पूर्णिया जिले के कस्बा प्रखंड के जियनगंज, तारानगर और आसपास के गांवों में सन्नाटा पसरा हुआ है। जिन घरों से कभी रोजी-रोटी की तलाश में निकले लोगों की हंसी सुनाई देती थी, वहां अब बीमारी, चिंता और मौत की कहानियां सुनाई दे रही हैं। आंध्र प्रदेश से लौटे मजदूरों की लगातार मौतों ने पूरे इलाके को सदमे में डाल दिया है। पांच लोगों की जान जा चुकी है, जबकि कई मजदूर अब भी गंभीर बीमारी से जूझ रहे हैं। जीएमसीएच के ट्रामा सेंटर में भर्ती श्रवण का इलाज चल रहा है। अस्पताल के बाहर बैठी उसकी बहन सुषमा देवी की आंखों से आंसू थमने का नाम नहीं ले रही। भास्कर के कैमरे पर सुषमा बातों ही बातों में फूट फूट कर रो पड़ती हैं। ये दर्द सिर्फ एक परिवार का नहीं है। किसी बेटा अस्पताल में भर्ती है तो किसी का भाई ऑक्सीजन के सहारे सांस ले रहा है। पांच मौतों के बाद गांव में ऐसा माहौल है कि लोग हर फोन कॉल और खबर से डरने लगे हैं। सिलसिलेवार तरीके से जानिए क्या है पूरा मामला। पैसे की जगह बीमारी लेकर लौटे सुषमा कहती हैं कि उनका भाई बेहतर रोजगार और अच्छी कमाई की उम्मीद में आंध्र प्रदेश गया था, लेकिन पैसे की जगह बीमारी लेकर वापस लौटा। श्रवण अकेला नहीं है, गांव के करीब 30 लोग उसी तरह बीमार होकर लौटे हैं। इनमें पांच लोगों की मौत हो चुकी है, 6 हालत अब भी गंभीर बनी हुई है। जिसमें भाई श्रवण भी है। भाई के इलाज की चिंता में डूबी सुषमा बार-बार एक ही बात कहती हैं कि कमाने गया था, लेकिन पैसे की जगह बीमारी लेकर लौट आया। गांव के अधिकांश परिवार बेहद गरीब हैं। किसी के पास थोड़ी-बहुत खेती है तो कोई दिहाड़ी मजदूरी कर परिवार चलाता है। घर की आर्थिक तंगी दूर करने, बच्चों का भविष्य बेहतर बनाने और परिवार को दो वक्त की रोटी की चिंता से निकालने सभी ने सैकड़ों किलोमीटर दूर जाने का फैसला किया था। किसी ने सोचा था कि लौटने पर घर की हालत सुधरेगी, लेकिन वापस लौटे तो शरीर बीमारी से टूट चुका था। 18-18 घंटे काम कराया जाता था सुषमा रोते हुए आगे कहती हैं वहां मजदूरों से बंधुआ मजदूरों की तरह काम कराया गया। सुबह से लेकर देर रात तक 16 से 18 घंटे काम लिया जाता रहा। धूल और पाउडर से भरे प्लांट में लगातार काम करने के बावजूद सुरक्षा के कोई इंतजाम नहीं थे। मजदूरों को न तो पर्याप्त सुरक्षा उपकरण दिए गए और न ही स्वास्थ्य की चिंता की गई। धीरे-धीरे सभी की तबीयत बिगड़ने लगी, लेकिन काम का दबाव कम नहीं हुआ। गांव के जो युवक अच्छी कमाई का सपना लेकर गए थे, वे मोटी सैलरी नहीं बल्कि गंभीर बीमारी लेकर लौटे। आज हालत यह है कि कई लोगों के फेफड़े बुरी तरह प्रभावित हो चुके हैं। गांव में चर्चा है कि जो बीमारी उन्हें वहां मिली है, वह धीरे-धीरे जान ले रही है। अब तक पांच लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि कई अन्य जिंदगी और मौत के बीच संघर्ष कर रहे