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बागमती के कटाव से खतरे में 52 करोड़ का पुल:2012 में शुरू हुआ था आवागमन, स्थानीय लोगों ने कटावरोधी कार्य-स्थायी सुरक्षा उपायों की उठाई मांग


शिवहर के विकास की पहचान माने जाने वाले पिपराही पुल पर अब बागमती नदी का खतरा मंडराने लगा है। करीब 52 करोड़ रुपये की लागत से बने इस पुल के उत्तरी हिस्से में नदी के तेज कटाव ने लोगों की चिंता बढ़ा दी है। स्थानीय लोगों का कहना है कि बागमती नदी की मुख्य धारा अब पुल के बीच से बहने के बजाय उत्तर दिशा की ओर खिसक गई है। इसके कारण पुल के नीचे लगातार कटाव हो रहा है। यदि समय रहते स्थायी सुरक्षा उपाय नहीं किए गए तो भविष्य में पुल की मजबूती और अस्तित्व पर गंभीर संकट खड़ा हो सकता है। पुल के नीचे तेज कटाव, ग्रामीणों में बढ़ी चिंता स्थानीय लोगों के अनुसार पिछले कुछ समय से बागमती नदी की धारा में बदलाव देखने को मिल रहा है। नदी का बहाव अब पुल के उत्तरी हिस्से की ओर अधिक हो गया है, जिससे वहां मिट्टी का तेजी से कटाव हो रहा है। बरसात के मौसम में नदी का जलस्तर बढ़ने के साथ कटाव की रफ्तार भी तेज हो जाती है। ग्रामीणों का कहना है कि अभी तक स्थिति पूरी तरह गंभीर नहीं हुई है, लेकिन यदि जल्द ही कटावरोधी कार्य नहीं कराया गया तो आने वाले वर्षों में पुल की नींव पर इसका असर पड़ सकता है। लोगों ने प्रशासन से समय रहते आवश्यक कदम उठाने की मांग की है। 2012 में शुरू हुआ था पुल, हजारों लोगों को मिली थी राहत पिपराही-पुरनहिया मुख्य मार्ग पर स्थित करीब 600 मीटर लंबा यह पुल वर्ष 2012 में आम लोगों को समर्पित किया गया था। इसके निर्माण के बाद दोनों प्रखंडों के बीच आवागमन काफी आसान हो गया। पहले लोगों को धनकौल, कुअमा, आसोपुर, अभिराजपुर, बैरिया और सोनौल सुल्तान जैसे लंबे वैकल्पिक रास्तों से होकर गुजरना पड़ता था। इन मार्गों से यात्रा करने में कई घंटे लग जाते थे। बरसात के दिनों में स्थिति और भी कठिन हो जाती थी। कई गांवों का संपर्क प्रभावित हो जाता था और लोगों को शिक्षा, स्वास्थ्य तथा बाजार तक पहुंचने में भारी परेशानियों का सामना करना पड़ता था। पुल बनने के बाद यह समस्या काफी हद तक समाप्त हो गई और क्षेत्र के आर्थिक व सामाजिक विकास को नई गति मिली। 37 साल बाद पूरी हुई थी महत्वाकांक्षी परियोजना पिपराही पुल का निर्माण शिवहर जिले के लिए किसी ऐतिहासिक उपलब्धि से कम नहीं माना जाता। इस परियोजना की शुरुआत वर्ष 1985 में हुई थी, लेकिन विभिन्न कारणों से यह वर्षों तक अधूरी पड़ी रही। बागमती नदी के बार-बार धारा बदलने, भूमि अधिग्रहण से जुड़े विवादों और निर्माण एजेंसियों के सामने आई तकनीकी एवं प्रशासनिक बाधाओं के कारण परियोजना आगे नहीं बढ़ सकी। बाद में तत्कालीन बिहार सरकार में मंत्री रहे स्वर्गीय रघुनाथ झा के प्रयासों से बेलवा घाट पुल परियोजना को नई गति मिली और अंततः वर्ष 2012 में इसका निर्माण पूरा हो सका। इसके बाद यह पुल शिवहर के विकास का प्रतीक बन गया। स्थायी सुरक्षा उपायों की मांग अब एक बार फिर बागमती नदी की बदलती धारा इस पुल के सामने नई चुनौती बनकर खड़ी हो गई है। स्थानीय लोगों ने जल संसाधन विभाग और जिला प्रशासन से मांग की है कि पुल के उत्तरी हिस्से में तत्काल कटावरोधी कार्य कराया जाए। साथ ही नदी की धारा को वैज्ञानिक तरीके से नियंत्रित करने के लिए दीर्घकालिक योजना बनाई जाए, ताकि भविष्य में पुल को किसी प्रकार का नुकसान न पहुंचे। लोगों का कहना है कि करोड़ों रुपये की लागत से बनी इस महत्वपूर्ण परियोजना की सुरक्षा प्रशासन की प्राथमिकता होनी चाहिए। समय रहते प्रभावी कदम उठाए गए तो न केवल पुल सुरक्षित रहेगा, बल्कि हजारों लोगों की रोजमर्रा की आवाजाही और क्षेत्र का विकास भी निर्बाध रूप से जारी रहेगा। फिलहाल सभी की निगाहें प्रशासन और जल संसाधन विभाग की आगामी कार्रवाई पर टिकी हैं।

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