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गिरिडीह के गांडेय में दस्तकार संस्थान जूट उत्पाद बनाकर महिलाओं को रोजगार दे रहा है। करीब 15 महिलाएं यहां काम कर परिवार की आर्थिक स्थिति मजबूत कर रही हैं। यह पहल सिंगल यूज प्लास्टिक के विकल्प को भी बढ़ावा देती है। महिलाएं सुबह 10 से शाम चार बजे तक काम कर प्रतिमाह पांच से आठ हजार रुपए कमाती हैं। संस्थान में जूट से वाटर बोतल थैला, लेडीज पर्स, शॉपिंग बैग, सब्जी थैला, डिजाइनर वॉल हैंगिंग, फाइल फोल्डर, द्वार तोरण, टिफिन बॉक्स, पैकिंग थैला और चूड़ी बॉक्स सहित 15-17 तरह के उत्पाद बनते हैं। इनकी कीमत 80 से 250 रुपए प्रति पीस है। सालाना 15-20 लाख रुपए कारोबार की उम्मीद
संस्थान संचालक शशांक शेखर बताते हैं सिंगल यूज प्लास्टिक प्रदूषण के चलते यह काम शुरू किया। काम तीन मशीनों से शुरू हुआ, अब 10 हो गई हैं। लक्ष्य 100 मशीनें लगाकर ज्यादा महिलाओं को रोजगार देना है। पिछले महीने 90 हजार रुपए की बिक्री हुई; सालाना 15-20 लाख रुपए कारोबार की उम्मीद है। शशांक शेखर ने बताया कि अब जूट उत्पादों को बड़े बाजार तक पहुंचाने की तैयारी चल रही है। देवघर के बाबा बैद्यनाथ धाम में पेड़ा-प्रसाद और अन्य सामान के लिए इस्तेमाल होने वाली प्लास्टिक पैकिंग के विकल्प के रूप में जूट के थैले उपलब्ध कराने की योजना है। ब्रांड नाम से जूट उत्पाद उपलब्ध कराने की योजना
इसी तरह गिरिडीह के मधुबन जैसे धार्मिक स्थलों पर भी उत्पादों की बिक्री की तैयारी की जा रही है। इसके अलावा विभिन्न दुकानों और मॉल में संस्थान के ब्रांड नाम से जूट उत्पाद उपलब्ध कराने की योजना है। उद्देश्य झारखंड के साथ देश के अन्य हिस्सों तक पर्यावरण अनुकूल उत्पाद पहुंचाना है। प्रोजेक्ट मैनेजर पूजा ने बताया कि कई महिलाएं पहले घर पर रहती थीं, लेकिन अब उन्हें रोजगार मिला है। काम के अनुसार महिलाओं को प्रतिमाह पांच से सात हजार रुपए तक मिल रहे हैं। इससे वे घर के रोजमर्रा के खर्च और बच्चों की जरूरतों में योगदान दे रही हैं। 100 से 200 महिलाओं को रोजगार से जोड़ने का लक्ष्य
पूजा ने कहा कि भविष्य में इस काम को बड़े स्तर पर ले जाकर 100 से 200 महिलाओं को रोजगार से जोड़ने का लक्ष्य है, ताकि महिलाएं किसी पर निर्भर रहने के बजाय स्वयं आर्थिक रूप से सक्षम बन सकें। दस्तकार में काम कर रहीं आशा कुमारी और अनिता कुमारी ने बताया कि उन्हें एक जुलाई से जूट उत्पाद बनाने की ट्रेनिंग दी गई थी। कोलकाता से आए प्रशिक्षकों ने करीब 15 दिनों तक प्रशिक्षण दिया। इसके बाद 25 जुलाई से उन्होंने काम शुरू किया। पांच से आठ हजार रुपए तक की आमदनी
आशा कुमारी और अनिता कुमारी ने बताया कि यहां अलग-अलग तरह के जूट उत्पाद तैयार किए जा रहे हैं और काम के अनुसार पांच से आठ हजार रुपए तक की आमदनी हो रही है। उन्होंने कहा कि रोजगार मिलने से अब छोटी-बड़ी जरूरतों के लिए दूसरों पर निर्भर नहीं रहना पड़ता। दस्तकार की यह पहल एक ओर महिलाओं को हुनर और रोजगार से जोड़ रही है, तो दूसरी ओर प्लास्टिक के बढ़ते इस्तेमाल के बीच जूट जैसे पर्यावरण अनुकूल विकल्प को बाजार उपलब्ध कराने की दिशा में भी काम कर रही है। मशीनों की संख्या बढ़ने के साथ आने वाले दिनों में रोजगार के अवसर बढ़ने की उम्मीद है।
गिरिडीह में जूट उत्पादों से 15 महिलाओं को मिला रोजगार:तीन मशीनों से शुरू हुआ काम अब 10 पर पहुंचा, आत्मनिर्भर बन रहीं महिलाएं

