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बिहार में ‘चमकी बुखार’ को लेकर अलर्ट:बच्चों में AES के बढ़ते खतरे पर विशेष तैयारी, स्वास्थ्य विभाग ने अस्पतालों को दिए निर्देश


बिहार में गर्मी बढ़ने के साथ ही एक बार फिर ‘चमकी बुखार’ (एक्यूट एनसेफ्लाइटिस सिंड्रोम – AES) का खतरा बढ़ने लगा है। यह बीमारी खासकर मुजफ्फरपुर और आसपास के जिलों में 1 से 10 साल के कुपोषित बच्चों को ज्यादा प्रभावित करती है। हर साल जून-जुलाई में इसके मामले तेजी से सामने आते हैं। मस्तिष्क पर करता है सीधा असर चिकित्सा विशेषज्ञों के अनुसार, चमकी बुखार मस्तिष्क से संबंधित एक गंभीर बीमारी है। इसमें दिमाग की कोशिकाओं में सूजन आ जाती है, जिससे शरीर का केंद्रीय तंत्रिका तंत्र प्रभावित होता है। इस स्थिति में बच्चों को अचानक झटके (ऐंठन) आने लगते हैं, जिन्हें स्थानीय भाषा में ‘चमकी’ कहा जाता है। समय पर इलाज नहीं मिलने पर यह जानलेवा भी हो सकता है। अस्पतालों में विशेष तैयारी इस खतरे से निपटने के लिए शहर के प्रमुख अस्पतालों में विशेष तैयारी की गई है। इनमें लू वार्ड, आईसीयू बेड और चमकी बुखार के लिए अलग से व्यवस्था शामिल है। पटना मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल (PMCH) में बच्चों के लिए 20 बेड आरक्षित किए गए हैं ताकि आपात स्थिति में तत्काल उपचार मिल सके। इसके अलावा, सभी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों (PHC) और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों (CHC) को निर्देश दिया गया है कि संदिग्ध मरीज मिलने पर तुरंत प्राथमिक उपचार प्रदान करें। मरीजों को समय पर अस्पताल पहुंचाने के लिए 102 एम्बुलेंस सेवा को भी अलर्ट मोड पर रखा गया है। स्टाफ ट्रेनिंग और दवाओं का स्टॉक रखने के निर्देश स्वास्थ्य विभाग ने सभी मेडिकल कॉलेजों और जिला अस्पतालों को 44 आवश्यक दवाओं का पर्याप्त स्टॉक सुनिश्चित करने का निर्देश दिया है। डॉक्टरों और नर्सिंग स्टाफ को विशेष प्रशिक्षण दिया जा रहा है। वहीं, सेवाओं की निगरानी और अस्पतालों में डॉक्टरों की उपस्थिति के लिए डिजिटल प्लेटफॉर्म का उपयोग किया जा रहा है। ग्रामीण क्षेत्रों में मरीजों को अस्पताल तक पहुंचाने के लिए ग्राम परिवहन योजना के वाहनों को भी सक्रिय किया गया है, ताकि समय पर इलाज मिल सके। बच्चों के लिए तीन अहम सलाह पटना सिविल सर्जन ने अभिभावकों को बच्चों की सुरक्षा को लेकर तीन महत्वपूर्ण सुझाव दिए हैं- क्यों होता है चमकी बुखार?
विशेषज्ञों के अनुसार इसके पीछे कई कारण जिम्मेदार होते हैं। इनमें अधपकी या कच्ची लीची का सेवन, अत्यधिक गर्मी और लू, शरीर में पानी की कमी, कुपोषण और खाली पेट सोना बड़ी वजह मानी जाती है। लीची में मौजूद टॉक्सिन कुपोषित बच्चों के लिए खतरनाक हो सकता है। खासकर जब बच्चा खाली पेट लीची खाता है, तब ब्लड शुगर अचानक गिर जाता है और दिमाग पर असर पड़ता है। तेज गर्मी और उमस का समय जून-जुलाई के महीने में चमकी बुखार होने के सबसे ज्यादा केस सामने आते हैं। इसी मौसम में लीची पकती भी है। हर साल बिहार में सैकड़ों बच्चे चमकी बुखार की चपेट में आते हैं और कई मामलों में मरीज की जान तक चली जाती है।

चमकी बुखार की जांच कैसे होती है? चमकी बुखार की पुष्टि के लिए डॉक्टर MRI या CT स्कैन, खून और पेशाब की जांच, लंबर पंक्चर (रीढ़ से द्रव जांच) और गंभीर मामलों में मस्तिष्क की बायोप्सी कराते है। रिपोर्ट में इसकी पुष्टि होने पर मरीज के कंडिशन के हिसाब से इलाज शुरू किया जाता है। जानलेवा साबित हो सकती है लापरवाही चमकी बुखार हर साल बिहार में चिंता का विषय बनता है। थोड़ी सी लापरवाही बच्चों के लिए जानलेवा साबित हो सकती है। ऐसे में जागरूकता, समय पर इलाज और सही देखभाल ही इससे बचने का सबसे बड़ा उपाय है।

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