हैं। फैक्ट्री में जहरीली धूल उड़ती थी आंध्र प्रदेश के नेमाकल बोम्मनहल (अनंतपुर) स्थित आशीर्वाद मिनरल्स प्राइवेट लिमिटेड फैक्ट्री में सभी मजदूर काम करने के लिए गए थे। वहां से वापस लौटे फरहान आलम ने बताया कि डस्टर प्लांट में पत्थर घिसाई का काम होता था। फैक्ट्री में पत्थरों से टैल्कम पाउडर बनाने का काम होता था। पत्थरों को पीसकर पाउडर बनाया जाता था। उसमें केमिकल मिलाने के बाद बोरी में भरकर दूसरी फैक्ट्री में भेजा जाता था। वहां जहरीली धूल उड़ती थी। सेफ्टी के कोई इंतजाम नहीं किए गए थे जिस वजह से तबीयत खराब हो गई। धूल भरे माहौल में काम कराया जाता था। धीरे-धीरे सांस लेने में परेशानी, कमजोरी होने लगी। फेफड़े में संक्रमण के बाद हालत बिगड़ने लगी। तबीयत बिगड़ने के बाद भी जबरन काम लिया जा रहा था। काफी लोगों की तबीयत बिगड़ने लगी तब हमलोग यहीं आए। अभी तक 5 लोगों की मौत हो चुकी है। घर में कई दिनों से नहीं जला चूल्हा ट्रामा सेंटर में इलाजरत विक्रम की मां तितली देवी बात करते-करते आवाज भर्रा जाती है। वे बताती हैं कि उनका बेटा भी बीमार है और अस्पताल में भर्ती है। घर की हालत इतनी खराब हो चुकी है कि कई दिनों से चूल्हा तक नहीं जला। इलाज का खर्च उठाना तो दूर, परिवार के सामने रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो गया है। जो लोग पहले कमाकर परिवार चलाते थे, आज खुद बिस्तर पर पड़े हैं। घरों में छोटे-छोटे बच्चे हैं, बूढ़े माता-पिता हैं, लेकिन कमाने वाला कोई नहीं बचा। रिश्तेदार और ग्रामीणों की मदद से मिल रहा खाना पीड़ित के परिवार का कहना है कि ठेकेदार उन्हें रोजगार के नाम पर ऐसी जगह ले गया जहां उनकी जिंदगी दांव पर लग गई। लोग गरीबी से लड़ने निकले थे, अब बीमारी से लड़ रहे हैं। सामने सबसे बड़ी चुनौती इलाज ही नहीं, बल्कि रोज का भोजन जुटाना है। गांव के लोग और रिश्तेदार ही किसी तरह मदद कर रहे हैं, लेकिन ये सहारा कब तक चलेगा, इसका जवाब किसी के पास नहीं है। कमाने गए थे, बीमार होकर घर लौटे इलाजरत राजिक के भाई अफजल कहते हैं कि उनका भाई भी बीमार है। लगातार इलाज और आर्थिक तंगी ने परिवार को तोड़कर रख दिया है। कई दिनों से घर में चूल्हा नहीं जला। जो थोड़ा-बहुत खाना गांव के लोग और रिश्तेदार पहुंचा देते हैं, उसी से किसी तरह गुजारा हो रहा है। ये परेशानी सिर्फ उनके परिवार की नहीं, बल्कि उन सभी घरों की है जिनके सदस्य आंध्र प्रदेश से बीमार होकर लौटे हैं। डर के साए में जी रहे परिजन गांव के 30 से भी अधिक परिवारों की यही कहानी है। कहीं बेटे की मौत के बाद बूढ़े माता-पिता टूट चुके हैं, तो कहीं पत्नी अपने पति के इलाज के लिए पैसे जुटाने की जद्दोजहद में लगी है। जिन परिवारों के सदस्य अभी जिंदा हैं, वे भी हर दिन डर के साथ जी रहे हैं कि कहीं अगली बुरी खबर उनके घर से न आ जाए। कसी के पास कोई जवाब नहीं है