कई पहल की गई है। हाल में एचसीएल के साथ भी प्रयास किए गए हैं। जिसमें, पढ़ाई के साथ बच्चों को काम सीखने और पैसा कमाने का मौका दिया जा रहा है। डॉ. दिनेश शर्मा ने बताया कि शिक्षा विभाग में सबसे ज्यादा केस लम्बित है। ऐसे में अधिकारी भी इस विभाग में आने से घबराते हैं। उन्होंने बताया कि उच्च शिक्षा में पीएचडी ऑर्डिनेंस, शोधपीठ, प्लेसमेंट, सितम्बर-अक्तूबर के बीच दीक्षांत समारोह, इंटरनेट सुविधा, से लेकर अन्य व्यवस्थाएं की गई हैं।

