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क्या झारखंड में टूटेगी JMM-कांग्रेस की दोस्ती:कांग्रेस ने समर्थन वापस लिया तो क्या गिरेगी हेमंत सरकार, भाजपा की वापसी की कितनी संभावनाएं


सीन वन – बिहार विधानसभा चुनाव के समय से ही खटपट शुरू हो गई थी। इस चुनाव में JMM (झारखंड मुक्ति मोर्चा) को सीट नहीं मिली। इसके लिए कांग्रेस को जिम्मेदार बताया। सीन टू – असम चुनाव में झामुमो ने कांग्रेस के आग्रह को अनसुना करते हुए 21 प्रत्याशियों को उतार दिया। सीन थ्री – जेएमएम ने कांग्रेस को विषैला सांप कहा। इसके बाद कांग्रेस ने सरकार पर हमला बोला ये तीन स्थितियां हैं, जो बता रही हैं कि झारखंड सरकार में शामिल JMM और कांग्रेस के बीच सबकुछ ठीक नहीं चल रहा है। पार्टियों की ओर से बयानबाजी बता रही है कि दोनों पार्टियों के बीच की खाई बढ़ती जा रही है। कांग्रेस जहां खनन माफिया, जिला प्रशासन और पुलिस पर गंभीर आरोप लगाते हुए अपनी ही सरकार को घेरे में ले रही है तो वहीं JMM कांग्रेस को विषैला सांप बता रही है। ऐसे में झारखंड सरकार में बदलाव को लेकर राजनीति गलियारे में चर्चा का बाजार गर्म है। कहा तो यहां तक जा रहा है कि झारखंड की सरकार में बदलाव होना तय है। हाल के दिनों में प्रदेश की राजनीति में जिस तरह के हालात बने हैं…ऐसे में यह जानना जरूरी है कि क्या हेमंत सरकार बदलने वाली है। भास्कर एक्सप्लेनर में 3 अहम सवालों के जवाब… सवाल-1: क्या सरकार से कांग्रेस अलग होने वाली है? सवाल-2 : अगर कांग्रेस सरकार से अलग होती है तो इसका क्या असर होगा? सवाल-3 : नई सरकार को लेकर विकल्प क्या बनते हैं? सबसे पहले जानिए कांग्रेस ने क्या कहा पार्टी के प्रदेश प्रभारी के. राजू ने कहा कि राज्य में खनन माफिया मजबूत है। राज्य सरकार इनके दबाव में काम कर रही है। जिलों के डीसी इस लॉबी का सहयोग कर रहे हैं। अधिकारियों और खनन कंपनियों के ​बीच मिलीभगत है। भूस्वामियों को भूमि अधिग्रहण अधिनियम 2013 के तहत पर्याप्त मुआवजा नहीं मिल रहा है। प्रभारी ने मंगलवार को मीडिया से बातचीत करते हुए कहा कि जिलों के डीसी खनन माफिया के प्रभाव में विस्थापित भूस्वामियों के अधिकारों का हनन कर रहे हैं। खनन माफिया के प्रभाव में लोगों का शोषण हो रहा है। हमारी पार्टी के एक नेता का घर बिना उचित मुआवजा दिए ध्वस्त कर दिया गया। राजू ने सीधे मुख्यमंत्री का नाम नहीं लिया, लेकिन उनके शिक्षा विभाग और खान विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाया। साथ ही पुलिस की निष्क्रियता पर भी सवाल खड़े किए। राजू ने कहा-हम खनन कंपनियों के खिलाफ विरोध प्रदर्शन करेंगे। यह विरोध जिला प्रशासन के खिलाफ भी होगा। कांग्रेस कार्यकर्ता सभी जिलों में लोगों से मिलेंगे। उनकी समस्याओं को उठाएंगे। उनके अधिकारों की रक्षा करेंगे। सरकार से अलग होने की स्थिति में नहीं कांग्रेस पार्टी की ओर से की जा रही बयानबाजी से ऐसा लग रहा है कि कांग्रेस सरकार से खुद को अलग करने पर विचार