Monday, April 27, 2026

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पोकलेन चलाना छोड़कर कोडरमा में शुरू किया मछली पालन:अब सालाना कमा रहे 12 लाख रुपए, नेपाल तक है इनकी मछली की मांग


कोडरमा के रहने वाले राजा सहनी आज क्षेत्र में मछली पालन के लिए काफी चर्चित हो गए हैं। राजा कभी पोकलने चलाने के लिए दूसरे राज्य गए थे। पर वहां सैलरी फंस जाने के बाद वो वापस गांव लौट आए। दादा और पिताजी के मछली बेचने के कारोबार पर ध्यान दिया और फिर एक नए अंदाज में इसे शुरू करने का फैसला किया। राजा ने तिलैया डैम में केज कल्चर से मछली पालन और उसे बेचने का काम शुरू किया। रोजाना 200-300 किलो मछली बिक जाती है शुरुआत में तो उन्हें कुछ नुकसान हुआ पर अनुभव मिलने के बाद उनका यह काम चल पड़ा। आज राजा सहनी की मछली की सप्लाई नेपाल तक हो रही है। वहीं, लोकल स्तर पर उनकी दुकान से रोजाना 200-300 किलो मछली बिक जाती है। राजा सालाना करीब 12 लाख रुपए कमा रहे हैं और कुछ लोगों को अपने यहां स्टाफ के तौर पर जॉब भी दे रखी है। कोडरमा जिले का तिलैया डैम इन दिनों ताजी मछलियों के लिए प्रसिद्ध हो रहा है। यहां की मछलियों की मांग अब जिले तक सीमित न होकर दूर-दराज तक बढ़ रही है। इससे तिलैया डैम के आसपास के लोगों के लिए यह रोजगार का एक महत्वपूर्ण अवसर बन गया है। बिहार, पश्चिम बंगाल और उत्तर प्रदेश में भी हो रही सप्लाई कोडरमा-हजारीबाग सीमा पर स्थित यह डैम न केवल अपने खूबसूरत नजारों के लिए, बल्कि डैम के अंदर पाई जाने वाली विभिन्न प्रजातियों की मछलियों के लिए भी जाना जाता है। यहां से निकलने वाली करीब एक दर्जन प्रजाति की मछलियों की मांग कोडरमा के अलावा हजारीबाग, चतरा, रांची, गिरिडीह सहित झारखंड के विभिन्न जिलों के साथ-साथ बिहार, पश्चिम बंगाल और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में भी बढ़ गई है। मछली पालक और विक्रेता राजा सहनी बताते हैं कि मछलियों का यह व्यवसाय उनके दादा ने शुरू किया था। उसके बाद उनके पिताजी ने इसे आगे बढ़ाया और अब इस काम की जिम्मेदारी उन्होंने अपने कंधों पर ले ली है। जब उनके दादा ने इस रोजगार की शुरुआत की थी, तब इसमें काफी कठिनाइयां थीं और आमदनी भी बहुत कम थी। पहले डैम से बाहर लाकर बेचने में काफी समय लगता था उस समय परिवार का भरण-पोषण मुश्किल से हो पाता था। पिताजी द्वारा इसे आगे बढ़ाने के समय भी स्थिति बहुत बेहतर नहीं थी। उस दौर में जाल फेंककर मछली पकड़ने और डैम से बाहर लाकर बेचने में काफी समय लगता था और खरीदार भी सीमित थे। आज इस व्यवसाय में काफी संभावनाएं दिख रही हैं। सरकार द्वारा सब्सिडी पर डैम के अंदर फिश केज लगवाए गए हैं, जिससे मछली पालन और उन्हें पकड़ना आसान हो गया है। साथ ही, अब मोटर वाहनों की सुगम व्यवस्था होने के कारण डैम से दुकान तक मछली की ढुलाई भी सुविधाजनक हो गई है। पोकलेन चलाना छोड़ मछली पालन का बिजनेस किया शुरू
