
Kishanganj Military Station: भारत-नेपाल और भारत-बांग्लादेश सीमा के रणनीतिक मुहाने पर बसे किशनगंज जिले के ठाकुरगंज में सेना के नए सैन्य स्टेशन (Military Station) की स्थापना के लिए चल रही सरकारी कवायद के बीच एक बड़ा चौंकाने वाला मामला सामने आया है. उपलब्ध आधिकारिक दस्तावेजों और रजिस्ट्री अभिलेखों की पड़ताल से एक ऐसी समानांतर समय-रेखा (Timeline) उजागर हुई है, जिसने पूरी अधिग्रहण प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. एक तरफ जहां रक्षा संपदा विभाग और जिला प्रशासन के बीच सेना के लिए 189.68 एकड़ निजी भूमि अधिग्रहित करने का आधिकारिक पत्राचार चल रहा था, वहीं दूसरी तरफ उसी मौजा में अचानक बड़े पैमाने पर जमीन की खरीद-बिक्री शुरू हो गई.
क्रोनोलॉजी समझिए: पहले सेना की फाइलें दौड़ें, फिर शुरू हुई धड़ाधड़ खरीदारी
उपलब्ध आधिकारिक अभिलेखों और पत्राचार की कड़ियों का मिलान करने पर जो संदिग्ध टाइमलाइन सामने आती है, वह इस प्रकार है:
- 1 अक्टूबर 2025: सेना के मुख्यालय (HQ-111 Area) ने ठाकुरगंज में प्रस्तावित नए सैन्य स्टेशन की स्थापना के लिए प्रशासनिक प्रक्रिया आगे बढ़ाने का पहला आधिकारिक आदेश जारी किया.
- 7 नवंबर 2025: डिफेंस एस्टेट्स ऑफिसर (DEO), सिलीगुड़ी सर्किल ने भूमि के भौतिक सत्यापन के लिए संयुक्त सर्वेक्षण (Joint Survey) कराने हेतु पत्र जारी किया.
- 21 जनवरी 2026: जिलाधिकारी (DM), किशनगंज ने प्रस्तावित सैन्य स्टेशन के लिए भूमि अधिग्रहण की दिशा में आधिकारिक पत्र जारी कर प्रशासनिक मशीनरी को सक्रिय किया.
- 10 फरवरी 2026: जिला प्रशासन की ओर से 189.68 एकड़ भूमि के विस्तृत प्लॉट शेड्यूल (Plot Schedule) को लेकर अंतिम दौर का पत्राचार संपन्न हुआ.
- 11 फरवरी 2026: प्लॉट शेड्यूल के पत्राचार के ठीक अगले ही दिन से चिन्हित मौजा ‘भेलागुड़ी’ में अचानक बड़े पैमाने पर निजी खरीदारों द्वारा जमीनों की रजिस्ट्री कराने का सिलसिला शुरू हो जाता है.
- 28 मार्च 2026: रजिस्ट्री कार्यालय में एक ही दिन में कई बड़े रकबे के विक्रय-पत्र (Sale Deeds) दर्ज किए गए. अब तक सामने आए 16 रजिस्टर्ड दस्तावेजों में कुल 70 एकड़ से अधिक की खरीद दिखाई गई है.
रजिस्ट्रियों के आंकड़े: कुछ खास चेहरों ने खरीदे बड़े रकबे
दस्तावेजों के गहन अध्ययन से यह साफ होता है कि यह कोई सामान्य या छिटपुट निवेश नहीं है. खरीदे गए 70 एकड़ 91 डिसमिल 171 वर्गकड़ी के साम्राज्य में कुछ खास पैटर्न नजर आ रहे हैं:
- पैटर्न 1: एक ही रसूखदार खरीदार ने महज कुछ ही दिनों के भीतर अलग-अलग 6 रजिस्ट्रियों के माध्यम से भारी-भगकम जमीन अपने नाम लिखवाई.
- पैटर्न 2: एक अन्य खरीदार ने केवल 2 रजिस्ट्रियों के खेल में 11 एकड़ से अधिक की कृषि भूमि का मालिकाना हक हासिल कर लिया.
- पैटर्न 3: कुछ अन्य सिंडिकेट/खरीदारों ने मिलकर 9 से लेकर 14 एकड़ तक के बड़े-बड़े भूखंडों की थोक खरीदारी की है.
बड़ा सवाल: निवेश का संयोग या मुआवजे का फेर?
इस पूरे मामले में सबसे बड़ा यक्ष प्रश्न यह नहीं है कि जमीन की खरीद-बिक्री क्यों हुई, बल्कि गंभीर सवाल इसकी टाइमिंग को लेकर है:
अधिग्रहण बनाम रजिस्ट्री का गणित:
जब सीमांचल की सुरक्षा के लिहाज से सेना के प्रोजेक्ट की फाइलें टेबल दर टेबल घूम रही थीं, तब अचानक मौजा भेलागुड़ी में जमीन मालिकों को बदलने की इतनी हड़बड़ी क्यों थी? क्या यह केवल एक सामान्य व्यापारिक निवेश था, या फिर किसी को सरकारी अधिग्रहण और उसके बदले मिलने वाले भारी-भरकम मुआवजे की अंदरूनी भनक (Inside Information) पहले ही लग चुकी थी?
Kishanganj Military Station: अंतिम खाता-खेसरा सूची के मिलान से हटेगा पर्दा
इस पूरे रहस्यमयी घटनाक्रम का असली सच तभी सामने आ पाएगा, जब जिला प्रशासन और रक्षा मंत्रालय द्वारा तैयार की गई 189.68 एकड़ की अंतिम ‘खाता-खेसरा’ की सूची को सार्वजनिक किया जाएगा.
यदि हाल ही में निष्पादित हुए इन 16 रजिस्टर्ड विक्रय-पत्रों (केवाला) के खाता-खेसरा का मिलान सेना की अंतिम अधिग्रहण सूची से किया जाता है, तो दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा. इससे यह स्पष्ट होगा कि नई खरीदी गई 70 एकड़ भूमि का कितना हिस्सा सेना के कैंप के ठीक भीतर आ रहा है और कितना बाहर.
देश की सुरक्षा से जुड़ी इस अति-महत्वपूर्ण परियोजना में जिस तरह से सरकारी फाइलें और निजी रजिस्ट्रियां समानांतर दौड़ रही हैं, उसने पूरे सीमांचल के बौद्धिक वर्ग को चौंका दिया है. अब जनता की निगाहें सक्षम जांच और जिला प्रशासन के अगले कदम पर टिकी हैं.

