
Bengal Durga Puja Politics: पश्चिम बंगाल में दुर्गा पूजा धार्मिक और सांस्कृतिक उत्सव के साथ-साथ राजनीतिक प्रभाव दिखाने का मंच भी रही है. इस साल पूजा पंडालों में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) नेताओं की बढ़ती मौजूदगी और तृणमूल कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेताओं की गैरमौजूदगी चर्चा में है. पूजा समितियों के कार्यक्रमों और पारंपरिक रस्मों में नजर आ रहे नये राजनीतिक चेहरों को राज्य में बदले सत्ता समीकरणों से जोड़कर देखा जा रहा है.
ममता बनर्जी के पूजा उद्घाटन कार्यक्रम में आयी कमी
पिछले डेढ़ दशक से ममता बनर्जी का दुर्गा पूजा से पहले कोलकाता के अलग-अलग पंडालों का उद्घाटन करना चर्चा में रहता था. इस साल उन्होंने अपने कालीघाट स्थित आवास के आसपास केवल एक पूजा पंडाल का उद्घाटन किया.
यह वर्ष 2025 के उनके कार्यक्रमों से अलग है. पिछले साल उन्होंने 3,000 पूजा पंडालों का उद्घाटन करने का लक्ष्य रखा था. तृणमूल के कई वरिष्ठ नेता भी इस बार बड़े बजट वाले पूजा आयोजनों के उद्घाटन समारोहों में पहले की तुलना में कम दिखे.
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अरूप विश्वास, सुजीत बोस और फिरहाद हकीम भी मंचों से दूर
- पूर्व मंत्री अरूप विश्वास, सुजीत बोस और फिरहाद हकीम कोलकाता की कई प्रमुख पूजा समितियों से जुड़े रहे हैं. इस बार वे अपने पुराने प्रभाव वाले आयोजनों के आसपास भी नजर नहीं आ रहे हैं.
- शिक्षक भर्ती घोटाला मामले में जमानत पर जेल से बाहर आये पार्थ चटर्जी भी प्रसिद्ध ‘नाकतला उदयन संघ’ की दुर्गा पूजा से दूर हैं.
- विधानसभा चुनाव में हार के बाद तृणमूल संगठनात्मक संकट और आंतरिक उथल-पुथल से जूझ रही है. ऐसे में पूजा आयोजनों में नेताओं की कम मौजूदगी पार्टी की राजनीतिक स्थिति को लेकर चर्चा का विषय बनी हुई है.
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पूजा पंडालों में भाजपा नेताओं की बढ़ी सक्रियता
मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी इस साल पूजा पंडालों के उद्घाटन कार्यक्रमों में प्रमुख चेहरा बनकर उभरे हैं. उन्होंने कोलकाता के साथ-साथ विभिन्न जिलों के कई प्रसिद्ध पंडालों का दौरा किया और कई का उद्घाटन भी किया.
- पूर्वी कोलकाता का ‘श्रीभूमि स्पोर्टिंग क्लब’ उनके दौरों में खास रहा. यह पंडाल पहले सुजीत बोस के संरक्षण में था और पिछले साल इसका उद्घाटन ममता बनर्जी ने किया था.
- भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष शमिक भट्टाचार्य, केंद्रीय मंत्री सुकांत मजूमदार, दिलीप घोष, लॉकेट चटर्जी और अग्निमित्रा पॉल समेत पार्टी के अन्य प्रमुख नेता भी राज्य भर में पूजा पंडालों के उद्घाटन और उत्सव से जुड़े कार्यक्रमों में नजर आये.
भाजपा नेता अब पूजा आयोजकों के साथ संबंध मजबूत करने और अपनी सामाजिक पहुंच बढ़ाने में जुटे हैं.
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चक्षुदान की रस्म में शशि पांजा की जगह भाजपा विधायक
पूजा समितियों में राजनीतिक चेहरों की मौजूदगी में बदलाव के उदाहरण भी सामने आये हैं. ‘अहिरीटोला सार्वजनिक दुर्गोत्सव’ में इस साल प्रतिमा के नेत्र बनाने की पारंपरिक रस्म ‘चक्षुदान’ भाजपा विधायक पूर्णिमा चक्रवर्ती ने निभायी. इससे पहले यह रस्म तृणमूल की कद्दावर नेता और पश्चिम बंगाल की पूर्व मंत्री डॉ शशि पांजा निभाती थीं.
‘मोहम्मद अली पार्क’ की दुर्गा पूजा का उद्घाटन भाजपा मंत्री तापस रॉय ने किया. उत्तर कोलकाता से सांसद और तृणमूल के बागी नेता सुदीप बंद्योपाध्याय को इस बार इस आयोजन से दूर रखा गया.
इन घटनाओं को पूजा समितियों में राजनीतिक प्रतिनिधित्व और प्रभाव में आये बदलाव के उदाहरण के तौर पर देखा जा रहा है.
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भाजपा ने कहा- ‘खुला गोलपोस्ट’, TMC ने प्रशासन पर लगाया दबाव का आरोप
- भाजपा के राज्यसभा सदस्य राहुल सिन्हा ने मौजूदा स्थिति को “बिना किसी प्रतिद्वंद्वी खिलाड़ी के खुला गोलपोस्ट” बताया. उन्होंने कहा कि इस साल दुर्गा पूजा में भाजपा को अपनी मौजूदगी दर्ज कराने में किसी तरह की बाधा का सामना नहीं करना पड़ रहा है. उन्होंने तृणमूल के कुछ कार्यकर्ताओं पर पूजा के जरिये धन वसूली करने का आरोप भी लगाया.
- वहीं, तृणमूल प्रवक्ता कृष्णु मित्रा ने दावा किया कि सामुदायिक दुर्गा पूजा आयोजनों का नियंत्रण तृणमूल से भाजपा के हाथों में जाना स्वाभाविक बदलाव नहीं है. उनके अनुसार, पुलिस और प्रशासन की सक्रिय भूमिका के जरिये दबाव बनाकर ऐसा किया गया है.
- मित्रा ने देवराज चक्रवर्ती का जिक्र करते हुए दावा किया कि वे अब भी व्यापक जनसमर्थन रखते हैं और मौजूदा सरकार ने उन्हें जेल में डाल रखा है. उन्होंने यह भी कहा कि केंद्र सरकार के गिरने के बाद भाजपा की राज्य सरकार भी ढह जायेगी और तृणमूल नेता फिर उत्सव के मंच पर लौटेंगे.
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भाजपा मंत्री बोले- दुर्गा पूजा किसी पार्टी की संपत्ति नहीं
भाजपा नेता और मंत्री इंद्रनील खां ने कहा कि दुर्गा पूजा किसी राजनीतिक दल की संपत्ति नहीं है. उन्होंने कहा, “हम यहां पूजा पंडालों पर कब्जा करने नहीं आए हैं. दुर्गा पूजा आम जनता का उत्सव है, किसी राजनीतिक दल का नहीं.”
इस तरह, इस साल कोलकाता के पूजा पंडालों में नेताओं की मौजूदगी और पारंपरिक आयोजनों में भागीदारी को लेकर भाजपा और तृणमूल के बीच राजनीतिक बयानबाजी भी तेज है. हालांकि, पूजा समितियों में दिख रहे बदलावों के पीछे दबाव या राजनीतिक रणनीति की भूमिका को लेकर दोनों दलों के दावे अलग-अलग हैं.
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