कर सकती है। लेकिन इस बात की पुख्ता स्थिति बनती नहीं दिख रही है। कांग्रेस का सरकार से अलग होने की बात को लेकर सीनियर जर्नलिस्ट शंभूनाथ चौधरी कहते हैं कि कांग्रेस ऐसा नहीं कर सकती है। कांग्रेस के पास विकल्प ही नहीं है। पार्टी को भी यह पता है कि सरकार से खुद को अलग कर नुकसान ही करा लेना है। जहां तक रही बात बयानबाजी की तो इसे नाराजगी जाहिर करना ही माना जाना चाहिए। असम चुनाव के परिणाम जेएमएम के लिए चाहें जो भी हो पर वर्तमान परस्थितियों में कांग्रेस को दर्द तो हो रहा है। टी-ट्राइब को लेकर कांग्रेस असम में जिस तरह के काम करने के दावे करती रही है, उसका नुकसान जेएमएम के चुनाव लड़ने से पार्टी को हो रहा है। कांग्रेस इसलिए भी अभी इस तरह की बयानबाजी कर रही है। कांग्रेस अलग हो जाए तो भी सरकार पर असर नहीं झारखंड विधानसभा में कुल 81 सीटें हैं। यानी बहुमत के लिए चाहिए 41 सीट। महागठबंधन के पास अभी 56 सीट है। इनमें कांग्रेस की 16 सीट शामिल है। कांग्रेस सरकार के खिलाफ बयानबाजी तो कर रही है, लेकिन सरकार से अलग होने की उम्मीद नहीं है। अगर अलग हो भी गई तो सरकार की सेहत पर कुछ ज्यादा असर नहीं होगा। क्योंकि इसके अलग होने से भी गठबंधन के पास 39 सीटें रहेंगी। इनमें झामुमो के 34, राजद के चार और माले की 2 सीट शामिल है। फिर बहुमत के लिए सरकार को महज एक विधायकों की जरूरत होगी। छोटे-मोटे दलों से एक विधायकों को लाना ज्यादा मुश्किल नहीं होगा। इसलिए कांग्रेस के हटने से भी असर नहीं पड़ेगा। बात करें एक विधायकों के विकल्प की तो लोजपा, जदयू, आजसू और झारखंड लोकतांत्रिक क्रांतिकारी मोर्चा पार्टी के एक-एक विधायक हैं। इसमें झारखंड लोकतांत्रिक क्रांतिकारी मोर्चा और जदयू के विधायक हाल के दिनों में हेमंत सोरेन/जेएमएम को लेकर सॉफ्ट हुए हैं। राज्यसभा चुनाव पर विवाद का पड़ सकता है असर इस खटपट का सीधा असर राज्यसभा चुनाव पर पड़ने की आशंका है। अभी गठबंधन दोनों सीटें आसानी से जीतने की स्थिति में है लेकिन अगर गठबंधन की दरार चौड़ी हुई तो इसका असर पड़ेगा। एक सीट के लिए 28 वोट चाहिए। झामुमो के पास 34 और गठबंधन के पास 56 सीटें हैं। वहीं अगर कांग्रेस की बात करें तो उसके पास महज 16 विधायक हैं। ऐसे में झामुमो एक सीट आसानी से निकाल सकता है। दूसरी सीट फंसेगी। क्योंकि इसके लिए झामुमो, कांग्रेस या भाजपा, किसी भी दल के पास पर्याप्त संख्या बल नहीं है। कांग्रेस में टूट की स्थिति नहीं राजनीतिक गहमागहमी के बीच कई बार कांग्रेस में टूट की बात भी आती रही है। इस पर सीनियर जर्नलिस्ट श्याम किशोर चौबे कहते हैं कि ऐसा नहीं लग रहा है। वो इसके पीछे वजह भी गिनाते हैं। वह कहते हैं कि जेएमएम पार्टी के विधायकों को लाती तो दल-बदल कानून से बचने के लिए दो तिहाई नहीं बल्कि लगभग आधी पार्टी को लाना होगा। यह आंकड़ा 10-12 का होता है। इतनी बड़ी संख्या में विधायकों को तोड़ना न तो आसान होगा और न ही ऐसी मजबूरी भी नहीं बन रही है कि जेएमएम ऐसा कुछ करे। दूसरी