मंगलवार को मसद आलम की मौत के बाद गांव में मातम का माहौल है। इससे पहले गुलाम मुस्तफा, कुंदन कुमार, लखिया देवी और श्रवण कुमार की मौत ने लोगों को झकझोर दिया। लगातार हो रही मौतों ने ग्रामीणों के बीच भय का माहौल पैदा कर दिया है। लोग एक-दूसरे के घर पहुंचकर हालचाल ले रहे हैं, लेकिन किसी के पास कोई जवाब नहीं है, आखिर यह सिलसिला कब रुकेगा। सरकार से मदद की उम्मीद जिंदगी और मौत से ट्रामा सेंटर में जूझ रहे मरीजों के परिजनों का कहना है कि अब उनकी सबसे बड़ी चिंता अस्पतालों में भर्ती अपनों की जान बचाना है। इलाज का खर्च बढ़ता जा रहा है और कई परिवारों की आर्थिक स्थिति जवाब दे चुकी है। उम्मीद है कि प्रशासन और सरकार पीड़ित परिवारों की मदद के लिए आगे आएगी ताकि इलाज के अभाव में और किसी की जान न जाए। 2 मरीजों की हालत गंभीर बनी हुई है जीएमसीएच के अधीक्षक डॉ. संजय कुमार ने बताया कि प्रारंभिक जांच में यह मामला सिलिकोसिस बीमारी से जुड़ा प्रतीत हो रहा है। यह बीमारी खदानों, निर्माण स्थलों और पत्थर की घिसाई वाले स्थानों पर काम करने वाले श्रमिकों को प्रभावित करती है, जिसमें धूल के बारीक कण फेफड़ों में जमा होकर उन्हें स्थायी रूप से नुकसान पहुंचाते हैं। फेफड़े धीरे-धीरे काम करना बंद कर देते हैं। सभी मरीजों को हायर सेंटर रेफर किया गया है।
'फैक्ट्री में जहरीली धूल उड़ती थी, जबरन काम कराते थे':आंध्रप्रदेश से फेफड़े की बीमारी लेकर लौटे मजदूरों की आपबीती; 5 मौतों के बाद घरों में नहीं जला चूल्हा
पूर्णिया जिले के कस्बा प्रखंड के जियनगंज, तारानगर और आसपास के गांवों में सन्नाटा पसरा हुआ है। जिन घरों से कभी रोजी-रोटी की तलाश में निकले लोगों की हंसी सुनाई देती थी, वहां अब बीमारी, चिंता और मौत की कहानियां सुनाई दे रही हैं। आंध्र प्रदेश से लौटे मजदूरों की लगातार मौतों ने पूरे इलाके को सदमे में डाल दिया है। पांच लोगों की जान जा चुकी है, जबकि कई मजदूर अब भी गंभीर बीमारी से जूझ रहे हैं। जीएमसीएच के ट्रामा सेंटर में भर्ती श्रवण का इलाज चल रहा है। अस्पताल के बाहर बैठी उसकी बहन सुषमा देवी की आंखों से आंसू थमने का नाम नहीं ले रही। भास्कर के कैमरे पर सुषमा बातों ही बातों में फूट फूट कर रो पड़ती हैं। ये दर्द सिर्फ एक परिवार का नहीं है। किसी बेटा अस्पताल में भर्ती है तो किसी का भाई ऑक्सीजन के सहारे सांस ले रहा है। पांच मौतों के बाद गांव में ऐसा माहौल है कि लोग हर फोन कॉल और खबर से डरने लगे हैं। सिलसिलेवार तरीके से जानिए क्या है पूरा मामला। पैसे की जगह बीमारी लेकर लौटे सुषमा कहती हैं कि उनका भाई बेहतर रोजगार और अच्छी कमाई की उम्मीद में आंध्र प्रदेश गया था, लेकिन पैसे की जगह बीमारी लेकर वापस लौटा। श्रवण अकेला नहीं है, गांव के करीब 30 लोग उसी तरह बीमार होकर लौटे हैं। इनमें पांच लोगों की मौत हो चुकी है, 6 हालत अब भी