राजा सहनी ने बताया कि इंटर की पढ़ाई करने के बाद ये अपने पुस्तैनी धंधे में आने की सोचने लगे। लेकिन उस समय मछली के व्यापार में आमदनी कम होने के कारण ये अन्य रोजगार की तलाश में जुट गए। इस दौरान आज से करीब 7 वर्ष पूर्व इन्होंने पोकलेन चलाने का काम शुरू किया। कुछ ही दिन पोकलेन चलाने के बाद इन्होंने तय किया कि ये अपने पुस्तैनी धंधे को ही आगे बढ़ाएंगे। इस खयाल और एक दृढ़ संकल्प के साथ वे अपने घर लौटे और मछली-पालन के व्यपार में जुट गए। शुरुआत में इन्हें थोड़ी कठिनाई हुई लेकिन सरकार से मछली पालन के लिए डैम में फिश केज की सब्सिडी के तहत उपलब्धता ने इनके हाथों को मजबूत किया और इनका रोजगार फलने-फूलने लगा। इन्होंने बताया कि जब शादी-लगन का समय होता है, तब ये प्रतिदिन 5 से 10 क्विंटल मछली की बिक्री कर दिया करते हैं। गांव के 6 लोगों को रोजगार भी दिया
उन्होंने कहा कि एक किलो मछली पर इन्हें लागत और खर्च काटने के बाद 40 रुपए तक का मुनाफा हो जाता है। इससे इन्हें सालाना 12 से 13 लाख रुपए तक कि आमदनी हो जाती है। उन्होंने कहा कि इस व्यापार से न सिर्फ इन्हें मुनाफा होता है बल्कि इन्होंने गांव के 6 लोगों को रोजगार भी दिया है। एक दर्जन से अधिक किस्म की मछलियां हैं उपलब्ध
राजा सहनी ने बताया कि डैम में करीब एक दर्जन भी ज्यादा किस्म की मछलियां पाई जाती हैं। इसके अलग-अलग खरीदार इनके पास आते रहते हैं। इसमें प्रमुख रूप से झींगा, कतला, रेहु, तेलपनियां, टेंगरा, बुआरी, बामी और सीलन मछलियां हैं, जिसके खरीदार लगभग-प्रतिदिन यहां आते हैं। उन्होंने बताया कि इनके यहां मिलने वाले अलग-अलग मछलियां अलग-अलग रेट पर उपलब्ध हैं। तिलैया डैम की मछलियों की कीमत प्रजाति-दाम
झींगा-400 रुपए प्रति किलो
कतला-250 रुपए प्रति किलो
रेहु-250 रुपए प्रति किलो
तेलपिया-160 से 170 रुपए प्रति किलो
टेंगरा-150 रुपए प्रति किलो
बुआरी-200 रुपए प्रति किलो
बामी-250 रुपए प्रति किलो
सीलन-200 रुपए प्रति किलो नेपाल तक है यहां की मछली की मांग
राजा साहनी ने बताया कि वैसे तो इनके पास मिलने वाली सभी मछलियों की डिमांड काफी ज्यादा है, लेकिन इनके पास बिकने वाले झींगा मछली की मांग नेपाल तक है। उन्होंने कहा कि नेपाल के बीरगंज के मछली विक्रेता इनके पास से अक्सर झींगा मछली लेकर जाते हैं और वहां के बाजारों में इसकी बिक्री करते हैं। उन्होंने कहा कि नेपाल के मछली विक्रेता इन्हें बताते हैं कि यहां की झींगा मछली का स्वाद लाजवाब है। बताते चलें कि कोडरमा के तिलैया डैम के पास जामुखाडी के आसपास झींगा नामक दर्जनों होटल हैं, जहां झींगा मछली की कई वेरायटी पकाई जाती है, जिसका इस ओर से गुजरने वाले लोग भरपूर आनंद उठाते हैं। गाड़ी रोक कर खरीदते हैं मछली
मछली खाने के शौकीन मनोज सिंह ने कहा कि यहां के मछली का एक अनोखा स्वाद है। ये यहां हमेशा मछली लेने आते हैं। इनके पास अलग-अलग किस्म की मछली भी उपलब्ध हैं। तिलैया डैम से सटे जामुखाड़ी गांव, जो रांची-पटना मुख्य मार्ग के एनएच 20 से सटा हुआ है, यहां करीब आधे दर्जन से अधिक मछलियों की दुकानें हैं। यहां डैम से निकलने वाली ताजा मछलियों की बिक्री स्थानीय लोगों द्वारा की जाती है। इन दुकानों के एनएच से सटे होने के कारण इस ओर से गुजरने वाले वैसे राहगीर जो मछली खाने के शौकीन होते हैं, वे जरूर रुक जाते हैं और अपनी पसंद की मछली खरीदते हैं।

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