बात यह भी है कि जब पार्टी के विधायक आएंगे तो वे अपनी शर्तें भी रखेंगे। मंत्रीपद भी मांग सकते हैं। ऐसे में हेमंत सोरेन जानबूझ कर अपने लिए परेशानी की वजह क्रिएट नहीं ही करेंगे। अब पढ़िए कांग्रेस की बयानबाजी के बाद दो बड़ी प्रतिक्रिया झामुमो ने कहा… तल्खी इतनी न बढ़े कि बाद में अफसोस हो कांग्रेस के बयान पर झामुमो के केंद्रीय प्रवक्ता मनोज पांडेय ने कहा कि हम एक-दूसरे के दुश्मन नहीं है। जनता ने गठबंधन को जो जनादेश दिया है, उसका सम्मान करते हुए झामुमो सरकार चला रहा है। चुनावी मौसम में तल्खी आ जाती है। मगर यह तल्खी इतनी न बढ़ जाए कि बाद में अफसोस हो। झामुमो ने हमेशा गठबंधन धर्म निभाया है। गठबंधन धर्म निभाते हुए बिहार में भी कुर्बानी दी। मगर हर बार झामुमो ही कुर्बानी दे, यह उचित नहीं है। गठबंधन धर्म के पालन की अपेक्षा सभी सहयोगियों से की जाती है। बीजेपी बोली…सवाल उठा रही ‎कांग्रेस सत्ता में क्यों बैठी है भाजपा के प्रदेश प्रवक्ता प्रतुल शाहदेव ने कहा कि कांग्रेस मंत्री पदों पर शामिल होते हुए भी राज्य की कानून-व्यवस्था, शिक्षा और प्रशासन पर अपनी ही सरकार पर सवाल उठा रही है, जो उनके दोहरे चरित्र को दिखाता है। कांग्रेस के नेता के राजू और प्रदेश अध्यक्ष केशव महतो कमलेश ने पुलिस व्यवस्था को निष्क्रिय, बेटियों की सुरक्षा को खतरे में और शिक्षा व्यवस्था को कमजोर बताया। प्रतुल ने पूछा कि यदि हालात इतने खराब हैं तो कांग्रेस सत्ता में क्यों बनी हुई है। झारखंड में सरकार के अन्य विकल्प पहला, तीसरे मोर्चे का भी ऑप्शन एक परिस्थिति मान भी लिया जाए कि हेमंत सरकार गिर ही जाएगी तो तीसरे मोर्चे की बात भी सामने आ चुकी है। पहली बार के डुमरी के विधायक जयराम महतो इस ऑप्शन की बात कह चुके हैं। मीडिया को दिए अपने साक्षात्कार में उन्होंने इस बात का जिक्र किया है। उन्होंने बदलाव के दावे भी किए हैं। उनका कहना है कि तत्काल तो नहीं, लेकिन संभवत: राज्यसभा चुनाव के बाद बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है। झामुमो के पास अपने 34 विधायक हैं। राजद और भाकपा माले के छह विधायक को मिलाकर 40 की संख्या हो जाएगी। इसके अलावा लोजपा, जदयू आदि के विधायक हैं तो झारखंड में गैर कांग्रेस, गैर भाजपा सरकार बन सकती है। हालांकि उन्होंने यह भी जोड़ा इस तरह की सरकार में उन्हें ऑफर आया तो वे विचार करेंगे। दूसरा, भाजपा के पास विकल्प पर आंकड़े जुटाना मुश्किल सरकार की विषम परिस्थिति में एनडीए सरकार के विकल्प को देखें तो इनकी राख आसान नहीं लगती। वर्तमान में विधानसभा में एनडीए के पास आंकड़ा महज 24 सीटों का है। एनडीए की मुखिया पार्टी भाजपा के पास 21 विधायक हैं। इनके साथ ही पार्टी आजसू, जदयू और लोजपा के एक-एक विधायक हैं। इस तरह से देखें तो भाजपा गठबंधन ने 24 सीटों पर जीत दर्ज की है यानी बहुमत के आंकड़े से 13 सीट कम। ऐसे में 13 विधायकों का जुगाड़ आसान नहीं लगता।

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