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गवाह नहीं हो रहे हाजिर:घूसखोरी के 47 प्रतिशत केस गवाही न होने से लंबित


भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो ने 5 साल में घूस लेते 220 से अधिक अधिकारियों-कर्मचारियों को पकड़ा, इनमें 35 मामलों का ही निष्पादन नतीजा… मामला लंबा खिंचने का लाभ उठाकर दोबारा अपने पदों पर लौट रहे दागी
झारखंड में भ्रष्टाचार के खिलाफ अभियान चलाने वाले भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (एसीबी) की धर-पकड़ की कार्रवाई कोर्ट पहुंचकर दम तोड़ रही है। पिछले पांच साल में एसीबी ने विभिन्न सरकारी विभागों में जाल बिछाकर 220 से अधिक अधिकारियों और कर्मचारियों को घूस लेते रंगे हाथ गिरफ्तार किया। लेकिन इनमें से 47.27% यानी 104 मामले सिर्फ गवाही के स्तर पर अटके हुए हैं। इन मामलों में एसीबी गवाहों को कोर्ट में पेश ही नहीं कर सकी। वहीं 3.63% यानी आठ गंभीर मामलों में अभियोजन की स्वीकृति ही नहीं मिली। नतीजा यह है कि मामला लंबा खिंचने का लाभ उठाकर ऐसे दागी अधिकारी और कर्मचारी दोबारा अपने पदों पर लौट रहे हैं। 2 केस स्टडी से समझिए…गवाह न आने से क्या हो रहा असर
1. चार्ज फ्रेम होने के बाद कोर्ट पहुंच नहीं रहे एक भी गवाह
गुमला के जिला शिक्षा पदाधिकारी सुनील शेखर कुजूर व कंप्यूटर ऑपरेटर अनूप किंडो को एसीबी रांची ने 17 जनवरी 2024 को (केस नंबर 03/2024 में) एक लाख रुपए घूस लेते गिरफ्तार किया था। चार्ज फ्रेम होने के बाद मामला गवाही के चरण में पहुंचा। पर गवाह कोर्ट पहुंच ही नहीं रहे हैं। 2 जुलाई 2026 को हुई सुनवाई में कोर्ट ने सरकारी वकील को निर्देश दिया है कि वे अगली तारीख 29 जुलाई को हर हाल में बचे हुए गवाहों को प्रस्तुत करें। 2. आज होगी सुनवाई, कोर्ट ने कहा-गवाहों को समन भेजें
खूंटी सदर थाने के एसआई श्रीकांत को 9 जनवरी 2024 को एसीबी ने 10 हजार रुपए घूस लेते (केस नंबर 02/2024 में) रंगेहाथ गिरफ्तार किया था। 10 जून 2026 को कोर्ट में आरोपी की हाजिरी तो लग गई, लेकिन एसीबी का कोई गवाह गवाही देने नहीं पहुंचा। इसके बाद कोर्ट ने नाराजगी जताते हुए गवाहों को समन भेजने का आदेश दिया है। इस मामले में अगली सुनवाई 9 जुलाई 2026 को होनी है। पिछले 5 साल के आंकड़ों से समझें लंबित मामलों का पूरा गणित…
एसीबी (ACB) के लंबित और निष्पादित मामलों का विवरण पुलिस गवाहों का तबादला और स्वतंत्र गवाहों का मैनेज होना सबसे बड़ी बाधा
जो पुलिस वाले या विभागीय गवाह हैं, अमूमन उनकी अलग-अलग जिलों या विंग में तबादला हो जाता है। सुदूर इलाकों में पोस्टिंग होने के कारण वे समय पर समन प्राप्त नहीं कर पाते या अदालती तारीख पर उपस्थित नहीं हो पाते। वहीं, दूसरी तरफ जो इंडिपेंडेंट गवाह होते हैं, वे आम तौर पर आम नागरिक या छोटे कर्मचारी होते हैं। जब केस सालों-साल खिंचता है तो वे बार-बार कोर्ट जाने की जहमत नहीं उठाना चाहते। कई मामलों में आरोपी पक्ष द्वारा इन स्वतंत्र गवाहों को डरा-धमका कर या प्रलोभन देकर ‘मैनेज’ कर लिया जाता है, जिससे वे कोर्ट में मुकर जाते हैं।- अजीत कुमार, पूर्व महाधिवक्ता, झारखंड

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