गंभीर बनी हुई है। जिसमें भाई श्रवण भी है। भाई के इलाज की चिंता में डूबी सुषमा बार-बार एक ही बात कहती हैं कि कमाने गया था, लेकिन पैसे की जगह बीमारी लेकर लौट आया। गांव के अधिकांश परिवार बेहद गरीब हैं। किसी के पास थोड़ी-बहुत खेती है तो कोई दिहाड़ी मजदूरी कर परिवार चलाता है। घर की आर्थिक तंगी दूर करने, बच्चों का भविष्य बेहतर बनाने और परिवार को दो वक्त की रोटी की चिंता से निकालने सभी ने सैकड़ों किलोमीटर दूर जाने का फैसला किया था। किसी ने सोचा था कि लौटने पर घर की हालत सुधरेगी, लेकिन वापस लौटे तो शरीर बीमारी से टूट चुका था। 18-18 घंटे काम कराया जाता था सुषमा रोते हुए आगे कहती हैं वहां मजदूरों से बंधुआ मजदूरों की तरह काम कराया गया। सुबह से लेकर देर रात तक 16 से 18 घंटे काम लिया जाता रहा। धूल और पाउडर से भरे प्लांट में लगातार काम करने के बावजूद सुरक्षा के कोई इंतजाम नहीं थे। मजदूरों को न तो पर्याप्त सुरक्षा उपकरण दिए गए और न ही स्वास्थ्य की चिंता की गई। धीरे-धीरे सभी की तबीयत बिगड़ने लगी, लेकिन काम का दबाव कम नहीं हुआ। गांव के जो युवक अच्छी कमाई का सपना लेकर गए थे, वे मोटी सैलरी नहीं बल्कि गंभीर बीमारी लेकर लौटे। आज हालत यह है कि कई लोगों के फेफड़े बुरी तरह प्रभावित हो चुके हैं। गांव में चर्चा है कि जो बीमारी उन्हें वहां मिली है, वह धीरे-धीरे जान ले रही है। अब तक पांच लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि कई अन्य जिंदगी और मौत के बीच संघर्ष कर रहे हैं। फैक्ट्री में जहरीली धूल उड़ती थी आंध्र प्रदेश के नेमाकल बोम्मनहल (अनंतपुर) स्थित आशीर्वाद मिनरल्स प्राइवेट लिमिटेड फैक्ट्री में सभी मजदूर काम करने के लिए गए थे। वहां से वापस लौटे फरहान आलम ने बताया कि डस्टर प्लांट में पत्थर घिसाई का काम होता था। फैक्ट्री में पत्थरों से टैल्कम पाउडर बनाने का काम होता था। पत्थरों को पीसकर पाउडर बनाया जाता था। उसमें केमिकल मिलाने के बाद बोरी में भरकर दूसरी फैक्ट्री में भेजा जाता था। वहां जहरीली धूल उड़ती थी। सेफ्टी के कोई इंतजाम नहीं किए गए थे जिस वजह से तबीयत खराब हो गई। धूल भरे माहौल में काम कराया जाता था। धीरे-धीरे सांस लेने में परेशानी, कमजोरी होने लगी। फेफड़े में संक्रमण के बाद हालत बिगड़ने लगी। तबीयत बिगड़ने के बाद भी जबरन काम लिया जा रहा था। काफी लोगों की तबीयत बिगड़ने लगी तब हमलोग यहीं आए। अभी तक 5 लोगों की मौत हो चुकी है। घर में कई दिनों से नहीं जला चूल्हा ट्रामा सेंटर में इलाजरत विक्रम की मां तितली देवी बात करते-करते आवाज भर्रा जाती है। वे बताती हैं कि उनका बेटा भी बीमार है और अस्पताल में भर्ती है। घर की हालत इतनी खराब हो चुकी है कि कई दिनों से चूल्हा तक नहीं जला। इलाज का खर्च उठाना तो दूर, परिवार के सामने रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो गया है। जो लोग पहले कमाकर परिवार चलाते थे, आज खुद बिस्तर पर पड़े हैं। घरों में छोटे-छोटे बच्चे हैं, बूढ़े माता-पिता हैं, लेकिन कमाने वाला कोई नहीं बचा। रिश्तेदार और ग्रामीणों की मदद से मिल रहा खाना पीड़ित के परिवार का कहना है कि ठेकेदार उन्हें रोजगार के नाम पर ऐसी जगह ले गया जहां उनकी जिंदगी दांव पर लग गई। लोग गरीबी से लड़ने निकले थे, अब बीमारी से लड़ रहे हैं। सामने सबसे बड़ी चुनौती इलाज ही नहीं, बल्कि रोज का भोजन जुटाना है। गांव के लोग और रिश्तेदार ही किसी तरह मदद कर रहे हैं, लेकिन ये सहारा कब तक चलेगा, इसका जवाब किसी के पास नहीं है। कमाने गए थे, बीमार होकर घर लौटे इलाजरत राजिक के भाई अफजल कहते हैं कि उनका भाई भी बीमार है। लगातार इलाज और आर्थिक तंगी ने परिवार को तोड़कर रख दिया है। कई दिनों से घर में चूल्हा नहीं जला। जो थोड़ा-बहुत खाना गांव के लोग और रिश्तेदार पहुंचा देते हैं, उसी से किसी तरह गुजारा हो रहा है। ये परेशानी सिर्फ उनके परिवार की नहीं, बल्कि उन सभी घरों की है जिनके सदस्य आंध्र प्रदेश से बीमार होकर लौटे हैं। डर के साए में जी रहे परिजन गांव के 30 से भी अधिक परिवारों की यही कहानी है। कहीं बेटे की मौत के बाद बूढ़े माता-पिता टूट चुके हैं, तो कहीं पत्नी अपने पति के इलाज के लिए पैसे जुटाने की जद्दोजहद में लगी है। जिन परिवारों के सदस्य अभी जिंदा हैं, वे भी हर दिन डर के साथ जी रहे हैं कि कहीं अगली बुरी खबर उनके घर से न आ जाए। कसी के पास कोई जवाब नहीं है मंगलवार को मसद आलम की मौत के बाद गांव में मातम का माहौल है। इससे पहले गुलाम मुस्तफा, कुंदन कुमार, लखिया देवी और श्रवण कुमार की मौत ने लोगों को झकझोर दिया। लगातार हो रही मौतों ने ग्रामीणों के बीच भय का माहौल पैदा कर दिया है। लोग एक-दूसरे के घर पहुंचकर हालचाल ले रहे हैं, लेकिन किसी के पास कोई जवाब नहीं है, आखिर यह सिलसिला कब रुकेगा। सरकार से मदद की उम्मीद जिंदगी और मौत से ट्रामा सेंटर में जूझ रहे मरीजों के परिजनों का कहना है कि अब उनकी सबसे बड़ी चिंता अस्पतालों में भर्ती अपनों की जान बचाना है। इलाज का खर्च बढ़ता जा रहा है और कई परिवारों की आर्थिक स्थिति जवाब दे चुकी है। उम्मीद है कि प्रशासन और सरकार पीड़ित परिवारों की मदद के लिए आगे आएगी ताकि इलाज के अभाव में और किसी की जान न जाए। 2 मरीजों की हालत गंभीर बनी हुई है जीएमसीएच के अधीक्षक डॉ. संजय कुमार ने बताया कि प्रारंभिक जांच में यह मामला सिलिकोसिस बीमारी से जुड़ा प्रतीत हो रहा है। यह बीमारी खदानों, निर्माण स्थलों और पत्थर की घिसाई वाले स्थानों पर काम करने वाले श्रमिकों को प्रभावित करती है, जिसमें धूल के बारीक कण फेफड़ों में जमा होकर उन्हें स्थायी रूप से नुकसान पहुंचाते हैं। फेफड़े धीरे-धीरे काम करना बंद कर देते हैं। सभी मरीजों को हायर सेंटर रेफर किया गया है।


