Home india "पर्यावरणीय न्याय सिर्फ नीति नहीं, बल्कि संवैधानिक अनिवार्यता भी है'

"पर्यावरणीय न्याय सिर्फ नीति नहीं, बल्कि संवैधानिक अनिवार्यता भी है'

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"पर्यावरणीय न्याय सिर्फ नीति नहीं, बल्कि संवैधानिक अनिवार्यता भी है'

नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ स्टडी एंड रिसर्च इन लॉ (एनयूएसआरएल), रांची के प्लेनरी हॉल में शनिवार को चौथा न्यायमूर्ति एसबी सिन्हा स्मृति व्याख्यान का आयोजन किया गया। इस अवसर पर सर्वोच्च न्यायालय की न्यायाधीश न्यायमूर्ति बीवी नागरत्ना ने “पर्यावरणीय न्याय एवं जलवायु परिवर्तन’ विषय पर व्याख्यान दिया। उन्होंने कहा कि पर्यावरणीय क्षति का सबसे गहरा प्रहार गरीब और वंचित वर्गों पर होता है, इसलिए यह सामाजिक न्याय से सीधे जुड़ा है। इसलिए, पर्यावरणीय न्याय सिर्फ नीति नहीं, बल्कि संवैधानिक अनिवार्यता भी है। न्यायमूर्ति नागरत्ना ने आगे कहा कि न्यायालयों को भविष्योन्मुखी और संवेदनशील दृष्टिकोण अपनाना चाहिए।इससे पूर्व, कुलपति डॉ. अशोक आर. पाटिल ने न्यायमूर्ति एसबी सिन्हा के न्यायिक योगदान को याद किया। कार्यक्रम के अंत में न्यायमूर्ति एसबी सिन्हा के पुत्र अधिवक्ता इंदरजीत सिन्हा ने धन्यवाद ज्ञापन किया। विशिष्ट अतिथि और झारखंड उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति एमएस सोनक ने सचेत करते हुए कहा, इंसानी कानूनों में अपील की व्यवस्था हो सकती है, लेकिन प्रकृति के कानून में केवल परिणाम होते हैं। उन्होंने ग्लेशियरों के पिघलने और बढ़ती खाद्य असुरक्षा जैसी चुनौतियों की ओर ध्यान आकर्षित किया। विशिष्ट अतिथि के रूप में न्यायमूर्ति एसएन प्रसाद भी मौजूद रहे।

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